पिछले कुछ दिनों के हालात पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाती है कि मुल्क की रियल एस्टेट कंपनियां काफी बुरे वक्त से गुजर रही हैं।
क्रिसिल की मानें तो इस वजह से कई ऐसे प्रोजेक्टों पर देरी का ग्रहण लग सकता है, जो या तो प्लानिंग के दौर में हैं या फिर जिन पर काम शुरू हो चुका है। इसका तो यह भी मानना है कि इस सेक्टर के कई खिलाड़ियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है।
बकौल क्रिसिल, दिनोदिन कम होती मांग और बढ़ती लागत की वजह से कई बड़े नाम रियल एस्टेट के धंधे को राम-राम कह सकते हैं। रिहाइशी प्रोजेक्टों में जुटी कंपनियों पर तो खास तौर से बिजली गिर सकती है। इन कंपनियां को अपने प्रोजेक्टों के लिए सबसे ज्यादा पैसा ग्राहकों के मोटे एडवांस के रूप में ही मिलता है, लेकिन बुकिंग में आई कमी की वजह से अब उन्हें अपने प्रोजेक्टों के लिए पैसे जुटाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अब इस इमारतों को बनने में देरी हो सकती है। इसका मतलब अपनी छत की ख्वाहिश रखने वाले लोगों अब अपने घर के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा।
लोगों को इतनी परेशानी न उठानी पड़ती, अगर सरकार ने बिल्डरों पर नजर रखी होती। ऐसा लगता है कि इस मामले में हिंदुस्तानी कानून काफी कमजोर हैं। अब चीन को ही ले लीजिए। वहां डेवलपर और बिल्डर किसी रिहाइशी प्रोजेक्ट के लिए पैसा तभी ले सकते हैं, जब उसका एक तिहाई से लेकर दो तिहाई निर्माण कार्य पूरा हो चुका हो। लेकिन भारत में तो बिल्डरों के लिए तो खुला खेल फर्रुखाबादी है। भले ही उन्होंने निर्माण के नाम पर एक ईंट भी न रखी हो, लेकिन अपने मुल्क में रियल एस्टेट कंपनियां को लोगों से मोटे एडवांस लेने की पूरी इजाजत है।
ऐसे हाल में आंखों में अपनी छत का सपना पालने वालों के लिए इंतजार करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं रह जाता है। उन लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होती है, बिल्डर उनकी खून-पसीने की कमाई का इस्तेमाल कैसे कर रहे हैं। वहीं चीन में तो बिल्डरों को लोगों से एडवांस लेते वक्त यह बताना पड़ता है कि इसका इस्तेमाल वह किस काम में करेंगे। शायद, अपने मुल्क में भी ऐसे कायदे की जरूरत है, जिससे बिल्डर और डेवलपर लोगों की कमाई को यूं ही न उड़ा सकें।
फिलहाल, कुछ बिल्डर तो ऐसा ही करते दिख रहे हैं। रातोंरात बड़ा बनने की ख्वाहिश रखने वाले बिल्डरों ने जल्दबाजी में ऊंची कीमतों पर जमीन तो खरीद ली, लेकिन उन्हें अब उसकी कीमत चुकानी भारी पड़ रही है। अब जब तक हालात नहीं सुधर जाते, तब तक जमीन होने के बावजूद इन डेवलपरों के पास इतना पैसा नहीं है कि वह बिल्डिंग बनाने का काम शुरू कर सकें। ऊपर से, इसके लिए इन डेवलपरों को कोई सजा भी नहीं दी जा सकती है।
चीन में तो रियल एस्टेट कंपनियों ने जिन जमीन को खरीदा है, उसे उन्हें एक खास समय सीमा के भीतर विकसित करना होता है। इस काम में नाकामयाब रहने के बाद उन्हें मोटा टैक्स चुकाना पड़ता है। लेकिन अपने मुल्क में बिल्डरों को किसी बात की जल्दी नहीं है। वह जमीन खरीदने के बाद उसे जितना चाहें, उतने वक्त के लिए खाली छोड़ सकते हैं। एक ऐसे में मुल्क में यह वाकई काफी शर्मनाक बात है, जहां इक्का-दुक्का लोगों के पास ही अपना घर है।
