भारत के परिवहन क्षेत्र की बात करें तो यहां यातायात रुझानों में ठहराव, कमजोर या ऋणात्मक प्रतिफल और इसके बावजूद भविष्य के लिए असाधारण स्तर के निवेश का अजीबोगरीब परिदृश्य बना हुआ है। यह आशा की जा सकती है कि वर्षों तक हर प्रकार के परिवहन में लाखों रुपये खर्च करने के बाद अगले दो या तीन वर्षों में हवाई सफर, राजमार्ग या एक्सप्रेसवे और रेलवे परिवहन में जबरदस्त बदलाव के रूप में इस निवेश का परिणाम देखने को मिल सकता है।
परंतु विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता है। कोई भारतीय विमानन कंपनी पैसे नहीं कमा रही है और उड़ानों के दौरान घट रही घटनाओं ने सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा कर दी है जबकि यात्री विमानों में उड़ान भरने वालों की तादाद महामारी के पहले वाले स्तर पर पहुंचने लगी है। इसके बावजूद नयी विमानन कंपनी में निवेश पहले से कहीं अधिक महत्त्वाकांक्षी स्तर पर है। आकाश एयर ‘अत्यधिक सस्ती’ विमान सेवा के रूप में उड़ान शुरू करने ही वाली है। कंपनी ने 72 विमानों का ऑर्डर दिया है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी इंडिगो के पास 275 विमान हैं और उसने 700 विमानों का ऑर्डर दिया है। परंतु कंपनी के कर्मचारी वेतन कटौती आदि से नाखुश हैं। एयर इंडिया के नए मालिक (कंपनी ने 2006 के बाद नए विमान नहीं खरीदे हैं) अपने विमान बेड़े में व्यापक सुधार करने पर विचार कर रहे हैं। कंपनी के पास फिलहाल लगभग 120 विमान हैं जबकि कंपनी 300 और विमानों का ऑर्डर देने जा रही है।
समस्त नए ऑर्डर को मिला लिया जाए तो देश का मौजूदा 665 विमानों का बेड़ा दोगुने आकार का हो सकता है। जिन विमानों का ऑर्डर दिया गया है वे चरणबद्ध तरीके से आएंगे और उनमें से कई तो पुराने विमानों का स्थान लेंगे। परंतु इतने बड़े पैमाने पर विमानों का आगमन निश्चित तौर पर मांग वृद्धि पर भारी पड़ेगा। ऐसे में किराये पर दबाव पड़ सकता है जिसका नतीजा घाटे के रूप में सामने आएगा। अगर तेल कीमतें ऊंची बनी रहीं और कर भी मौजूदा स्तर पर रहे तो घाटा बढ़ना निश्चित है। जेट, किंगफिशर तथा कुछ अन्य उदाहरणों के बाद वर्तमान विमानन कंपनियों में से भी एक या अधिक बंद हो सकती हैं।
इसी तरह रेलवे में होने वाला निवेश भी अभूतपूर्व स्तर पर है। रेलवे में सकल घरेलू उत्पाद के एक प्रतिशत के बराबर सालाना निवेश किया जा रहा है। रेलवे धीरे-धीरे ‘सेमी हाई स्पीड’ ट्रेनों की शुरुआत कर रहा है जो औसतन 100 किलोमीटर की गति से यात्रा करती हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से भरे इलाकों में विस्टाडोम कोच पेश किए जा रहे हैं और रेलवे स्टेशनों के उन्नयन का एक बड़ा कार्यक्रम चल रहा है। यह बदलाव अपेक्षा से धीमी गति से हो रहा है क्योंकि डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (मौजूदा माल वहन का बड़ा हिस्सा इस पर स्थानांतरित होना है) के निर्माण की प्रगति न केवल धीमी रही है बल्कि इसकी लागत भी अनुमान से बहुत अधिक हो चुकी है। लेकिन यह भी एक हकीकत है कि अपेक्षाकृत तेज गति की ट्रेनों पर आरामदेह यात्रा छोटी दूरी के उड़ान मार्गों के साथ भी प्रतिस्पर्धा कर सकती है।
विडंबना यह है कि ये सारा कुछ तब हो रहा है जब यात्रियों की तादाद में ठहराव है जिससे भारी नुकसान हो रहा है। माल वहन में वृद्धि का धीमापन बहुत मुश्किल पैदा कर रहा है और वित्तीय स्थिति पर असर पड़ रहा है। ऐसे में राजस्व का स्तर व्यय के अनुपात में बिगड़ रहा है। ये रुझान बदल सकते हैं लेकिन रेलवे का सालाना निवेश अब राजस्व के बराबर है। इस निवेश का कोई हिस्सा परिचालन अधिशेष से नहीं है और अच्छा खासा हिस्सा बाहरी संसाधनों से आ रहा है जो बढ़ते कर्ज की वजह बन सकता है। बजट का बड़ा हिस्सा बजट सहयोग से आता रहेगा।
जहां तक सड़कों और राजमार्गों की बात है तो इनका सालाना निवेश रेलवे की तुलना में लगभग आधार है यानी सकल घरेलू उत्पाद का करीब 0.5 फीसदी। लेकिन राजस्व असंतुलन अधिक बुरी स्थिति में है क्योंकि निवेश, आय का नौ गुना है। निवेश में इजाफा होने के पहले निवेश और राजस्व लगभग बराबर थे। लेकिन देश में राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का निर्माण तेज हुआ है और बंदरगाहों को सड़क मार्ग से जोड़ने का काम तेजी से चल रहा है। इस प्रकार देश की अधोसंरचना की कमजोरी को अंतत: दूर किया जा रहा है। नए राजमार्गों पर ट्रकों का परिवहन तेज हुआ है। वस्तु एवं सेवा कर इस प्रक्रिया में मददगार है लेकिन एक ट्रक द्वारा एक दिन में तय की जाने वाली औसत दूरी अभी भी दुनिया के अन्य हिस्सों से काफी कम है। निवेश पर प्रतिफल देश के परिवहन ढांचे में निवेश से जुड़े निर्णय लेने का प्राथमिक मानक नहीं है। यही कारण है कि इसकी फंडिंग वाणिज्यिक न होकर बजट से की जाती है। परंतु चूंकि परिवहन अधोसंरचना के लिए बड़े पैमाने पर निजी फंडिंग भी चाहिए इसलिए यह बात प्रासंगिक है कि भारत आधी सदी या उससे अधिक समय तक विभिन्न क्षेत्रों के बीच के परिवहन में धीमे या न के बराबर वृद्धि हासिल करता हुआ यहां तक आया है। किसी न किसी मोड़ पर परिवहन वृद्धि को निवेश को उचित ठहराना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सरकार की परिसंपत्ति मुद्रीकरण योजना अपेक्षित आंकड़े नहीं पेश कर पाएगी। एक बार फिर हम उम्मीद ही कर सकते हैं।