भारत का पिछले चार सालों के दौरान जीडीपी विकास शानदार रहा है और इसे देखते हुए पत्रकार भारत और चीन को बराबरी के पलड़े पर तौल रहे हैं।
कुछ लोगों को लगता है कि मौजूदा वर्ष में विकास दर धीमी रहेगी जबकि रंगराजन, अहलूवालिया और चिदंबरम ने बार बार विश्वास जताया है कि अगले दशक के दौरान भी विकास दर 8 से 9 फीसदी के बीच बनी रहेगी, चाहे कैसी भी तात्कालिक समस्याएं बनी रहें।
बचत और निवेश दर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है और देश ने पूंजी का सही इस्तेमाल करना भी सीख लिया है। पर फिर भी क्या वित्तीय आंकड़ों के दम पर ही विकास की गारंटी दी जा सकती है? विकास के लिए ये जरूरी तत्व तो हैं पर क्या ये काफी हैं?
चलिए जरा इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और यह देखते हैं कि उस दौरान आर्थिक हालात किस तरह के थे। 1960 के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में लैटिन अमेरिका की अर्थव्यवस्था को लेकर काफी संभावनाएं नजर आ रही थीं। ऐसा लग रहा था कि आने वाले समय में भी अर्थव्यवस्था अच्छे दौर से गुजरेगी।
आकर्षक फीस और मार्जिन को देखते हुए बैंकों ने इस क्षेत्र को बड़ी आसानी से अरबों डॉलर का ऋण दे दिया था। पर उसके बाद देश की अर्थव्यवस्था की हालत कैसी रही ये सभी को पता है। कुछ इसी तरह का हाल जापानी अर्थव्यवस्था के साथ भी देखने को मिला।
1980 के दशक में जापानी अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे प्रभावशाली बताया जा रहा था और ऐसा माना जा रहा था कि इस अर्थव्यवस्था के विकास की अथाह संभावनाएं हैं। पर ऐसा कुछ भी आगे देखने को नहीं मिला। जापानी शेयर सूचकांक निक्कई उस समय जिस स्तर पर था आज वह उसका एक तिहाई रह गया है और इसके पीछे मुख्य वजह रही है- दो दशकों तक अर्थव्यवस्था में आई स्थिरता।
यहां मुद्दा यह है कोई भी देश लगातार दहाई के आंकड़े के साथ विकास दर हासिल करता रहे, यह मुमकिन नहीं होता। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि अर्थव्यवस्था शिखर पर बनी हुई होती है और देश इसे लेकर आत्मविश्वास से लबरेज होता है और तभी कुछ ठोस बुनियादी परिवर्तन सामने आ जाते हैं।
अगर अब अपने देश में ही नजर दौड़ाएं तो सभी को तीन महीने पहले तक कश्मीर का हाल याद होगा जब सब कुछ पटरी पर चल रहा था और राज्य में विकास की गति भी तेज बनी हुई थी। पर उसके बाद किस तरह अचानक से हालात बदल गए, ये भी सभी ने देखा।
तो क्या यह मुमकिन है कि भारतीय विकास की रफ्तार को लेकर जो उम्मीदें जताई जा रही हैं, वह आगे नहीं टिक पाएंगीं तथा भारत और चीन के बीच आर्थिक विकास की खाई जो लंबे समय से बनी हुई है वह उसी तरह से आगे भी बनी रहेगी जिस तरह से ओलंपिक में दोनों देशों के बीच पदकों का अंतर था।
अब जरा नजर डालते हैं कि ऐसे कौन कौन से मोर्चे हैं जिनमें भारत पिछड़ा हुआ है। सबसे पहले उस सब्सिडी का जिक्र करते हैं जिसके बोझ तले सरकार दबी जा रही है। प्रधानमंत्री ने कई दफा इस दर्द को लोगों के सामने रखा है पर वह लाचार हैं और इस बारे में खुद से कोई कदम नहीं उठा सकते। यहां तक कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण के दौरान उन्हें कहना पड़ा कि सब्सिडी को लेकर वह प्रतिबद्ध हैं।
वित्त मंत्री की भूमिका के दौरान उन्होंने एक झटके में ही निर्यात पर से सब्सिडी हटा दी थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उस दौरान रुपया काफी कमजोर था। पर फिर भी उस समय किसी ओर से विरोध का स्वर नहीं गूंजा था। कुछ ऐसा ही रुख अपनाते हुए मध्य वर्ग के लिए गैस सिलेंडर में दी जा रही सब्सिडी को भी खत्म किया जा सकता था।
