कम से कम हो अधिग्रहण
मेधा पाटेकर
सामाजिक कार्यकर्ता
मेरा मानना है कि सरकार को कम से कम जमीन के अधिग्रहण पर जोर देना चाहिए। अंग्रेजों ने जो भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था, वह बिल्कुल अलग परिप्रेक्ष्य में बना था। अंग्रेजों को अपनी मनचाही जमीन पर अधिग्रहण करना था तो उसकी मंजूरी की उन्हें जरूरत थी।
इसकी वजह से ही उन्होंने अपनी सहूलियत के लिए ऐसे कानून को हमारे देश पर थोपा था लेकिन आज उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है। ऐसे भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द किया जाना बेहद जरूरी है। विकास नियोजन का नया कानून बनना चाहिए जिसके अंदर भूमि अधिग्रहण सार्वजनिक सख्ती से उद्देश्यों और सरकारी योजनाओं के लिए ही करना चाहिए।
नए कानून के मसौदे पर संसद में चर्चा भी की गई लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हो पाया। शरद पवार की अध्यक्षता में जो अधिकार प्राप्त समिति बनाई गई है, उसने नए कानून का मसौदा भी तैयार किया है। उस मसौदे में भूमि अधिग्रहण कानून को भी बदलने की बात की गई है तथा नया विस्थापन और पुनर्वास विधेयक लाने की भी बात की गई। इन कानूनों में हमें बहुत दिक्कत लगती है।
इस नए मसौदे में निजी कंपनियों की योजनाओं को सार्वजनिक हित के तौर पर पेश करके उनके हितों का ज्यादा ख्याल रखा जा रहा है। ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए। उद्योगों को अगर जमीन की जरूरत है तो सरकार को अपनी खाली पड़ी जमीन देनी चाहिए। लोगों की जीविका का एकमात्र साधन छीनने और खेती के लिए बेहतर जमीनों पर उद्योगों का परचम लहराने का आखिर क्या मतलब है।
खेती और उद्योग एक दूसरे के पूरक हो सकते हैं, एक दूसरे के माथे चढ़कर सामंजस्य नहीं बनाया जा सकता है। इसीलिए देश में खेती को बचाना बेहद जरूरी है- खाद्यान्न की सुरक्षा के लिए और आम लोगों की जीविका की सुरक्षा के लिए। आज देश की बहुत बड़ी जनसंख्या खेती पर ही निर्भर है ऐसे में उन्हें बेरोजगार करने वाले मशीनीकरण पर तवज्जो देना बिल्कुल सही नहीं है।
आज खुदरा में भी थोक कारोबार को भी खुदरा बनाने की बात चल रही है। लोगों को विस्थापित करके उद्योग लगाने की सरकारी कवायद बिल्कुल भी ठीक नहीं है। देश में पहले से ही कई बंद कारखाने मौजूद हैं तो सबसे पहले इन बंद कारखानों की जमीन का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
उद्योगों के लिए जमीन देने की ही बात करने से कोई फायदा नहीं है, सबसे पहले सरकार को प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए कि उद्योगों के लिए पानी और बिजली का इंतजाम कैसे होगा। उद्योगों से पहले खेती को तवज्जो देनी चाहिए लेकिन अगर औद्योगीकरण भी करना है तो उसका सही पैमाना भी तय होना चाहिए।
मसलन बड़े उद्योगों के अलावा छोटे उद्योग और मशीनीकरण के बजाय श्रम आधारित उद्योगों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार मिले। उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों के बजाय बुनियादी जरूरत के सामान तैयार करने वाली कंपनियों या कारखानों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
कई निजी कंपनियां उद्योग लगाने के नाम पर रियल एस्टेट का विकास कर रही हैं। अब सिंगुर में टाटा के प्लांट के लिए जमीन का कोई पैमाना ही तय नहीं किया गया कि उनको वास्तव में कितनी जमीन की जरूरत है। पहले कहा गया कि 350 एकड़ जमीन की जरूरत है। उसके बाद उद्योग बनाने के नाम पर ज्यादा जमीन ली गई।
सेज के कानून में उद्योगों के लिए जमीन का 50 फीसदी इस्तेमाल करने की बात है वह 80 फीसदी क्यों नहीं हो सकता। सेज कानून के अंतर्गत नीति बनाने वालों ने ऐसा कानून बनाया कि उद्योगों के नाम पर ली जाने वाली जमीन का 35 फीसदी उद्योग के लिए और 65 फीसदी किसी भी ढांचागत विकास के लिए किया जाना चाहिए।
बाद में इसमें संशोधन करके 50 फीसदी किया गया लेकिन अब भी खेती की जमीन पर उद्योगों के नाम पर गेस्ट हाउस, स्वीमिंग पूल, लॉन, बिल्डिंग, वॉटर पार्क और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का विकल्प अब भी खुला ही है। इसके लिए बसे-बसाए गांवों को उजाड़ा जाए, क्या यह सही है?
