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विवादों के रेगिस्तान में फंसे बालू

Last Updated- December 06, 2022 | 10:41 PM IST

राज्यसभा की सांसद कानीमोझी बयान दे चुकी हैं। वह कह चुकी हैं कि पोत व परिवहन मंत्री टी. आर. बालू बेगुनाह हैं और उन्हें इस्तीफा देने की जरूरत नहीं है।


तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि अपनी बेटी कानीमोझी से कह चुके हैं कि बालू के भविष्य पर छाए संकट के बादल अब टल चुके हैं, कम से कम मौजूदा स्थिति तो यही है।


इस मामले में सरकार का पक्ष तो कमोबेश यही है कि बालू पर लगाए गए अपराध के आरोप को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और यह अपराध उतना बड़ा नहीं है, जिनता बड़ा बनाकर इसे परोसा जा रहा है। डीएमके के एक कार्यकर्ता की मानें, तो एनडीए के शासनकाल में मंत्री पद पर रहते हुए बालू द्वारा अपने बेटे की कंपनी को गैस कॉन्ट्रैक्ट दिलाए जाने के मुद्दे पर उस वक्त उन पर संकट की आंच तक नहीं आई, पर उन्हें अब इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।


हकीकत तो यह है कि यह पूरा मामला इन दिनों अदालत में है और इस मामले में न सिर्फ गेल (जिसे गैस की सप्लाई करनी है) और बालू परिवार की मालिकाना हक वाली दोनों कंपनियों (किंग्स इंडिया केमिकल्स कॉरपोरेशन और किंग्स इंडिया पावर कॉरपोरेशन) के बीच किसी तरह के करार पर दस्तखत भी नहीं हुआ है, बल्कि दोनों कंपनियों को रत्ती भर गैस भी मुहैया नहीं कराई गई है।


इस मामले में कोर्ट की सिंगल बेंच ने फैसला दिया था कि कंपनियों को गैस की सप्लाई की जाए, पर ऐसा नहीं किया गया और बालू परिवार इस मामले में कोर्ट की अवमानना के मुद्दे पर एक दफा फिर से कोर्ट में दस्तक दे चुका है। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह बालू के खिलाफ इकलौता मामला है।


बालू पर एक आरोप यह भी है उनकी दोनों पत्नियों और बेटों की हिस्सेदारी वाली मीनम फिशरीज (जब बालू दक्षिणी मद्रास लोकसभा क्षेत्र से चुनाव में खड़े हुए थे, तब उन्होंने चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में यह जानकारी दी थी ) को सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट से फायदा पहुंचेगा और यही वजह है कि बालू भी सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट के पक्ष में है। बालू का तर्क है कि इस प्रोजेक्ट से पोर्ट ब्लेयर और काकिनाडा के बीच का यात्रा समय काफी कम हो जाएगा और इससे समुद्री खाद्य पदार्थों के निर्यात में सहूलियत होगी।


गौरतलब है कि मीनम फिशरीज भी इसी कारोबार से जुड़ी है। इधर, भगवा ब्रिगेड सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट की लगातार मुखालफत करता रहा है। बीजेपी का आरोप है कि इस प्रोजेक्ट से भारत और लंका को जोड़ने वाले पौराणिक राम सेतु का वजूद खतरे में पड़ जाएगा। पर्यावरणविद भी इस प्रोजेक्ट के खिलाफ हैं और उनका कहना है कि सेतु समुद्रम से समुद्री जीवन पर बेहद बुरा असर पड़ेगा और इस क्षेत्र में चक्रवातों का सिलसिला तेज हो जाएगा।


साथ ही भविष्य में सुनामी जैसी लहरें भी आ सकती हैं। चूंकि दक्षिणी मद्रास लोकसभा क्षेत्र में करीब 1 लाख मछुआरे हैं और इन सबने पिछले चुनाव में बालू के लिए वोट किया है, लिहाजा बालू द्वारा उड़ाई गई कोई भी अफवाह भविष्य में बड़ी ‘सुनामी’ पैदा कर सकती है और इनसे कहीं न कहीं मछुआरों का ही नुकसान होगा।


इन तमाम मसलों से बालू पर गंभीर दबाव पैदा हो गया है और उनके विरोधी डीएमके काडर खुशनुमा अंदाज में इन पर नजर रखे हुए हैं। बालू कभी भी डीएमके की अगली कतार के नेता नहीं रहे। बहुत मुमकिन है कि पार्टी के भीतर उन्हें और भी पीछे धकेल दिया जाए। एक वक्त था जब डीएमके के काडर यह सोचते थे कि मुरासोली मारन के बाद बालू ही दिल्ली में करुणानिधि के आदमी के तौर पर काम करेंगे।


बालू, करुणानिधि की दो पत्नियों में से एक रजति (जो कानीमोझी की मां भी हैं) की काफी कद्र करते हैं और रजति द्वारा भी बालू को काफी सम्मान दिया जाता है। बालू 15 साल तक डीएमके के चेन्नई जिला सचिव रह चुके हैं और पहली दफा 1991 में उन्होंने दक्षिणी मद्रास लोकसभा क्षेत्र चुनाव लड़ा, जिसमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी। पर आगामी तीन लोकसभा चुनावों में वह लगातार इस क्षेत्र से विजयी होते रहे।


पर जब मुरासोली मारन का निधन हो गया और उनके बेटे दयानिधि दिल्ली में डीएमके की नुमाइंदगी करने लगे (जिसके तहत दिल्ली का संदेश करुणानिधि तक पहुंचाने, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से बातचीत करने आदि की बात शामिल थी), तब बालू का नाम पर्दे के पीछे चला गया। जब करुणानिधि और दयानिधि के रिश्ते खराब हुए, तब डीएमके कार्यकर्ताओं को एक दफा फिर लगा कि इस बार शायद बालू के सितारे चमकेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ।


इस बार करुणानिधि ने ए. राजा को चुना। शायद डीएमके लीडरशिप को यह लगा कि राजा एक ऐसे दलित नेता हैं, जिनमें राजनीतिक अगुआई करने जैसी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है और इसी वजह से उन्हें चुना गया। राजा को कानीमोझी का भी समर्थन मिला, क्योंकि वह मानती हैं कि दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलावादियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की मदद की जानी चाहिए।


जब गैस मसला सामने आया तो शुरू में डीएमके से कोई भी बालू के बचाव के लिए आगे नहीं आया। आज स्थिति यह है कि डीएमके के भीतर करुणानिधि के उत्तराधिकार को लेकर कई तरह की महत्वाकांक्षाएं आपस में टकरा रही हैं। ऐसे में वैसे शख्स का वजूद ही बच पाना संभव है जो किसी ग्रुप का हिस्सा हो। बालू किसी भी ऐसे ग्रुप के हिस्सा नहीं हैं, जिसका खास महत्व हो।


साफगोई से कहा जाए तो सचाई यही है कि यदि प्रधानमंत्री द्वारा बालू की जगह किसी और लाए जाने की गुजारिश करुणानिधि से की जाती, तो बालू के लिए आंसू बहाने वाला कोई भी नहीं होता। पर सवाल है कि बालू की जगह दी किसे जा सकती है? कानीमोझी को इतनी जल्दी कैबिनेट में शामिल नहीं किया जा सकता। ऐसे में बालू से यदि इस वक्त पद छोड़ने को कहा जाता, तो यह जयललिता की मांगों को मान लेना होता। फिलहाल तो बालू की जान बच गई है।

First Published - May 9, 2008 | 10:56 PM IST

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