सिक्किम में स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से राज्य सरकार को कम से कम 11 जल विद्युत परियोजनाओं पर काम बंद करना पड़ा।
अरुणाचल प्रदेश में बांध परियोजनाओं पर तेज रफ्तार से काम हो रहा है, लेकिन इस मुद्दे पर विरोध के स्वर भी तेज हो रहे हैं। उत्तराखंड में तो पिछले महीने गंगा पर बन रही दो परियोजनाओं पर काम रोक दिया गया, जबकि दूसरी परियोजनाओं पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में तो बांध चुनावी मुद्दा बन गए हैं।
वहां अधिकतर ऐसे ही उम्मीदवार चुनाव जीतते हैं, जो यह वादा करते हैं कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में बांध नहीं बनने देंगे। साथ ही, कई ऐसी परियोजनाएं हैं, जिनका भारी विरोध हो रहा है। चाहे थर्मल पॉवर स्टेशन हो फिर खदानें, लोगों ने सबके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। दक्षिण कोरियाई कंपनी पोस्को की उड़ीसा में बन रही लौह अयस्क की खान, स्टील प्लांट और बंदरगाह को भारी विरोध झेलना पड़ रहा है।
हालांकि, प्रधानमंत्री ने खुद उस कोरियाई कंपनी से वादा किया है कि उस परियोजना पर काम अगस्त से शुरू हो जाएगा, लेकिन स्थानीय लोगबाग इसका खासा विरोध कर रहे हैं। वजह यह है कि वे अपनी जमीन और रोजगार से अलग नहीं होना चाहते। इसके अलावा, महाराष्ट्र में रत्नागिरि के आम उत्पादक भी वहां बन रहे थर्मल पॉवर स्टेशन का कड़ा विरोध कर रहे हैं।
देश के हर उस हिस्से में लोग जबरदस्त विरोध कर रहे हैं, जहां जमीन या पानी को आम लोगों से छीनकर उद्योगों के विकास के लिए दिया जा रहा है। मानें या न मानें आज की तारीख में अपने मुल्क में कम से कम दस लाख बगावत हो रही है। मानें या न मानें, कल इन बगावतों की तादाद बढ़कर 20 लाख हो जाएगी। जरूरत है, इस बात को समझने की कि इसमें विरोध में केवल राजनीतिक मसकदों से प्रेरित लोग ही नहीं शामिल हैं, जिनका इकलौता मकसद इलाके का विकास रोकना है।
हाल ही मैं कलिंगनगर गई थी, जहां कई गांववालों ने टाटा की परियोजना के खिलाफ विरोध करते हुए अपनी जान गंवाई थी। उस वक्त मैंने यही लिखा था कि इसका वास्ता प्रतिस्पध्र्दा या नक्सलवाद से कतई नहीं है। वे तो ऐसे गरीब गांववाले हैं, जिन्हें पता है कि उनके पास इस आधुनिक दुनिया में गुजारा करने लायक कुशलता नहीं है। उन्होंने अपने आसपास के इलाकों में लोगों को अपने घरबार से बेदखल होते देखा है, जिनसे रोजगार और पैसों का वादा किया था। लेकिन उन्हें मिला कुछ भी नहीं। उन्हें पता था कि वह गरीब हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि आधुनिक विकास उन्हें और भी गरीब बना देगा।
कुछ ऐसा ही मामला मुझे गोवा में भी देखने को मिला, जहां गांव दर गांव ताकतवर माइनिंग लॉबी के खिलाफ संघर्ष करने में लगा हुआ है। आम लोगों का कहना है कि खानों से निकलने वाले कचरे से उनके खेत तबाह हो जाएंगे। साथ ही, उसकी वजह से कई नहर भी सूख जाएंगी। वे पढ़े लिखे शख्स हैं। उनमें से कुछ तो काफी हुनरमंद भी हैं, लेकिन वे खनन कंपनियों के ट्रक नहीं चलाने चाहते हैं। वे अपने खेतों से ही कमाई करना चाहते हैं, ताकि वे अच्छी ना सही, कम से कम ठीकठाक तो कमाई कर सकें।
