तकरीबन पांच दशक तक भारत का झंडा बुलंद करने वाले भारतीय नौसेना के पहले विमानवाहक पोत के नए अवतार आईएनएस विक्रांत का नौसेना में शामिल होना हमारे लिए जश्न का मौका है। मूल पोत 16,000 टन का था और यह उससे करीब तीन गुना वजनी यानी 42,800 टन का है। यह न केवल देश में डिजाइन किया गया और बनाया गया सबसे बड़ा युद्धपोत है बल्कि यह पूरी तरह स्वदेशी डिजाइन का है।
यह गर्व का विषय है क्योंकि इसने भारत को ऐसा युद्धपोत बनाने वाले शीर्ष देशों में शुमार कर दिया है। दुनिया में ऐसा करने वाले देश गिनेचुने हैं। वैसे फिलहाल हम ब्रिटेन को शामिल नहीं कर रहे हैं। ऐसी राष्ट्रीय कामयाबी का जश्न न मनाने वाला कोई दुर्लभ व्यक्ति ही होगा या शायद युद्ध से नफरत करने वाला और शांति पर जोर देने वाला कोई व्यक्ति। चूंकि हम इन दोनों में नहीं आते इसलिए भारतीय नौसेना, उसके शानदार डिजाइन ब्यूरो, इंजीनियरों, समुद्री मामलों में दूरदर्शिता बरतने वालों और अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल से अब तक के तीन प्रधानमंत्रियों को इसकी बधाई पहुंचे। उनके नेतृत्व में ही इस मेक इन इंडिया या आत्मनिर्भर विमानवाहक पोत के डिजाइन पर काम शुरू हुआ। सुरक्षा मामलों की उनके ही नेतृत्व वाली कैबिनेट समिति ने 2002 में परियोजना को मंजूरी दी।
हम पूछ सकते हैं कि भारत को इस पोत को बनाने में 23 वर्ष का समय क्यों लगा खासकर तब जबकि चीन इससे बड़ा पोत केवल तीन से चार वर्ष में बना ले रहा है। वैसे भी नए विक्रांत के इंजन अमेरिका में बने हैं। चीन के पास पहले ही दो पूरी तरह संचालित विमानवाहक पोत हैं। उनमें से एक पूरी तरह स्वदेशी है और उसका आकार नए विक्रांत से तकरीबन दोगुना है। वह विक्रांत की तुलना में कहीं अधिक तादाद में और ज्यादा घातक लड़ाकू विमान ढो सकता है। चीन तीसरा विमानवाहक पोत अगले वर्ष तक परिचालन में ला सकता है और यह एक लाख टन श्रेणी का पोत होगा। परंतु भारत के रक्षा विनिर्माण में देरी की समस्या आम है। अब वक्त आ गया है कि हम भविष्य के बारे में खुले दिमाग से विचार करें। ऐसे में तीन प्रश्न उत्पन्न होते हैं:
इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है: क्या भारत को विमानवाहक पोत की आवश्यकता है? अगर हां तो किस तरह के और कितने पोत? तीसरा प्रश्न यह है कि इन शक्तिशाली पोतों से भारत को किस तरह के मारक अस्त्रों का इस्तेमाल करना चाहिए और ये कहां से आएंगे? बीते 75 वर्षों से अधिक समय से नौसैनिक क्षेत्र में एक शाश्वत बहस चल रही है और वह है ‘पोत बनाम पनडुब्बी’ की बहस। दूसरे विश्वयुद्ध के समय अमेरिका और जापान के विशालकाय पोतों ने समुद्री जंग में एक नया पहलू जोड़ा। जर्मनी ने अपनी पनडुब्बियों पर भरोसा किया।
