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… ताकि अतीत के सफर से हो सकें हम रूबरू

Last Updated- December 07, 2022 | 4:05 PM IST

एसपीजी की कड़ी सुरक्षा के बावजूद अपने सेंट स्टीफं स कॉलेज कैंपस में मिले घर में उपिन्दर सिंह हमारा बढ़िया खैरमकदम करती हैं। कुल मिलाकर प्राकृतिक माहौल बहुत बढ़िया है।


उपिन्दर सिंह अपने छात्रों के बीच पिछले दो दशकों से प्राचीन भारतीय इतिहास की बहुत बड़ी जानकार के रूप में मशहूर रही हैं और उनकी दूसरी पहचान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तीन पुत्रियों में से एक की है। पिछले मंगलवार को उनकी नई किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ एनशिएंट एंड अर्ली मेडिएवल इंडिया’ का विमोचन किया गया।

कई मायनों में यह किताब दूसरी इतिहास की किताबों से अलग है। यह किताब बहुत खूबसूरत है। किताब के पूरे पन्ने रंगीन हैं जिसमें फोटो, मानचित्रों और रेखाचित्रों की भरमार है। वह कहती हैं कि मेरे प्रकाशक ने मुझे संकेत दिया था कि हरेक चैप्टर में औसतन 6 ब्लैक एंड व्हाइट फोटो होने चाहिएं। उनके पुराने पड़ चुके घर में हमारी बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता रहा। उनकी अलमारियों में किताबें भरी हुई हैं।

वह कहती हैं, ‘यहां पर काफी किताबें हैं और उनकी संख्या लगातार बढ़ने पर है।’ उनके पिता पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं जिनके पास पीएचडी की डिग्री है। उनकी परवरिश में बड़ी हुईं सिंह का किताबों से बहुत पुराना रिश्ता है। वह बताती हैं कि उनके घर में अर्थशास्त्र की किताबों का अंबार लगा रहता था। लेकिन अर्थशास्त्र में उनकी कभी भी रूचि नहीं रही।

उनका कहना है कि उनको हमेशा ही कल्पनाओं और सृजनात्मक चीजों ने आकर्षित किया। यह उनकी छठी किताब है। उनकी पहली किताब एक शोध के रूप में थी तो दूसरी किताब ‘एनशिएंट डेल्ही’ 1999 में आई थी। उस किताब में ऑर्कियोलॉजी की मदद से दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के इतिहास की पड़ताल की गई थी।

वह बताती हैं, ‘किताब लिखना मुझे बहुत ही मुश्किल काम लगता है। इस किताब को लिखने में भी मुझे कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है खासकर अकादमिक पाठकों को ध्यान में रखते हुए मुझे शब्दों और शैली पर खास तौर से ध्यान देना पड़ा।  इतिहास की पाठक और अध्यापिका के तौर पर मुझे लगता है कि कि इसमें पुरातात्विक आंकड़ों को भी शामिल करना चाहिए।’

उनके मुताबिक प्राचीन इतिहास पर लिखना और भी मुश्किल है क्योंकि इसके लिए स्रोत बहुत सीमित हैं। उन्होंने और उनके मित्र नयनजोत लाहिड़ी (प्राचीन भारत के इतिहासकार) ने 1990 में फरीदाबाद जिले के कई गांवों में सर्वे का काम किया था। इससे उनके पुरातात्विक अन्वेषण के शौक को और परवान चढ़ा और वह पुरानी धातुओं की खोज के काम में और तल्लीन हो गईं।

वह कहती हैं, ‘पुरातत्व से न केवल लिखने में सहूलियत होती है बल्कि आम आदमी की जिंदगी से जुड़ी चीजें भी पता लग पाती हैं। हम हजारों बरस पहले लोगों की जिंदगी से जुड़ी चीजों के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।’ उनका कहना है कि इतिहास का मानवीयकरण करना बहुत जरूरी है नहीं तो युवा पीढ़ी के लिए यह बहुत प्रासंगिक नहीं रह जाएगा।

इस किताब में उनका सबसे प्रिय पन्ना वह है जिसमें लखजोआर की निओलिथिक पेंटिंग का चित्र है। यह कई दशकों से इस खंड में (रोमिला थापर और ए एल बाशम को भी ध्यान में रखना चाहिए) हमारे इतिहास का व्यापक अध्ययन है। यह हमारे लिए सबसे अद्यतन है। वह पाठकों को बताना चाहती हैं कि इतिहासकार कैसे तथ्यों के आधार पर तर्क करते हैं? इतिहास कैसे लिखा जाता है?

