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…ताकि संकट के गर्त में न गिर पड़े अपना देश

Last Updated- December 07, 2022 | 4:43 PM IST

कारमेन रेनहर्ट और केनेथ रॉगऑफ अमेरिका के दो शिक्षाविद हैं। इसमें केनेथ तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुख्य अर्थशास्त्री भी रह चुके हैं।


उन्होंने हाल ही मे वित्तीय संकट पर दो शोध पत्र लिखे हैं। इसमें से एक तो अमेरिका के सब प्राइम संकट पर है, जिसे अमेरिकन इकनॉमिक एसोसिएशन की वार्षिक बैठक में इस साल की शुरुआत में पेश किया गया था। वहीं, दूसरे को नेशनल ब्यूरो ऑफ इकनॉमिक रिसर्च (एनबीईआर) की वेबसाइट (वर्किंग पेपर नंबर 13882) पर डाला गया है।

पहले में विकसित मुल्कों के 18 बैंकों के वित्तीय संकट का ब्योरा दिया गया है। इनमें से पांच वित्तीय संकटों को इस शोध पत्र में बेहद जबरदस्त संकट की संज्ञा दी गई है क्योंकि उन्होंने सरकारी खजाने को मोटा नुकसान पहुंचाया था। मजे की बात इस पांच संकटों में 1984 के अमेरिकी बचत और कर्जे के संकट को जगह नहीं दी गई है।

वजह यह बताई गई कि चूंकि इसने सरकारी खजाने को सीधे तौर पर जीडीपी के ‘केवल’ 3.2 फीसदी के बराबर क्षति पहुंचाई, इसलिए उसके मुताबिक यह बड़ा संकट नहीं हो सकता। हालांकि, इस तरह के संकटों से होने वाले पूरे घाटे का अनुमान लगाना तो नामुमकिन है। मजे की बात यह है कि इन सभी संकटों की वजहें एक जैसी ही है।

लेकिन चिंता की बात यह है कि उनमें से कई वजहें आज भारतीय अर्थव्यवस्था में भी साफ तौर पर देखी जा सकती हैं। चिंता इसलिए भी काफी ज्यादा है क्योंकि इन संकटों की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान जीडीपी विकास दर को हुआ था। उन शोध पत्रों में संकट पैदा करने के लिए जिम्मेदार कुछ बड़ी वजहों को बताया गया है। इसमें से एक है जरूरत से काफी ज्यादा की उम्मीद।

1990 के दशक में डॉटकॉम कंपनियों की आसमान छूती कीमतें और इस साल सेंसेक्स का 20 हजार अंकों के स्तर तक पहुंचना, इस बात की सबसे बड़ी नजीरें हैं। इस साल की शुरुआत में जब सेंसेक्स 20 हजार अंकों के स्तर तक पहुंच गया था, तब लोगबाग उम्मीद जता रहे थे कि वह जून तक 25 हजार और साल के आखिर तक 30 हजार अंकों के आंकड़े तक पहुंच जाएगा।

कर्जे तक आसान पहुंच और कम कीमत व ज्यादा मुनाफा की आस में लोगबाग डोलती जमीन पर भी ज्यादा से ज्यादा पैसे लगाने को तैयार रहते हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण अमेरिका में रियल एस्टेट की कीमतों का बुलबुला है। अपनी बात को सही ठहराने के लिए कहा जाता है कि वक्त बदल चुका है। हालांकि, सच्चाई तो यही है कि हकीकत हमेशा से ही कल्पना से भी ज्यादा अकल्पनीय रही है।

रियल एस्टेट और शेयर बाजार में तेज इजाफे का अंजाम हमेशा से ही तेज गिरावट रहा है। मिसाल के तौर पर जापान को ही ले लीजिए। 1980 के दशक के आखिरी सालों में टोक्यो के बीचोंबीच एक डाक टिकट के साइज की जमीन खरीदने के लिए भी पूरे 10 हजार डॉलर खर्च करने पड़ते थे। वहीं, निक्कई स्टॉक एक्सचेंज भी 40 हजार के स्तर पर था।

चिंता की बात यह है कि अपने मुल्क में भी अब इसी तरह के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। भारत में भी आज रियल एस्टेट की कीमतें आसमान छू रही हैं। साथ ही शेयरों की कीमतों में भी तेज इजाफा देखा जा सकता है। जनवरी, 2008 में कई शेयरों की कीमतें पिछले साढ़े तीन साल में चार गुनी हो चुकी थीं। वहीं चालू खाते के घाटे को जीडीपी के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो आज यह बहुत संकट की शक्ल अख्तियार कर चुका है।