यहीं पर यह बहस उत्पन्न हुई कि विमानवाहक पोतों की मदद से समुद्र पर नियंत्रण किया जाए या पनडुब्बियों की मदद से दुश्मन को नियंत्रण न करने दिया जाए। लगभग पूरे शीतयुद्ध के दौरान पश्चिमी देश मूल अमेरिकी सिद्धांत का पालन करते रहे जबकि सोवियत नौसेना और उसके खेमे के देश पनडुब्बियों में निवेश करते रहे। उन्होंने अत्यंत घातक और खामोशी से परिचालित होने वाली बेहतरीन पनडुब्बियों का बेड़ा बनाया। इस बहस के बारे में जो कुछ पढ़ने को मिलता है उसके मुताबिक तो सोवियत नौसेना में पनडुब्बियों का होना वैचारिक मामला तो था ही, इसके पीछे लागत की दलील भी थी। सोवियत संघ के नेता जानते थे कि वे बड़े विमानवाहक पोत और उससे जुड़ी हवाई क्षमता के मामले में अमीर पश्चिमी देशों का मुकाबला नहीं कर सकते।
ऐसे में उन्हें प्रतिरोधक क्षमता विकसित करनी थी और दुश्मन को समुद्री क्षेत्र का प्रयोग करने से रोककर सामरिक संतुलन कायम रखना था। वे यह खतरा बनाकर रखना चाहते थे कि विमानवाहक पोत के नष्ट होने से भी बड़ा नुकसान संभव था। हमें इस बारे में पुष्ट जानकारी है कि कैसे 1971 की जंग के समय अमेरिका का सातवां जंगी बेड़ा भारत की ओर बढ़ा था और सोवियत पनडुब्बियों ने उसका पीछा किया था। शीत युद्ध के अंतिम दशकों में इनमें बदलाव आने लगा। सोवियत धड़ा आगे बढ़ा और उसने छोटा विमानवाहक पोत बनाया। विडंबना ही है कि उसने उसे एडमिरल गोर्शकोव का नाम दिया जो उसकी पनडुब्बी और मिसाइल आधारित नौसेना के संस्थापक थे। सोवियत संघ ने वही पोत भारत को बेचा जिसे विक्रमादित्य का नाम दिया गया जो अब भारत का ध्वजवाहक है। इसका आकार बढ़ाकर 44,500 टन किया गया। इस बीच भारतीय नौसेना ने एक अन्य पुराने ब्रिटिश पोत एचएमएस हर्मीज को खरीदा जिसने आईएनएस विराट के रूप में सेवा दी। यह पहले विक्रांत से भी बड़े आकार का था।
देश के सैन्य उपकरणों और प्रशिक्षण में बड़ी हिस्सेदारी सोवियत और रूसी घटकों की रही। सन 1964 के बाद नौसेना को विमानवाहक पोत ने आकर्षित किया। सन 1942 में रॉयल नेवी ने मैजेस्टिक क्लास के नाम से नए विमानवाहक पोत बेड़े में शामिल किए। इनमें कई तो युद्ध समाप्त होने तक आधे-अधूरे ही बने थे। एचएमएस हर्क्यूलीज को भारत ने खरीदा और बेलफास्ट में पूरा कराया। यही पहला आईएनएस विक्रांत बना।
इसके साथ ही भारत में विमानवाहक पोत बनाम पनडुब्बी की करीब एक दशक पुरानी बहस का अंत हो गया, हालांकि इसके नतीजे कुछ दिक्कतदेह ही रहे। सन 1965 की जंग ऐसी नहीं रही जिसे भारतीय नौसेना याद करना चाहेगी। पाकिस्तानी नौसेना गुजरात के तट पर द्वारका के बहुत करीब तक पहुंच गई थी (जाहिर है इसका धार्मिक मकसद भी था) और उसने बंदूकें तैनात कर दी थीं। भारतीय नौसेना लड़ाई में नहीं उतरी। इसका कारण केवल यह नहीं था कि विक्रांत हमेशा की तरह सूखे बंदरगाह पर था बल्कि उसे पीएनएस गाजी से भी खतरा था। पीएनएस गाजी उपमहाद्वीप की इकलौती पनडुब्बी थी।
इसके बाद ही भारत ने सोवियत संघ से अपनी पहली पनडुब्बी फॉक्सट्रोट्स हासिल की। परंतु सन 1971 में एक बार फिर विक्रांत को अरब सागर से दूर ले जाना पड़ा क्योंकि उसे पुन: गाजी से खतरा था। हालांकि गाजी को विशाखापत्तनम के निकट एक ऑपरेशन में डुबा दिया गया। वहीं आईएनएस खुकरी को भी दीव के निकट डुबा दिया गया।