बातचीत: शिखा शालिनी
सरकार दे उद्योगों को सुविधा
तपन संगल
प्रबंधक, प्राइसवाटरहाउस कूपर्स
किसी देश के विकास में उद्योगों की अहम भूमिका किसी से छिपी नहीं रह सकी है। अपने देश की बात करें तो तेजी से होते औद्योगीकरण ने देश के विकास की रफ्तार तेज कर दी है। देश में पिछले कुछ सालों से निवेश में तेजी आई है। नतीजतन, उद्योग धंधे भी बढ़े हैं। यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। उद्योग लगाने के लिए जमीन, बुनियादी जरूरतों में से है।
कुछ कारणों से उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण के लिए विवाद होना आम बात हो गई है। आए दिन कहीं न कहीं से इस तरह की खबरें मिलती रहती हैं जो किसी भी लिहाज से सही नहीं है। इससे दुनिया भर में गलत संदेश जाएगा। बात चाहे विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए जमीन अधिग्रहण की हो या फिर टाटा की चर्चित नैनो के लिए संयंत्र लगाने के लिए जमीन अधिग्रहण की हो, विवादों का सिलसिला भी जारी है।
अब बहस यह चल रही है कि उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण का काम सरकार को करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए। मेरा मानना है कि यह काम सरकार को करना ही चाहिए और केवल यही नहीं उद्योग लगाने के लिए एक उचित माहौल मुहैया कराने की जिम्मेदारी भी सरकार की बनती है। भारत में आमतौर पर जब कोई उद्योगपति अपने बूते पर जमीन खरीदने की कवायद करता है तो कई मुश्किलें सामने आ जाती हैं।
भू-माफिया सक्रिय हो जाता है और भी कई अलग-अलग तरह के लोग अपना फायदा निकालने के काम में जुट जाते हैं। अब कोई उद्यमी अपने कारोबार की योजना और क्रियान्वयन पर ध्यान लगाए या फिर इस तरह की मुश्किलों के समाधान में जुटे। अगर राज्य को तरक्की के रास्ते पर आगे ले जाना है तो सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह उद्योगों के लिए जमीन अधिग्रहण का काम करे।
मान लीजिए किसी उद्योग के लिए 1,000 एकड़ जमीन चाहिए और बीच में कुछ जमीन ऐसी आती है जिसके मालिक जमीन नहीं देना चाहते, तब या तो योजना को रद्द करना पड़ेगा जिससे न केवल उद्यमी का नुकसान है बल्कि राज्य समेत उन लोगों का भी नुकसान है जिनको उस उद्यम के सहारे रोजगार मिलने वाला है। इस तरह की जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए तो सरकार को ही आगे कदम बढ़ाना होगा।
अब यह बात तो तय हो गई है कि तरक्की का रास्ता उद्योगों से ही होकर जाता है और हम जब तक यह बात झुठलाते रहेंगे, तब तक तरक्की की मंजिल और भी दूर होती जाएगी। देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा कम होता जा रहा है। जोतें छोटी होती जा रही हैं जिसके फलस्वरूप खेती में मुनाफा कम होता जा रहा है। गांवों में सैटेलाइट टीवी और इंटरनेट अपनी पैठ बना चुके हैं।
वहां के लोग भी अब दुनिया से रूबरू हो रहे हैं। देख रहे हैं कि दुनिया में क्या-क्या चल रहा है। लोगों का खेती की ओर से बेहद तेजी से मोहभंग होता जा रहा है। वास्तव में, ज्यादातर लोग दूसरे माध्यमों से रोजगार चाहते हैं। अभी हाल ही में सिंगुर में नैनो संयंत्र में काम ठप होने से वहां के एक स्थानीय कर्मचारी की आत्महत्या इस बात को बयां भी करती है। देश में बड़ी तादाद में आबादी अभी युवा है।
एक अनुमान के मुताबिक 2010 तक देश में 7 करोड़ लोगों को और नौकरियां चाहिए होंगी, तब इतनी बड़ी संख्या में रातों-रात तो रोजगार सृजन नहीं हो सकता। इसके लिए अभी से योजना बनानी पड़ेगी और उद्योगों के लिए बेहतर माहौल बनाना होगा। उद्योग होगा तभी रोजगार होगा। नाइकी के चेन्नई स्थित संयंत्र का ही उदाहरण लें, उसके जरिये 15,000 लोगों को रोजगार मिल रहा है।
उसमें हर तरह के लोग हैं, निचले स्तर से लेकर अधिकारी स्तर तक। इसी तरह चेन्नई मे ही नोकिया के संयंत्र में बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। कुल मिलाकर बात यह है कि तरक्की करनी है तो उद्योगों का दामन थामना ही पड़ेगा और इसमें सरकार की भूमिका भी खासी अहम है।
बातचीत: प्रणव सिरोही