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सॉफ्टवेयर में मंदी का वायरस

Last Updated- December 07, 2022 | 12:05 PM IST

अमेरिकी मंदी की चुभन अब हिंदुस्तानी सॉफ्टवेयर उद्योग के बड़े नामों को भी महसूस होने लगी है। यह तो होना ही था क्योंकि अमेरिका उनका सबसे बड़ा खरीदार जो ठहरा।


फिर भी इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में रुपये में आई तेज गिरावट ने उनकी लाज रख ली। इसी वजह से तो आज की तारीख में वे इतनी तेज रफ्तार के साथ आगे बढ़ रही हैं। यही इकलौती वजह है, जिसके कारण विप्रो और इन्फोसिस अप्रैल-जून तिमाही में पिछले साल के मुकाबले 27 फीसदी और 42 फीसदी ज्यादा मुनाफा कमाने में कामयाब रहीं।

हालांकि पिछली तिमाही (जनवरी-मार्च) के चश्मे से देखें तो टीसीएस ने मोटी कमाई की, जबकि इन्फोसिस ने थोड़ा-बहुत ही मुनाफा कमाया। वहीं, विप्रो तो घाटे में चली गई। इसी वजह से तो कहानी में यह मोड़ आया। दरअसल, पिछले साल रुपये में आई मजबूती की वजह से इन कंपनियों के प्रदर्शन पर इतना जबरदस्त असर पड़ा कि उन्हें उससे दो-दो हाथ करने के लिए खास तैयारी करनी पड़ी। लेकिन उन्होंने मुद्रा बाजार की उस उठा-पटक के बारे में सोचा ही नहीं, जिसकी वजह से रुपया कमजोर हो गया। इसी वजह से तो विप्रो घाटे के जंजाल में फंस गई।

दरअसल, अब उसे अपने 35 करोड़ डॉलर (1,470 करोड़ रुपये) के मोटे ताजे कर्जे को चुकाने का इंतजाम करना है। अगर हालात नहीं सुधरे तो इसके लिए कंपनी को बाजार से पैसा उठाना पड़ेगा। यह तो बस नजीर भर है उस उठा-पटक की, जो हिंदुस्तानी सॉफ्टवेयर कंपनियों को झेलनी पड़ती है। इसकी वजह से तो रुपये की कमजोरी के बावजूद भी उन्हें मुनाफा कमाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। रुपये की कमजोरी की वजह से इन कंपनियों की कमाई में तो इजाफा हुआ, लेकिन अब भी उनका मुनाफा खतरे में है। इसी वजह से तो इन तीनों कंपनियों के शुध्द मुनाफे में काफी कमी आई है।

वजह है, वेतन में इजाफा और कीमतों को कम करने के लिए पड़ता जबरदस्त दबाव। ऊपर से अमेरिकी वित्तीय बाजार में मंदी के हालात अभी बने रहने की आशंका को देखते हुए भी कीमतों में हाल-फिलहाल इजाफे की कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। इन कंपनियों का अब तक यही कहना रहा था कि जब उनके अमेरिकी खरीदारों पर लागत कम करने का बोझ बढ़ता है, तो वह ऑउटसोर्सिंग को बढ़ा देते हैं।  लेकिन आज की तारीख में अमेरिकी कंपनियों की बैलेंसशीट दिनोदिन कमजोर होती जा रही है।

ऐसे में अगर वे ज्यादा काम ऑउटसोर्स भी करेंगी, तो उनके लिए पैसे भी कम ही चुकाना पसंद करेंगी। इसीलिए आने वक्त चुनौतियों से भरा होगा। इस दुख भरी कहानी में अच्छी बात यही है कि हिंदुस्तानी सॉफ्टवेयर कंपनियों ने अब चुनौतियों का डट कर सामना करना सीख लिया है। इस दौर की तुलना 2002-03 के उस वक्त के साथ की जा रही है, जब दुनिया भर में टेक्नोलॉजी और टेलीकॉम सेक्टर का बुलबुला अचानक फूट गया था।

ऊपर से अमेरिका पर हुए 911 के हमले ने भी आग में घी काम किया और सॉफ्टवेयर कंपनियों की हालत पतली हो गई। तब के मुकाबले ये बड़ी कंपनियां मुसीबतों और मंदी का सामना करने में ज्यादा सक्षम हो चुकी हैं। यह तीनों कंपनियां उस रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं, जिस रफ्तार खुद भारतीय उद्योग आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। साथ ही, मुल्क के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर भी कमा रही हैं। हालांकि, यह छोटी कंपनियों के लिए खतरे की घंटी है।

First Published - July 21, 2008 | 12:22 AM IST

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