नागरिक उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल का योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर गुस्से को समझना शायद ज्यादा कठिन नहीं है।
क्योंकि ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह पटेल ही हैं, जिन्हें दिल्ली एयरपोर्ट के काम में हो रही देरी के कारणों से अच्छी तरह से वाकिफ होना चाहिए। अहलूवालिया जिस अंदाज में दिल्ली एयरपोर्ट के निर्माण कार्य में लगे जीएमआर समूह के अधिकारियों से पूछ रहे हैं कि वह यहां पर ट्रैफिक का दबाव घटाने के अपने प्लान का खुलासा करें, उससे यही जाहिर होता है कि पटेल कुंभकरणी नींद सो रहे हैं।
इसीलिए उनका यह दिलचस्प बयान आया कि उन्हें यकीन है कि दिल्ली और देशभर में घूमते रहने के दौरान खस्ताहाल सड़कों और सीवेज के हालात सुधारने में अहलूवालिया कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। लेकिन जो सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक बात है, वह यह कि पटेल ने इस सिलसिले में बाकायदा अहलूवालिया को विस्तृत पत्र भी लिख भेजा।
उन्होंने यह आरोप लगाया कि दिल्ली और मुंबई एयरपोर्ट के निजीकरण में योजना आयोग के चलते देरी हुई है। यहां तक कि पटेल ने यह भी याद दिलाया है कि जब वे और अन्य मंत्री दिल्ली और मुंबई एयरपोर्टों के ठेके दिए जाने के बारे में सोच रहे थे तो योजना आयोग ने यह तर्क दिया था कि पूरा तंत्र अनिल धीरूभाई अंबानी समूह को लाभान्वित किए जाने की कवायद के लिए बनाया गया है।
जब योजना आयोग ने अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया (उस समय सभी ने यह कहा था कि इन आपत्तियों को रिकार्ड में शामिल किया जाना चाहिए) तो कैबिनेट सचिव को विभिन्न मंत्रालयों के सचिव स्तर पर इस समस्या को सुलझाने के लिए कहा गया था। अंत में यह परिणाम निकला कि लगाए गए आरोप उतने हल्के नहीं हैं, जितना कहा गया है, तो पूरे मामले को जांच के लिए दिल्ली मेट्रो के प्रमुख ई श्रीधरन को सौंप दिया गया।
श्रीधरन ने उन तथ्यों पर विचार किया जो योजना आयोग ने सामने रखे थे। बाद में आपत्तियों के मुताबिक परिवर्तन किया गया और एडीएजी की बोली नीचे चली गई गई। इसका परिणाम यह हुआ कि तकनीकी आधार पर एडीएजी लंबे समय के लिए बोली लगाने वालों में बरकरार नहीं रह सकी। जब एडीएजी इस मामले में न्यायालय में गई और कहा कि उसके साथ भेदभाव किया गया है तो न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।
इतनी कठिनाइयां होने के बाद भी उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जो समस्या की जड़ थे। इसके बजाय पटेल अब योजना आयोग पर उंगलियां उठा रहे हैं! अंतरराष्ट्रीय सलाहकार, जिन्होंने योजना में अहम भूमिका निभाई थी, उन्हें काली सूची में नहीं डाला गया, न ही उन्हें दी गई भारी भरकम फीस को वापस देने के लिए कहा गया।
पटेल की दूसरी आपत्ति यह है कि योजना आयोग कोलकाता और चेन्नई के आधुनिकीकरण में देरी कर रहा है, उसमें भी कोई दम नहीं। ( वाम दलों ने इस मामले पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी और सरकार अपनी पुरानी योजना पर वापस चली गई थी, जिसमें चार मेट्रो शहरों में सार्वजनिक-निजी हिस्सेदारी के माध्यम से आधुनिकीकरण किया जाना था।
अब चेन्नई और कोलकाता का आधुनिकीकरण सरकार द्वारा संचालित एयरपोर्ट अथॉरिटी आफ इंडिया (एएआई) करेगी, जिसका काम संतोषजनक न होने की वजह से ही निजी क्षेत्र के सहयोग की जरूरत महसूस की गई थी!) पटेल का मुख्य आरोप क्या है? एएआई जहां अगले बीस साल की स्थितियों को ध्यान में रखकर योजना बनाने की पक्षधर है वहीं योजना आयोग चाहता है कि टर्मिनल का निर्माण आगामी कुछ वर्षों में होने वाली यात्रियों की भीड़ को ध्यान में रखते हुए किया जाए।
चतुराई पूर्वक लिखे गए अपने पत्र में पटेल ने कहा है कि दिल्ली एयरपोर्ट के निर्माण में की गई गलतियों को नहीं दोहराया जाना चाहिए जो एक दशक पहले की सरकार ने योजना आयोग और उड्डयन मंत्रालय की योजना को क्रियान्वित करते हुए की थी! पटेल ने ऐसा मसला उठाने की कोशिश की है, जिससे असहमत होना मुश्किल है।
इन सबके अलावा यह कहा जा रहा था कि एएआई ने माडयुलर फैशन में टर्मिनल का निर्माण किया। अब कोलकाता में 50 लाख यात्रियों की भीड़ है और एएआई चाहता है कि टर्मिनल का निर्माण एल-शेप में किया जाए, जिससे क्षमता में बढ़ोतरी हो सके। वहीं योजना आयोग कह रहा है कि एएआई एल-टर्मिनल के आई लेग का निर्माण करे और आगामी कुछ साल के बाद दूसरे लेग का निर्माण करे, जब यात्रियों की संख्या और बढ़ जाए।
बहुत बड़ा टर्मिनल बनाए जाने पर खर्च का भार परोक्ष रूप से यात्रियों पर ही पड़ेगा। यह देखा जा रहा है कि बेंगलुरु और हैदराबाद में बड़े टर्मिनल बनाए जाने के बाद वहां खर्च में बढ़ोतरी राजनीतिक मुद्दा बन गया है। सरकार को प्राइवेट प्रोमोटर्स से यह कहना पड़ा है कि जहां तक संभव हो, किराये में कमी करे। इसका सीधा असर वहां पर निवेश करने वाले प्राइवेट प्रोमोटर्स (जीवीके और जीएमआर समूहों) पर पड़ा है, और उन्हें घाटा उठाना पड़ रहा है।
एएआई पुराने अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल को बंद किए जाने की भी योजना बना रहा है, इससे लो कास्ट कैरियर्स पर सीधा असर पड़ने की उम्मीद जताई जा रही है। वहीं दिल्ली में भी, जहां नए टर्मिनल्स का निर्माण किया जा रहा है, वहां पुराने टर्मिनलों का भी प्रयोग किया जाएगा। कोलकाता और चेन्नई भारत या दुनिया के पहले एयरपोर्ट नहीं होंगे जहां माडयुलर फैशन के एयरपोर्ट बनाए गए।
जीएमआर समूह द्वारा बनाया जा रहा हैदराबाद एयरपोर्ट भी 30-40 लाख यात्रियों की क्षमता के एयरपोर्ट से शुरुआत कर रहा है। इस क्षमता को आने वाले वर्षों में 4 करोड़ यात्रियों तक बढ़ाए जाने की योजना है।
जीएमआर समूह की योजना है कि खाली जमीन छोड़ दी जाए, जिससे बाद में रनवे का विस्तार और नए रनवे का निर्माण, भविष्य की जरूरतों के मुताबिक किया जा सके। यही रणनीति दिल्ली और बेंगलुरु में भी अपनाई जा रही है। यह सब कुछ देखते हुए कोलकाता और चेन्नई में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है, यह अनुमान लगाना कठिन है।