कॉरपोरेट सेक्टर ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने की मुहिम के तहत गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों को एक नई मंजिल का रास्ता दिया है।
इसके लिए कॉरपोरेट सेक्टर ने काफी पैसे भी खर्च किए हैं। कच्छ में नमक बनाने वाले सीमांत मजदूर जिन्हें लाभ कमाने का बेहद कम मौका मिलता था वैसे लगभग 27 मजदूर, एक साल पहले बनी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ‘सबरस’ के मालिक बनकर अब बेहद खुश हैं।
इन मजदूरों के पास कंपनी के 65 प्रतिशत शेयर हैं और वे इसे 74 प्रतिशत तक बढ़ाना चाहते हैं। ‘सबरस’ के तीन सदस्यों की बोर्ड ऑफ डायरेक्टर में से दो नमक की खेती करने वाले मजदूर हैं। कंपनी के बाकी शेयर एक पब्लिक लिमिटेड फर्म सालाइन एरिया वाइटलाइजेशन इंटरप्राइज (सेव)के पास है। इसके अलावा इसी तरह की कोशिश प्याज और आम का उत्पादन क रने वालों के लिए भी किया जा रहा है।
‘सबरस’ परियोजना से प्रेरित होकर ‘सेव’ अब वेज-इंडिया नाम की दूसरी कंपनी बनाने की योजना बना रही है। इस कंपनी में लगभग 74 प्रतिशत हिस्सा प्राथमिक स्तर पर उत्पादन करने वालों का होगा। मीठे केसर आम की खेती करने वाले गुजरात के सोसिया गांव के किसान वेज-इंडिया के साथ हाथ मिलाने की तैयारी कर रहे हैं।
‘सेव’ के बोर्ड सदस्यों में शामिल हैं गुजरात इंवेस्टर्स एंड शेयरहोल्डर्स एसोसिएशन के चेयरमैन चीनूभाई शाह, आईआईएम के प्रोफेसर दिनेश अवस्थी, इडीआई की निदेशक दक्षा शाह और फ्रेंड ऑफ वूमेन वर्ल्ड और ‘विकास’ एनजीओ के संस्थापक सदस्य राजेश शाह। राजेश शाह ‘सेव’ के प्रबंध निदेशक भी हैं। शाह का दावा है कि देश में यह पहली बार होगा कि गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाले लोगों का किसी कंपनी में इतना हिस्सा हो।
इस तरह के अनोखी कल्पना पर काम करने वाले शाह एक वास्तुकार भी हैं। उनका कहना है,’अगर आप चांद पर जाना चाहते हैं, तो आप साइकिल का तो सहारा नहीं ले सकते न। इसके लिए आपको रॉकेट की ही जरूरत होगी। शहरी बाजार नए सिरे से बनने लगीं हैं। अब स्वैच्छिक संस्थाओं के लिए ऐसा करना बेहद जरूरी है। अगर मैं गैरलाभकारी संगठन हूं तो मैं यह कतई नहीं सिखा सकता की मुनाफ कैसे बनाया जा सकता है।
गरीबों के पास सशक्तिकरण जैसी चीज तब आएगी जब वे पैसा कमाएं।’ ‘सेव’ ने अपने उत्पादों को बाजार में लाने के लिए अपनी एक सहयोगी कंपनी सेतू ट्रेडलिंक बनाई है। सेव के 10 प्रतिशत शेयर बीपीएल सदस्यों के पास है।
‘सबरस’ के निदेशक उदय गायकवाड का कहना है,’सबरस बनने के पहले साल में नमक के मजदूरों को कुल नमक उत्पादन का 10 प्रतिशत कंपनी को देने के लिए कहा गया। पहले साल में उनलोगों ने 10 हजार टन का उत्पादन किया। हालांकि शुरुआत में कंपनी को परिवहन और भंडारण में काफी घाटा भी हुआ।’ कंपनी जल्द ही सबरस नाम के ब्रांड का नमक बाजार में उतारने वाली है।