यही इस पूरी समस्या की जड़ है। हम उन लोगों पर भरोसा ही नहीं करना चाहते, जो नौकरी के वादे पर भी अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहते। हमें केवल उनकी गरीबी दिखती है। हम उसकी वजह को नहीं समझना चाहते। यह लेख उनके लिए नहीं है, यह तो हमारे लिए है। यह बात तो साफ है कि हमें बांधों, स्टील प्लांटों और थर्मल पॉवर स्टेशनों की जरूरत है। ये सभी हमारे विकास के लिए काफी जरूरी हैं। हम इस बात को जानते हैं, इसलिए उन लोगों की उपेक्षा करते हैं। अपनी मंजिल को जल्द से जल्द से पाने के लिए हम विकास की राह पर तेजी से दौड़ रहे हैं। इसके लिए हम दो स्तरों पर एक साथ कोशिश कर रहे हैं।
पहली बात तो यह है कि हम प्रक्रिया को ठीक करने और सिंगल विंडो सिस्टम के नाम पर पर्यावरण से जुड़े कानूनों को कमजोर बना रहे हैं। ऊपर से इस बात को सही साबित करने के लिए हम यह कहने से भी बाज नहीं आते कि जो संस्थाएं क्लियरेंस दिया करती थीं, वह भ्रष्ट और काहिल हैं। हालांकि, हम यह कभी नहीं बताते कि इन संस्थाओं को काहिल और भ्रष्ट इसलिए बना दिया गया क्योंकि हमने अपनी सुविधा के मुताबिक नियम कायदे बनाए। हम यह नहीं बताते कि पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बारे में बनाई गई रिपोर्टें किसी लायक नहीं होतीं।
साथ ही, हम कंसल्टेंट्स को भी इसलिए पैसे देते हैं क्योंकि हम प्रोजेक्ट्स पास करवाना चाहते हैं, नाकि उसकी अहमियत को जांचना चाहते हैं। दूसरी बात यह है कि हम अपना सब्र बड़ी आसानी से खो रहे हैं। इसी वजह से हम अपनी इंसानियत भी दांव पर लगा रहे हैं। इस विरोध को खत्म करने के नाम पर आज हम लोगों के बीच में ही एक अजीब सी जंग में चल रही है। हमारे तरीके वही पुराने हैं। हम पहले नेताओं को ललचाने की कोशिश करते हैं। अगर वे बिकते नहीं हैं तो उन्हें धमकाया जाता है। अगर यह तरीका भी नाकाम रहता है, तो हम सरकार की गोद में छिप जाते हैं।
फिर सरकार ही उस विरोध को दबाने की कोशिश करती है। लेकिन हमें यह बात जल्द से जल्द समझनी होंगी कि हमारी तीन रणनीतियां बिल्कुल काम नहीं कर रही हैं। यह सच है कि हम कभी कभी कुछ समय के लिए जीत जाते हैं। लेकिन इन बातों से हम अपने ही घर में विरोध और गुस्से को जन्म दे रहे हैं। हम समझना होगा कि ये कोई टाइम पास आंदोलन नहीं हैं। यह अस्तित्व का सवाल है। हमारे मुल्क में आज भी बड़ी तादाद में लोगबाग कमाई के लिए जमीन, जंगल और पानी पर निर्भर हैं। उन्हें पता है कि एक बार ये चीजें उन से छीन ली गईं तो उनके लिए भविष्य के रास्ते बंद हो जाएंगे।
यह आंदोलन बेहद गरीब लोगों का विरोध है। इस संकट से निपटने के लिए कोई ऐसा रास्ता नहीं है, जिससे हम असल समस्या पर पर्दा डाल दें। इस संकट से निपटने का केवल एक ही रास्ता है, हमें कारोबार करने के अपने तरीके को बदलना होगा। इसके लिए हमें प्रति इंच भूमि, प्रति टन खनिज और पानी की हरेक बूंद के इस्तेमाल में अपनी कार्यकुशलता को बढ़ाना होगा। इसके लिए हमें स्थानीय लोगों के साथ फायदों को बांटना होगा, ताकि उन्हें सबके विकास के लिए अपनी संपदा से अलग होने के वास्ते मनाया जा सके। अगर हम गरीबों की आवाज को सुन सकें, तो इसका फायदा केवल हमें ही नहीं, पूरी दुनिया को होगा। शायद इससे पूरी दुनिया भी इस धरती की संपदाओं के इस्तेमाल को लेकर सावधानियां बरतना सीख सकें।