उत्तर प्रदेश किस करवट बैठेगा, इसे लेकर सभी उत्सुक हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की चौथी वर्षगांठ पर जो चहल-पहल थी, उसे लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि समाजवादी पार्टी शायद कांग्रेस से चुनावी समझौता करने वाली है, जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर बदल जाएगी।
इस निष्कर्ष के पीछे प्रमुख कारण है सपा के महासचिव अमर सिंह और उनके पांच सहयोगियों की उस भोज में मौजूदगी, जो संप्रग के अंतिम एक साल के उपलक्ष्य में प्रधानमंत्री के आवास पर किया गया।
काश! इतने बड़े निर्णय इतनी आसानी से ले लिए जाते। हम पत्रकारों का काम कितना आसान हो जाता! खाने-पीने, लिखने और खिसकने का काम कौन नहीं कर सकता! लेकिन दुर्भाग्यवश राजनीति के दाव पेंचों में इस तरह के जमघट एक हथकंडा मात्र हैं, जो कई बार भ्रांतियां खड़ी करने के काम आते हैं।
तीन-चार उक्तियां हैं, जो इस भोज से निकलीं। ये अपने आप में सत्य वचन थीं, लेकिन इनका कोई अर्थ नहीं है। एक- अमर सिंह का यह कहना कि वे प्रधानमंत्री का सम्मान और आदर करते हैं। दूसरा- सोनिया गांधी का यह कहना कि वह प्रधानमंत्री का सम्मान और आदर करती हैं। तीसरा- सोनिया गांधी का यह कहना कि संप्रग को सांप्रदायिक शक्तियां कभी तोड़ नहीं पाएंगी। और चौथा- प्रधानमंत्री का यह कहना कि मुद्रास्फीति की दरअगले आठ से दस हफ्ते में नीचे आ जाएगी।
अमर सिंह ने कभी यह नहीं कहा कि वे प्रधानमंत्री का सम्मान नहीं करते हैं। उन्होंने हमेशा माना है कि मनमोहन सिंह एक ईमानदार इंसान और बेदाग नेता हैं। लेकिन सोनिया गांधी पर चुप्पी क्यों? आखिर भोज संप्रग सरकार की वर्षगांठ के लिए था, जिसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। गठबंधन को तो उन्होंने ही बेहतर ढंग से चलाया, सरकार को निर्देश भी तो उन्होंने ही दिए। तो भोज का असली मकसद क्या था?
सोनिया गांधी ने साफ कर दिया कि संप्रग सरकार की सफलता में उनकी भूमिका गौण है। यदि किसी को इसका श्रेय मिलना चाहिए तो वे प्रधानमंत्री हैं। एक ही वक्तव्य में उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि संप्रग का अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री की कार्यशैली समझने में थोड़ा समय जरूर लगता है, लेकिन उनकी सोच एक बार समझ में आ जाए तो अहसास होता है कि वे कितने खरे इंसान हैं।
लेकिन उसी भोज में अर्जुन सिंह भी थे, जिन्होंने राहुल गांधी के प्रधानमंत्री होने की बात मुखर रूप से छेड़ी थी। वे सोनिया गांधी के बगल में बैठे थे। मनमोहन सिंह अच्छे प्रधानमंत्री हैं, लेकिन यदि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की बात उठाई जाए तो क्या सोनिया गांधी ”करोड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हृदय की धड़कन” को अनसुना कर देंगी? और फिर सांप्रदायिक शक्तियों का क्या होगा?
संप्रग का इस साल का नारा है- आवाज दो हम एक हैं। यह सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन सच्चाई यह है कि तेलंगाना राष्ट्र समिति संप्रग से लड़कर बाहर निकल गई है, क्योंकि उसका कहना है कि संप्रग बनाते समय उनको यह आश्वासन दिया गया था कि उन्हें पृथक राज्य दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उधर कश्मीर में मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी और कांग्रेस के संबंध खट्टे हैं। चुनाव आते-आते यह खटास और बढ़ेगी।
झारखंड मुक्ति मोर्चा हाशिये पर है, क्योंकि उन्हें मंत्री पद नहीं दिया गया। समाजवादी पार्टी के नेता मोहन सिंह का बयान है कि यद्यपि कांग्रेस संप्रग का एक हिस्सा है, लेकिन संप्रग के अन्य घटकों के प्रति उनका रवैया जनतांत्रिक नहीं बल्कि शाही है। और कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने यह माना है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या है इस तथ्य से समझौता करना कि वह एक गठबंधन का हिस्सा है, इकलौती शक्ति नहीं।
एक मिनट के लिए इसे उत्तर प्रदेश केराजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखें- कांग्रेस यदि यह मान लेती है कि वह 10 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़कर संतुष्ट है तब तो शायद अमर सिंह ने बाजी मार ली है। वाकई भोज में खाना इतना अच्छा रहा होगा कि संप्रग ने उनका मन जीत लिया और पुरानी बातें भुला दी गईं। लेकिन क्या कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इतनी बड़ी बलि देने को तैयार है?
सपा के साथ इस तरह का एकतरफा गठबंधन करने का मतलब है- अपने राजनीतिक भविष्य की तिलांजलि देना। और आगे कई सालों तक सपा के बंधुआ मजदूरों की तरह रहना। इसमें तो कोई शक नहीं कि सांप्रदायिक शक्तियों को औंधा करने का यह एक तरीका है।
इसे प्रधानमंत्री के आश्वासन से जोड़िए, जिसमें उन्होंने कहा था कि महंगाई अगले 8-10 महीनों में कम हो जाएगी। शायद ऐसा न हो, लेकिन महंगाई की जो मार पड़ रही है, उसका असर शायद थोड़ा कम हो जाए। जब एक भोज से इतनी भ्रांतियां हो सकती हैं, तो एक और क्यों नहीं?