अभिनव बिंद्रा पहले ऐसे खिलाड़ी नहीं हैं जिन्होंने यह कहा है कि महज क्रिकेट के दम पर भारत उन देशों की सूची में शुमार नहीं हो सकता जो खेल में आगे हैं, पर शायद ओलंपिक में स्वर्ण जीतने के बाद उनके बयान का महत्त्व जरूर बढ़ गया है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर जैसी जीत बिंद्रा ने हासिल की है, उस तरीके की जीतों में सरकार की ओर से मदद न के बराबर रही है और विभिन्न कंपनियों ने भी थोड़ा बहुत योगदान दिया है।
चाहे गोल्फर जीव मिल्खा सिंह हों, शतरंज के बादशाह विश्वनाथन आनंद (जिन्हें लगता है कि उन्हें स्पेन में बसना चाहिए), बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण, पेस और भूपति या फिर खुद बिंद्रा (जिनके पिता हर साल उनके प्रशिक्षण पर लगभग एक करोड़ रुपये खर्च करते हैं), सफलता के लिए उन्हें खुद ही प्रयास करने पडे हैं।
अगर भारत चाहता है कि उसे ऐसी सफलता बड़े पैमाने पर मिले तो खेलों के विकास के लिए और अधिक खर्च करना पड़ेगा और खिलाड़ियों का प्रदर्शन बेहतर बनाने के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करना होगा। वहीं गैर साम्यवादी देशों में खेलों के विकास के लिए जितना सरकार ने किया है उससे कहीं अधिक बाजार की ताकतों ने उनकी मदद की है। पर भारतीय खिलाड़ियों को किसी भी ओर से मदद नहीं मिल सकी है।
सरकार खुद उदार कही जाने वाली बाजार अर्थव्यवस्था से जूझती रही है, वहीं दूसरी ओर जितने भी खेल निकाय हैं, जैसे फुटबॉल, हॉकी या एथलीट सब पर राजनीतिज्ञों ने कब्जा जमा लिया है। ऐसे में जहां चीन ने अधिकारवादी तरीकों के जरिए खेल पर पकड़ बनाई है, पश्चिमी देशों ने खेल में छिपे मनोरंजन की शक्ति को पहचाना है, वहीं भारत इन सभी मामलों में मुंह ताकता रह गया है।
भारत में पैसे पर सरकार का नियंत्रण रहता है और खेल निकायों को जब इसे खर्च करने का अधिकार दिया जाता है तो ऐसे खेल संघ भी यह प्रभावशाली ढंग से कर नहीं पाते हैं। और आखिरकार इसका नतीजा यह होता है कि ओलंपिक में महज 100 भारतीय खिलाड़ियों पर 236 अधिकारी। हालांकि इतना जरूर है कि सेना की ओर से इस दिशा में थोड़ा बहुत सहयोग किया गया है।
यह सेना की मदद का ही नतीजा है कि राज्यवर्द्धन राठौड़ जैसे उम्दा खिलाड़ी देश को मिले हैं। एक दशक पहले की बात है कि भारतीय स्टेट बैंक, रेलवे और इंडियन एयरलाइंस खिलाड़ियों को नौकरी देकर अपनी ओर से मदद किया करते थे। अब देश को अच्छे कोच तैयार करने के लिए खर्च करने की जरूरत है और साथ ही विशेष तरीके की खेल निकाय बनाने की जरूरत है जहां अच्छे खिलाड़ी तैयार किए जा सकें।
हालांकि कुछ ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने खिलाड़ियों को प्रायोजित किया है और कुछ बड़े समूह अब खेलों में निवेश करने की योजना बना रहे हैं। पर अगर इनके बलबूते पर यह उम्मीद की जाए कि अचानक से खेलों में सफलताएं मिलने लगेंगी तो शायद यह बेमानी ही होगा। वास्तव में अगर खेलों में सुधार की अपेक्षा है तो आम लोगों का सहयोग बहुत जरूरी होगा।
क्रिकेट के इंडियन प्रीमियर लीग से ही यह बात साफ हो चुकी है कि मनोरंजन के लिए भारतीय दर्शक अब केवल फिल्मों और टीवी सीरियलों की ख्वाहिश नहीं रखते हैं। अगर भारतीय भी खेल को मनोरंजन के साधन के रूप में लेने लगें तो निश्चित तौर पर इससे कारोबार की कई संभावनाएं भी विकसित होंगी।