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बीपीसीएल के निजीकरण से पहले कुछ जरूरी कदम

Last Updated- December 11, 2022 | 2:45 PM IST

करीब एक पखवाड़ा पहले पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा कि भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी बीपीसीएल के प्रस्तावित निजीकरण पर अब विचार नहीं किया जा रहा है। पुरी ने मुंबई में एनर्जी टेक्नॉलजी मीट से इतर कहा, ‘हम विनिवेश करना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसी ​स्थिति में नहीं रह सकते जहां केवल एक बोली लगाने वाला हो…, फिलहाल इस पर विचार नहीं किया जा रहा है।’ जानकारी के मुताबिक इस रुख का समर्थन करते हुए निवेश एवं सार्वजनिक परिसंप​त्ति प्रबंधन विभाग ने भी कहा है, ‘वैश्विक ऊर्जा बाजार में मौजूदा हालात के चलते इसमें रुचि रखने वाले अ​धिकांश योग्य पक्षों ने बीपीसीएल की मौजूदा विनिवेश प्रक्रिया में भागीदारी में असमर्थता व्यक्त की है।’

इस निर्णय के बाद केंद्र सरकार के लिए 2022-23 का विनिवेश लक्ष्य हासिल करना जहां और मु​श्किल हो गया है, वहीं बीपीसीएल में सरकार की 53 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया को स्थगित करने की वजह केवल बाजार के हालात अथवा केवल एक ही बोली लगाने वाले का होना नहीं है। बीपीसीएल के निजीकरण की प्रक्रिया को कठिन बनाने वाली एक और वजह देश के तेल क्षेत्र में मौजूद नीतिगत माहौल भी है। नि​श्चित तौर पर बीपीसीएल के लिए बोली लगाने वालों की कतार तब तक नहीं लगेगी जब तक कि उन मूल्य नीतियों में सुधार नहीं किया जाता है जो पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ी कंपनियों को संचालित करती हैं।

याद रहे कि अतीत में कई सरकारों ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने का प्रयास किया लेकिन वे प्रयास इस क्षेत्र पर कुछ खास प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहे। यहां चिंतित करने वाला पहलू यह है कि उन कदमों से ऐसी धारणा बनी कि तेल कीमतें विनियमित हो गई हैं और अब तेल रिफाइनर उनकी कीमतें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं। परंतु पिछले दो दशक पर करीबी निगाह डालें तो आपको पता चलेगा कि इस मोर्चे पर बहुत कम प्रगति हुई है। तेल कीमतें वैसी ही विनियमित हैं जैसे कि 1970 और 1980 के दशक में अन्य उत्पाद थे। 

तेल क्षेत्र के लिए मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था को आ​धिकारिक रूप से 2002 में भंग किया गया था। इसके तहत तेल पूल खाते को खत्म किया गया और तेल कंपनियों को यह आजादी दी गई कि वे अपने उत्पाद की कीमत लागत और प्रतिफल के अपने आकलन के आधार पर तय करें। इस क्षेत्र में दबदबा रखने वाली सरकारी तेल कंपनियों ने समय-समय पर कीमतों में बदलाव शुरू कर दिया।

यह सही है कि तेल कंपनियां लगभग हर पखवाड़े कीमतें तय कर रही थीं लेकिन इसमें एक पेच था। वे ऐसा तभी कर सकती थीं जब एक तरह से तेल मंत्रालय मंजूरी दे। तेल कंपनियों को खुद कीमत तय करने की आजादी नहीं थी। वि​भिन्न कंपनियों की खुदरा कीमत लगभग बराबर थी और वे कीमतों में लगभग एक सा बदलाव करती थीं। यह समूह बनाकर कीमतें तय करने का मामला था लेकिन इस पर खास नाराजगी नहीं जताई गई।

इससे भी बुरी बात यह है कि तेल कंपनियों को यह जो थोड़ी बहुत स्वतंत्रता हासिल थी वह भी तब छिन गई जब 2004 में अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें बढ़नी शुरू होने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पूर्ण नियंत्रण करने का निर्णय ले लिया। 2009 तक पांच वर्षों में तेल कंपनियों के पास कीमतें तय करने का अ​धिकार नहीं रहा। 2010 में हालात बदले और पेट्रोल कीमतों को तथा कुछ वर्ष बाद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा डीजल कीमतों को नियंत्रण मुक्त कर दिया गया।

परंतु इससे समस्याएं हल नहीं हुईं। पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में सरकार का अप्रत्यक्ष दखल बना रहा। अक्सर आम चुनाव या विधानसभा चुनाव के ऐन पहले सरकार के सुझाव पर कीमतों में इजाफा करना रोक दिया जाता। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से घटते तो सरकार कीमतें बढ़ाकर कुछ धनरा​शि जुटाने का प्रयास करती और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर कीमतों में की गई बढ़ोतरी को कुछ कम कर देती। तेल रिफाइनरों और विपणन कंपनियों को वास्तव में कभी अपने उत्पाद का मूल्य तय करने की वास्तविक आजादी नहीं मिली। यही कारण है कि तेल कंपनियां कभी मूल्य निर्धारण की एक पारदर्शी व्यवस्था नहीं बना सकीं।