18 विकसित मुल्कों में यह आंकड़ा उनके जीडीपी के 3 फीसदी से कम है। लेकिन अमेरिका में तो यह उनसे दोगुने के स्तर पर पहुंच चुका है। अपने देश में भी यह घाटा मुसीबत की शक्ल ले चुका है। अगर ‘ट्रांसफर्स’ की काफी मोटी रकम को इससे घटा भी दें तो इस वित्तीय वर्ष में कारोबारी घाटे के जीडीपी के 7 से 8 फीसदी के स्तर पर रहने की पूरी उम्मीद है।

संकट की दूसरी पहचान है जीडीपी विकास दर और सरकारी कर्जों में तेज इजाफा। इसमें से तेज विकास दर वाली बात तो अपने मुल्क पर लागू नहीं होती क्योंकि पिछले चार सालों में यह काफी हद तक स्थिर रही है। लेकिन दूसरी तरफ, अगर ठीक तरीके से मापा जाए तो राजकोषीय घाटा हाथ से बाहर निकल चुका है। इसी वजह से तो सरकारी कर्जो में भी काफी तेज इजाफा हुआ है।

अगर चालू खाते के घाटे और राजकोषीय घाटे की नजर से देखें तो भारत और अमेरिका के बीच में आपको चिंतित कर देने वाली समानताएं मिलेंगी। अंतर केवल एक ही और वह भी काफी परेशान कर देने वाला है। अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था की प्रतिद्वंद्विता बरकरार रखने के लिए डॉलर में तो काफी हद तक अवमूल्यन हो चुका है, लेकिन आज भी रुपया काफी मजबूत है।

तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे की वजह से उम्मीद है कि आगे भी रुपये में मजबूती बरकरार रहेगी। तो क्या हम बैंकिंग संकट की तरफ बढ़ रहे हैं? अमेरिकी और भारतीय अर्थव्यवस्थाओं के बीच कई समानताओं के बावजूद मुझे ऐसा नहीं लगता। परिसंपत्ति बाजार, चाहे वह रियल एस्टेट हो या फिर इक्विटी, में भारतीय बैंकों की भागीदारी न के बराबर है।

हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि हम इन समानताओं को नजरअंदाज कर दें। जहां तक एनबीईआर की वेबसाइट पर डाले गए शोध पत्र की बात है तो मैं उसमें कुछ लाइन उध्दत करना चाहूंगा। ‘पूंजी प्रवाह आज से नहीं, बल्कि सन 1800 से तो दुनिया में मौजूद है ही है। तब से लेकर अब तक तकनीक बदल चुकी है, लोगों की लंबाई कम हो चुकी है और फैशन भी काफी हद तक बदल चुका है।

फिर भी निवेशक और सरकारें खुद को लालच से बचाने में नाकामयाब रही हैं। इस वजह से अतिउत्साह यानी यूफोरिया का एक ऐसा दौर आता है, जिसका अंत अक्सर आंसुओं में होता है। काइंडेलबर्जर ने अपनी किताब ‘मानियाज, पैनिक्स एंड क्रैशेज : ए हिस्ट्री ऑफ फाइनैंशियल क्राइसिस’ के पहले चैप्टर में बिल्कुल ठीक लिखा है, संकट एक बारहमासी चीज है।’

अगर ‘वक्त बदल चुका है’ का तर्क हमेशा ठीक नहीं होता है, तो इस उल्टा भी हमेशा सही नहीं होता। मतलब, जो बात पिछले 10-20 साल में नहीं हुई है, तो इस बात की भी गारंटी नहीं है कि वह इस बार भी नहीं होगी। अक्सर करेंसी डेरेवेटिव्स के बाजार में बड़ी-बड़ी कंपनियों को खींचने के लिए बैंक इस बात का सहारा लेते हैं।

लेकिन करेंसी मार्केट की सबसे बुरी बात यही है कि यहां वे बातें ज्यादा होती हैं, जिनके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं होता है। इसलिए लोगों को यहां ज्यादा चौकस रहने की जरूरत है। आखिरकार रिस्क मैनेजमेंट का पूरा धंधा ही तो इस सवाल पर निर्भर करता है, ‘क्या होगा अगर वह एक फीसदी आशंका सच साबित हो गई?’

First Published - August 12, 2008 | 11:47 PM IST

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