साफ्टवेयर कंपनियों के राष्ट्रीय संगठन नैसकॉम की तरफ से 9 साल पहले मैकिंजे ने अनुमान लगाया था कि भारत का सॉफ्टवेयर और सेवा क्षेत्र का निर्यात वर्ष 2008 तक 50 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा।
1998-99 में यह कहना बहुत साहसिक काम था क्योंकि उस समय भारत का निर्यात 2.6 अरब डॉलर के आंकड़े को ही छू पाया था। हाल ही में नैसकॉम ने घोषणा की है कि 2007-08 के 40.4 अरब डॉलर के निर्यात आंकड़ों को देखते हुए परंपरागत रूप से 21-24 प्रतिशत विकास दर का अनुमान लगाया जाए तो 2008-09 में यह उद्योग 50 अरब डॉलर के साहसिक आंकड़े को छू लेगा।
अगर इस तरह का प्रदर्शन जारी रहा तो स्वाभाविक रूप से यह स्तर छूने में सफलता मिल जाएगी। यह स्पष्ट है कि उद्योग इस समय बहुत बुरे दिन देख रहा है जैसा कि 2002-03 में हुआ था जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम का बुलबुला 911 की घटना के बाद फूट गया था। इस समय अमेरिका में हाउसिंग क्षेत्र का बुलबुला फूट चुका है और सब प्राइम संकट और तेल की बढ़ती कीमतें न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं जो भारतीय सॉफ्टवेयर क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के कुल निर्यात का 60 प्रतिशत उपभोग करता है बल्कि उसका वित्तीय क्षेत्र भी बहुत महत्त्व रखता है।
उद्योग जगत को कीमतों में कटौती तो करनी ही पड रही है, साथ साथ उन्हें तमाम अमेरिकी कंपनियों के खर्चों में कटौती के चलते संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस उद्योग को एक और चुनौती का भी सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, बाजार की प्रमुख कंपनियों द्वारा भी भारतीय कारोबारियों को चुनौती मिल रही है। खरीदारों को वैश्विक स्तर पर डिलेवरी देने की भी चुनौती है, जो खरीदारों के हक में जाती है। इससे नजदीक के वेंडरों की क्षमता बढ़ रही है। इसके अलावा एक धारणा यह भी बढ़ रही है कि प्रतिस्पर्धी, अधिग्रहण के माध्यम से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
यह सोच तब बलवती हुई जब एचपी ने ईडीएस का अधिग्रहण किया, जिससे संयुक्त रूप से समुद्रपार इलाकों में व्यापार करने की क्षमता में बढ़ोतरी हुई। इसके पहले आईबीएम और एक्सेंचर द्वारा अधिग्रहण हुआ था। ऑफशोर कंसल्टेंसी थोलोंस के प्रमुख अविनाश वशिष्ठ का मानना है कि एचपी-ईडीएस का एक होना ‘साहस तोड़ने वाला और भारतीय कंपनियों के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण’ है। इससे संकेत मिलता है कि चुनौती देने वाले प्रतिस्पर्धी वर्तमान परिदृश्य पर नजर गड़ाए हुए हैं। चुनौतियां यह संकेत दे रही हैं कि वर्तमान साल बहुत कठिन है, लेकिन प्रतिस्पर्धी इससे भयभीत नहीं हैं।
2008 की पहली छमाही में वैश्विक अधिग्रहण कर चुनौतियां देने वाली कंपनियों से आगे रहे। ग्राहकों ने कार्यों की आउटसोर्सिंग जारी रखी और ‘उनके काम का प्रमुख हिस्सा प्रमुख भारतीय कंपनियों की बजाय बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हिस्से में जाता रहा।’ बहुमुखी व्यवसाय का ज्ञान और या सपाट, पुराना प्रशिक्षण उन प्रमुख भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती साबित हो रही है, जो खाली जगह को भरने के लिए अधिग्रहण करना चाहते हैं। वे पाते हैं कि, ‘बहुराष्ट्रीय कंपनियां ग्राहकों को संतुष्ट करने के मामले में अधिक प्रतिस्पर्धी हैं, जिन्हें वैश्विक अनुभव है और जो वैश्विक डिलेवरी दे सकती हैं।’ इसके साथ ही वे कहते हैं कि ‘जहां एक साल पहले तक भारत की तीन प्रमुख कंपनियां हाशिये पर थीं, वहीं इस साल बहुराष्ट्रीय कंपनियां नई पींगें बढ़ा रही हैं।’