सैन्य सिद्धांत आमतौर पर काफी टिकाऊ होते हैं और नौसैनिक सिद्धांत तो और भी अधिक। भारतीय नौसेना ने कई विमानवाहक पोत आधारित सैन्य बलों के विचार को अपने करीब रखा है। पूंजीगत लागत, अतीत में देश में निर्माण की अक्षमता और राजनीतिक कारणों से शायद ही कभी एक साथ दो विमानवाहक पोत रखने के बारे में सोचा गया। यहां हम उन तीन सवालों पर वापस आते हैं जो हमने पहले उठाए थे।
मैंने यह प्रश्न कार्नेगी एंडाउमेंट के ऐश्ली टेलिस के सामने उठाया था जिनका नाम भारतीय रणनीतिक समुदाय के बीच जाना पहचाना है। उनका कहना था कि इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले यह तय करना होगा कि भारत के भूराजनीतिक लक्ष्य क्या हैं? अगर ये लक्ष्य 1,000 किलोमीटर के दायरे में सीमित हैं तो उसे किसी विमानवाहक पोत की आवश्यकता नहीं है। जाहिर है यह कराची और ग्वादर को आसानी से अपने दायरे में ले लेगा लेकिन इन इलाकों को तट पर स्थित विमानों की मदद से आसानी से कवर किया जा सकता है। खासकर ऐसे विमानों के जरिये जो हवा में ही ईंधन भर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इरादा ज्यादा दूरदराज इलाकों को कवर करने का है, मसलन पूर्वी अफ्रीका या दक्षिण-पूर्वी एशिया तक तो हमें विमानवाहक पोतों की आवश्यकता है। लेकिन तब प्रश्न है कि किस प्रकार के विमानवाहक? वह कहते हैं कि भारतीय नौसेना ने अब तक बहुत खराब चयन किए हैं।
उसने महंगे और छोटे विमानवाहक पोत बनाए या खरीदे हैं जिन पर बहुत कम गोला-बारूद रखा जा सकता है। फिलहाल इन पोतों से करीब 20 मिग-29के विमान उड़ाए जा सकते हैं जो ज्यादा दूर तक मार नहीं कर सकते, इन पर बहुत कम हथियार रखे जा सकते हैं और ये बहुत कम समय के लिए तैनात हो सकते हैं। हम जानते हैं कि नौसेना ने हाल ही में राफेल और एफ/ए-18 विमानों का परीक्षण किया है। ये मिग-29 की तुलना में कम से कम दोगुना दायरा रखते हैं और इन पर हथियार भी अधिक लादे जा सकते हैं। लेकिन वह कहते हैं कि ये विमानवाहक पोत कोई असर छोड़ने के लिहाज से बहुत छोटे हैं। वह कहते हैं कि अमेरिकी नौसेना में 40 वर्ष का शोध और अनुभव बताता है कि एक संभावित शक्ति बनने के लिए विमानवाहक पोत 65,000 टन से अधिक क्षमता वाला होना चाहिए।
भारतीय नौसेना अपना तीसरा विमानवाहक पोत इसी क्षमता वाला चाहती है। परंतु यहां एक बार फिर तादाद, लागत, विमान आदि का प्रश्न उठेगा। इनके लिए कहीं न कहीं से तो पैसा जुटाना ही होगा। क्या इसका असर पनडुब्बियों पर होगा या अधिक प्रभावी मिसाइलों या अन्य पोतों पर, वायु सेना पर या थल सेना पर? भारतीय सैन्य एवं राजनीतिक नेतृत्व को इन कड़े प्रश्नों से दो-चार होना पड़ेगा। फिलहाल आइये नए आईएनएस विक्रांत के आगमन का जश्न मनाते हैं। इससे पहले कि इस पोत पर से पहला विमान परीक्षण उड़ान भरे, यह शाश्वत सैद्धांतिक बहस पैदा हो चुकी है।