चीनी डेवलपरों के पास भारतीय बिल्डरों के मुकाबले लैंडबैंक भी काफी छोटा होता है। ब्रोकिंग कंपनी सीएलएसए के मुताबिक चीनी डेवलपरों के पास जो जमीन है, उसे उन्होंने चार से 10 सालों में विकसित करने का लक्ष्य रखा है। वहीं, भारत में बिल्डरों को जमीन के एक टुकड़े को विकसित करने में 8 से 15 साल लग जाते हैं। सच कहूं तो अपने मुल्क में बिल्डरों को किसी प्रोजेक्ट के लिए अनुमति मिलने में भी काफी वक्त लग जाता है। ऐसे इसलिए क्योंकि अपने मुल्क में काफी जमीन पहले से ही कृषि भूमि के तौर पर चिन्हित है।
लेकिन इसके बावजूद रियल एस्टेट कंपनियां अपने लैंडबैंक को बड़े से बड़ा बनाना चाहती हैं। अब जब मुसीबत का दौर आया है, तो उनके पास जमीन का अच्छा-खासा बैंक तैयार हो चुका है। फिर भी वे फायदे में नहीं हैं क्योंकि उन्होंने जमीनें ऊंची कीमत पर खरीदी थीं, लेकिन अब जमीन की कीमत भी कम हो रही है। भले ही मुल्क की कई प्रॉपर्टी कंपनियों को मजबूत माना जा रहा है, लेकिन हकीकत तो यही है कि कुछेक ही मुसीबत की आंधी को झेल पाएंगी।
भारत और चीनी रियल एस्टेट कंपनियों के बीच एक और बड़ा अंतर है। सीएलएसए के मुताबिक चीन में ज्यादातर सूचीबध्द रियल एस्टेट कंपनियों का हद से हद 50 से 60 फीसदी कारोबार ही कर्ज पर चलता है। वहां की इक्का-दुक्का रियल एस्टेट कंपनियां ही ऐसी हैं, जिनका पूरा कारोबार ही कर्ज पर चलता है। लेकिन अपने मुल्क की लगभग सभी रियल एस्टेट कंपनियों के पूरा का पूरा कारोबार ही कर्ज पर चलता है। कुछ कंपनियां तो वक्त पर कर्र्ज की उगाही भी नहीं कर पाती हैं।
अब पार्श्वनाथ को ही ले लीजिए। पिछले वित्त वर्ष में उसके कर्जदारों की तादाद में 20 फीसदी का इजाफा हुआ। ज्यादा कर्ज का मतलब है कि उन्हें पूंजी के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। भारतीय रियल एस्टेट कंपनियों के आर्थिक ढांचे के बारे में भी कुछ कहना आसान नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका निर्माण कार्य पूरा होने की तादाद के आधार पर वह प्रोजेक्ट पूरा होने से पहले ही मुनाफे और बिक्री का अनुमान लगा लेते हैं। चीन में तो ऐसा चलेगा ही नहीं। वहां इन आंकड़ों को बहीखातों में तभी चढ़ाया जा सकता है, जब निर्माण कार्य पूरा हो जाए और ग्राहकों के हाथों में अपने घरों की चाभी आ जाए।
इस हिसाब से देखें तो चीन में यह पूरी प्रक्रिया भारत के मुकाबले काफी पारदर्शी है। फिर भी भारतीय रियल एस्टेट कंपनियां बेफ्रिक हैं। उनकी बेफिक्री की असल वजह यह है कि इसके बावजूद उन पर कोई उन पर उंगुली उठाने वाला नहीं है। सीएलएसए के मुताबिक इसकी वजह है, बिल्डरों की नीति निर्माताओं के साथ करीबी संबंध। चीन में भी स्थानीय सरकार और बिल्डरों के बीच अच्छे संबंध होते हैं, लेकिन वहां की केंद्र सरकार उनके नाक में नकेल डाले रखती है। भारत और चीन की प्रॉपर्टी बाजार में ज्यादा अंतर नहीं है।
वहां भी प्रॉपर्टी का बाजार मंदी के आगोश में है और ग्राहक सोच-समझकर निवेश करना चाहते हैं। लेकिन दोनों में एक बड़ा अंतर यह है कि चीन में अपने घर का सपना कोई दूर की कौड़ी नहीं है। यही वजह तो जिस कारण इतने कम प्रॉपर्टी सौदे अपने मुल्क में हो रहे हैं। अब वक्त कानूनों में बदलाव का, ताकि एक आम आदमी भी अपनी छत के सपने को पूरा कर सके।