उनके मुताबिक भारतीय इतिहास पर किए गए अधिकतर सर्वे आपको बहुत सतही जानकारी ही दे पाते हैं। उनके जरिये कई मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती। कई बार इतिहासकारों का काम और पुरातात्विक आंकड़े भी मेल नहीं खाते। वह कहती हैं कि उन्होंने इन स्थितियों से बचने की कोशिश की है। उन्होंने अपने अध्ययन में कई नई चीजों के बारे में बताया है जिनमें पारिवारिक जिंदगी और धार्मिक इतिहास काफी अहम हैं।

वह कहती हैं, ‘मैंने पाठक से संवाद स्थापित करने की कोशिश की है।’ पाठकों को समझाने के लिए सैंकड़ों चित्रों और दर्जनों पैनल का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा ऋगवेद और संगम (प्राचीन तमिल) से भी कुछ लिया गया है। साथ ही ‘राज्य’ की अवधारणा को समझाने के लिए बुद्ध के दर्शन का भी सहारा लिया गया है। इसके जरिये लोगों में धार्मिक इतिहास के प्रति रुचि जगेगी। हालांकि, सिंह ऐसा नहीं मानती हैं।

उनका कहना है कि धर्म को काफी लंबे समय से हाशिए पर रखा गया है। उनके मुताबिक 70 और 80 के दशक में मार्क्सवादी इतिहासकारों ने धर्म को विचारधारा के साथ जोड़कर देखा और आर्थिक इतिहास पर अधिक ध्यान दिया। उनका कहना है कि धार्मिक मान्यताओं और विचारों में कम रुचि देखी गई।

पिछले साल फरवरी में सिंह को बहुत बड़ा झटका भी लगा जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदर्शनकारियों ने इतिहास विभाग पर हल्ला बोल दिया था। उन लोगों का आरोप था कि उन्होंने ए के रामानुजन की एक पुस्तक के लेख का संपादन किया था जिसमें राम के अस्तित्व को लेकर विवाद था। उन पर लगे आरोप अभी तक सही साबित नहीं हो पाए हैं, उस समय विश्वविद्यालय ने भी पूरे तौर पर उनका बचाव किया था।

वैसे सिंह पहली और आखिरी इतिहासकार नहीं हैं जिनको इस तरह के विरोध का सामना करना पड़ा। वह कहती हैं कि हम इस मामले में कुछ नहीं कर सकते लेकिन हमें ऐसे हालातों से बचना चाहिए। वह यह भी कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि हम वास्तविक इतिहास लिखना भी बंद कर दें। उनके पति विजय तन्खा सेंट स्टीफेंस कॉलेज में ही दर्शनशास्त्र पढ़ाते हैं, उनका बड़ा बेटा वहीं पर साहित्य की पढ़ाई कर रहा है जबकि छोटा बेटा अभी अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी कर रहा है।

वह कहती हैं, ‘मैं और मेरे पति प्राचीन भारत और ग्रीक दर्शनशास्त्र के बारे में बहुत बातें कर चुके हैं। ‘ छुट्टियों में भी ये लोग किसी ऐतिहासिक स्मारक के आसपास मिल सकते हैं। वह कहती हैं कि वैसे तो वह किसी समंदर के किनारे या फिर किसी पहाड़ी पर जाना पसंद करेंगी लेकिन किसी प्राचीन स्मारक का दौरा करने से उन्हें काफी ऊर्जा मिलती है।

First Published - August 11, 2008 | 1:19 AM IST

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