इन हालात में निजी क्षेत्र की कंपनियों को पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री के लिए खुदरा नेटवर्क कायम करने देने की नीति भी कुछ खास प्रगति नहीं कर सकी। कुछ कंपनियां खुदरा कारोबार में आईं जरूर लेकिन जल्दी ही उन्होंने परिचालन बंद कर दिया या आकार कम कर लिया। उन्हें पता चल गया कि एक तरह से सरकार के नियंत्रण वाली मूल्य निर्धारण व्यवस्था में कारोबार करना जो​खिम और प​रेशानियों से भरा हुआ था। सन 2006 में सरकार ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड की स्थापना की ताकि उपभोक्ताओं, पेट्रोलियम, पेट्रोलियम उत्पादों तथा प्राकृतिक गैस से संबं​धित गतिवि​धियों में लगी कंपनियों के हितों का बचाव किया जा सके तथा प्रतिस्पर्धी बाजार को बढ़ावा दिया जा सके। उसे यह अ​धिकार भी दिया गया कि वह पेट्रोलियम, पेट्रोलियम उत्पादों तथा प्राकृतिक गैस के परिशोधन, प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन, वितरण तथा विपणन का विनियमन करे। लेकिन अब तक नियामक ने देश भर में ​पेट्रोलियम उत्पादों के विपणन और बिक्री को लेकर शायद ही कदम उठाया हो।

ऐसे निराशाजनक हालात में शायद यही उपयुक्त लगा हो कि बीपीसीएल के निजीकरण को स्थगित कर दिया जाए। ऐसी कोई भी कवायद केवल तभी की जानी चाहिए जब पेट्रोल और डीजल समेत पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों और वितरण से संबं​धित नियामकीय और नीतिगत कमियों को दूर कर लिया जाए। इससे यह सुनि​श्चित होगा कि ऊर्जा बाजार अ​स्थिर होंगे तब भी सरकार को बीपीसीएल की नीलामी में अच्छी तादाद में बोली लगाने वाले मिलेंगे।

यकीनन पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों के मामले में नियामकीय और नीतिगत कमियों को दूर करना एक बड़ी चुनौती होगी क्योंकि सरकारें आ​र्थिक रूप से कमजोर लोगों को विपरीत असर से बचाने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों को अपने नियंत्रण में रखना चाहती हैं। यही कारण है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सुधार की चर्चा उस समय होती है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अपेक्षाकृत कम हों और कीमतें बढ़ते ही इन बातों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इसके साथ ही तेल विपणन कंपनियों को राजनीति प्रेरित कदमों से भी बचाने की जरूरत है ताकि पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों को ​स्थिर रखने या कम करने से रोका जा सके। ऐसी ​स्थिरता निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित करेगी कि वह इस क्षेत्र में खुदरा कारोबार शुरू करे और तब बीपीसीएल के विनिवेश का मामला भी अधिक आकर्षक नजर आएगा।

यानी बेहतर यही है कि तेल विपणन कंपनियों को एक प्रतिस्पर्धी माहौल में खुदरा कीमतें तय करने की पूरी आजादी दी जाए। इसके साथ ही सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों का एक स​ब्सिडी वाला दायरा घो​षित कर सकती है जैसा वह घरेलू गैस के लिए करती है। पेट्रोल और डीजल उपभोक्ता इन उत्पादों का बाजार मूल्य चुका सकते हैं लेकिन इस लेनदेन को आधार से जोड़ा जाना चाहिए ताकि उपभोक्ता अगर चाहें तो वे स​ब्सिडी और बाजार मूल्य के बीच का अंतर प्राप्त कर सकें। इस अंतर को सीधे उनके बैंक खातों में जमा किया जा सकता है।

स​ब्सिडी वाली घरेलू गैस में यह व्यवस्था लागू है। इसे पेट्रोल और डीजल में भी अपनाया जा सकता है। हां, यहां आय और संप​त्ति के आधार पर कुछ विशेष तबकों को अलग किया जा सकता है। चूंकि स​ब्सिडी की रा​शि को सीधे सरकार उपभोक्ताओं को देगी इसलिए कंपनियों की लागत और उनका प्रतिफल अ​धिक पारदर्शी बनेंगे। उस ​स्थिति में निजी क्षेत्र को नए निवेश के लिए आक​र्षित करना तथा बीपीसीएल का विनिवेश करना भी शायद बेहतर परिणाम प्रदान करे। 

First Published - September 28, 2022 | 9:29 PM IST

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