साथ ही सरकारी कर्मचारियों को जो सुविधाएं मिलती हैं (कार, घर इत्यादि) उनमें भी कटौती की जा सकती थी क्योंकि उनकी तनख्वाह बढ़ाई जा चुकी थी और वह भी छठे वेतन आयोग की सिफारिशों से ज्यादा। प्रमुख औद्योगिक निवेश की दिशा में भी क्या कुछ चल रहा है यह ध्यान में रखना भी जरूरी है। सिंगुर विवाद इसका एक अच्छा उदाहरण है।
पोस्को, वेदांत और कुछ दूसरी कंपनियों को जमीन विवाद के कारण ही सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। इन मामलों में अदालत अपना फैसला भी सुना चुकी है पर फिर भी यह विश्वास करना मुश्किल है कि क्या ये फैसले परियोजना के निर्माण कार्य को शुरू कराने के लिए काफी हैं। क्या इन फैसलों के दम पर ही आगे आगे निर्माण कार्य में कोई रुकावट या परेशानी नहीं आएगी।
अगर ऐसा ही सब चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं है जब विदेशी के साथ साथ खुद भारत के निवेशक भी भारत से कतराने लगेंगे और दूसरे देशों का रुख करने लगेंगे। और अगर निवेशक ऐसा कदम उठाने लगें तो वह दिन दूर नहीं होगा जब विकास दर गंभीर चिंता का विषय बन जाएगा।
भारत की समस्याओं को और गंभीर बनाने में कमजोर बुनियादी ढांचे का भी एक बड़ा योगदान है। बिजली की किल्लत, शिक्षा व्यवस्था की लचर स्थिति इन सबका देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने में विशेष योगदान होता है। व्यक्तिगत आय के मामले में भी देश में काफी असमानता है।
किसी देश में अमीरी गरीबी के बीच की खाई को समझने के लिए यह नजारा ही काफी है- एक इलाका ऐसा है जहां प्रति वर्ग फुट अचल संपत्ति की कीमत 25,000 रुपये के करीब है और गरीबी का मंजर देखने के लिए इस रिहायशी इलाके से बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं है।
महज 25 मीटर के दायरे में आपको ऐसे सैकड़ों परिवार मिल जाएंगे जो फुटपाथ पर अपनी जिंदगी बिताने के लिए मजबूर होते हैं और उनके सिर पर प्लास्टिक की छत होती है। एक ओर दिल्ली जैसे शहर में शादियों का भव्य आयोजन किया जाता है जिनमें करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, वहीं दूसरी ओर देश की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन व्यतीत कर रही है।
आरक्षण के मसले को लेकर सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है। इन मामलों को सुलझाने के लिए कोई कदम उठाया जाना बहुत जरूरी है: शायद इन्हीं समस्याओं का समाधान नहीं ढूंढने की वजह से ही नक्सलवाद दिन प्रति दिन पैर पसारता जा रहा है। शायद हमारे साथ जो सबसे बड़ी कमजोरी है वह यह है कि हम बदलाव को बहुत सहज तौर पर स्वीकार नहीं कर पाते हैं।
पर सच्चाई तो यही है कि अगर सुधार चाहिए तो बदलाव होना जरूरी है, फिर एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कोई बदलाव हर किसी के लिए एक समान नहीं हो सकता और सबके लिए फायदेमंद हो यह भी जरूरी नहीं है। अगर कोई बदलाव सबके लिए अच्छा नहीं हो पर समाज के एक बड़े तबके के लिए प्रभावशाली हो तो भी हमें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। पर क्या हम ऐसा करते हैं?
सिंगुर और सेज, इन दोनों उदाहरणों को देखकर तो कम से कम बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता कि हम इसके लिए तैयार हैं। मैं तो यही चाहता हूं कि मेरा अविश्वास गलत साबित हो और हम आने वाले समय में भी 8 से 9 फीसदी विकास दर को हासिल कर सकें।
हमारी कश्मीर नीति : हम अलगाववादियों से तब तक समझौता नहीं कर सकते जब तक फिर से सामान्य स्थितियां बहाल नहीं हो जाती हैं। और जब हालात सामान्य हो जाएंगे तो नीतियां फिर से बैक फुट पर चली जाएंगी। आखिरकार हम यह तो नहीं चाहते की कश्मीर समस्या जैसी को समस्या बनी रहे। याद रहे कि वाजपेयी-मुशर्रफ शिखर वार्ता के खटाई में पड़ने की भी एक वजह यही थी कि हमने समस्या की जड़ को पहचानने की कोशिश ही नहीं की।