टीपीआई के भारत के प्रमुख सिध्दार्थ पई इस बात से सहमत हैं कि नए खेल में वैश्विक क्षमता हासिल करना आउटसोर्सिंग पर बुरा प्रभाव डालेंगी। ग्राहक यह उम्मीद करते हैं कि वेंडर अपने कार्यों और भौगोलिक स्थिति, दोनों में प्रतिस्पर्धी हों। वैश्विक स्तर पर उपस्थिति दर्ज कराने के मामले में प्रमुख भारतीय कंपनियां अभी पीछे हैं। उपभोक्ता की भौगोलिक स्थिति और सेवा में पई अंतर करते हैं। उनका कहना है कि भारतीय कंपयिनां जो पहले से ही पूरी क्षमता से काम कर रही हैं उन्हें डिलेवरी के मामले में वैश्विक आकार लेने की जरूरत है। बहरहाल वे भारत की प्रमुख कंपनियों पर कोई खतरा नहीं देख रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘वे प्रतिस्पर्धा के दौर में भी तेजी से आगे बढ़ेंगी लेकिन यह विकास दर उनके पहले की विकास दर से कम रहेगी।’ इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि तीन बड़ी कंपनियां 5 अरब डॉलर की श्रेणी में खड़ी हो जाएं और अप्लीकेशन डेवलपमेंट ऐंड मेंटीनेंस (एडीएम) क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन करें। पिछले साल तक प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियां तेजी से आगे बढ़ी हैं। गार्टनर के मुताबिक, भारत की टाप 6 फर्मों ने वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी 2006 के 1.9 प्रतिशत से बढ़ाकर 2007 में 2.4 प्रतिशत की है।
बाजार की हिस्सेदारी के लिहाज से देखें तो यह वृध्दि, तेजी को दर्शाती है। लेकिन खास बात यह है कि बाजार में अभी ढेरों संभावनाएं मौजूद हैं। पूरे बाजार के आंकड़ों पर गौर करें तो इन 6 कंपनियों ने 1000 लाख डॉलर के सौदे किए हैं। वे सलाह पर आधारित कामों और रिमोट इंफ्रास्ट्रक्चर मैनेजमेंट में तेजी से बढ़ रही हैं। इस तरह के सौदे स्थिर नहीं हुए हैं बल्कि इसमें साल-दर-साल बढ़ोतरी हो रही है। इस ट्रेंड को देखते हुए फारेस्टर पाते हैं कि टॉप की तीन कंपनियां आगे बढ़ रही हैं। अब उनके खाते में सॉफ्टवेयर के कुल निर्यात का 46.6 प्रतिशत जाता है, जो 2004 में 26 प्रतिशत था।
तीन प्रमुख कंपनियां, अन्य की तुलना में न केवल आगे बढ़ रही हैं बल्कि उन्हें ज्यादा फायदा हो रहा है और प्रति कर्मचारी के हिसाब से भी उनका राजस्व अधिक है। सॉफ्टवेयर और सेवा क्षेत्र की यह वास्तविक तस्वीर नहीं है, जिसमें बीपीओ निर्यात भी शामिल है। यह 2007-08 में 109 लाख डॉलर के आंकड़े को छू चुका है। बीपीओ कंपनियों पर अलग से विचार किए जाने की भी जरूरत है। इस क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों जैसे जेनपैक्ट और डब्ल्यूएनएस के प्रदर्शन पर भी ध्यान देना होगा।
बीपीओ क्षेत्र बढ़ रहा है ऐसे में वैल्यू चेन का निर्माण बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। प्रोसेस और नॉलेज आउटसोर्सिंग की जगह अब वॉयस और ट्रांजेक्शन का व्यवसाय बढ़ रहा है। अगले 9-10 साल में आने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए काम किए जाने पर निश्चित रूप से वे अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल साबित होंगे।