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संपूर्ण पोषण का एक अद्भुत स्रोत वास्तव में न तो कोई अनाज है और न ही मांसाहारी खाद्य पदार्थ। इसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल, महत्त्वपूर्ण विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। यह एक जलीय जीव है, जो सूर्य की ऊर्जा से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं तैयार करता है। यह सुपरफूड है स्पाइरुलिना जिसमें वजन के हिसाब से 65 से 70 फीसदी तक प्रोटीन है और यह वास्तव में नीले-हरे शैवाल का एक रूप है जो कई अरब वर्षों से प्रकृति में मौजूद है।
स्पाइरुलिना की खासियत यह है कि यह खराब गुणवत्ता वाले पानी और कठिन परिस्थितियों में भी पनप सकता है जिसमें अधिकांश फसलें उग ही नहीं पातीं। सुव्यवस्थित मत्स्यपालन वाले केंद्रों में इन शैवाल की किस्में मात्र दो-तीन दिनों में अपनी मात्रा दोगुनी कर लेती हैं और केवल 10 से 14 दिनों में कटाई योग्य हो जाती हैं। इसके अलावा, स्पाइरुलिना वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को भी अवशोषित करता है जिससे यह प्राकृतिक कार्बन सिंक के रूप में भी काम करता है।
भारत जैसे देश के लिए स्पाइरुलिना किसी वरदान से कम नहीं हो सकता, जहां कुपोषण और विशेष रूप से प्रोटीन की कमी तथा एनीमिया का व्यापक प्रसार है। वर्ष 2019-21 के दौरान कराए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, पांच वर्ष से कम उम्र के 35.5 फीसदी बच्चों का कद उनकी उम्र के लिहाज से कम है जबकि 19.3 फीसदी बच्चों का अपनी कद के हिसाब से कम वजन है और वे बेहद कमजोर या दुबले हैं। लगभग 58 फीसदी बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं और 32.1 फीसदी बच्चे बेहद कम वजन वाले हैं। वयस्कों में भी कुपोषण की स्थिति चिंताजनक है और करीब 23 फीसदी महिलाएं और 20 फीसदी पुरुषों का वजन कम है।
दुनिया भर में इस गैर-परंपरागत खाद्य वस्तु, स्पाइरुलिना का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि इसकी वृद्धि में मुख्यतौर पर फिटनेस के प्रति जागरूक लोगों का योगदान है जिन्हें इसकी पौष्टिकता वाले गुणों की जानकारी है जबकि वास्तव में इसकी सबसे अधिक आवश्यकता कुपोषित लोगों को है। आज स्वास्थ्य उत्पाद बेचने वाले दुकानों में स्पाइरुलिना से बने टैबलेट, कैप्सूल, स्मूदी और एनर्जी बार आसानी से उपलब्ध हैं। ये पोषक तत्त्वों से भरपूर उत्पाद न केवल शरीर को ऊर्जा देते हैं बल्कि ये रोग प्रतिरोधक क्षमता भी देते हैं क्योंकि इनमें उच्च स्तर का एंटी ऑक्सीडेंट है।
स्पाइरुलिना में विटामिन ए, सी और ई प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो त्वचा की कोशिकाओं के दोबारा बनने में सहायक होते हैं और त्वचा को स्वस्थ बनाए रखते हैं। यह कोलेस्ट्रॉल कम करने और रक्तचाप नियंत्रित रखने में भी मदद करता है, जिससे हृदय स्वस्थ रहता है। साथ ही, यह लीवर और किडनी के कार्य को बेहतर बनाकर शरीर से भारी धातुओं और हानिकारक तत्वों को बाहर निकालने में भी सहायक माना जाता है।
हालांकि विकसित देशों की तुलना में भारत में स्पाइरुलिना आधारित खाद्य उत्पादों का उत्पादन और उपभोग अब भी काफी कम है। कई विकसित देशों में यह अब केवल फिटनेस प्रेमियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि बुजुर्गों और शारीरिक रूप से कमजोर लोगों के नियमित आहार का हिस्सा बन चुका है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा भी अंतरिक्ष यात्राओं के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों के भोजन में स्पाइरुलिना को शामिल करती रही है जिसके नतीजे बेहतर हैं।
अच्छी बात यह है कि अब भारत में भी कई मत्स्य और जलीय कृषि से जुड़े किसान, स्पाइरुलिना की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे इसका उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती मांग और अधिक मुनाफा के कारण इसकी खेती करने के लिए लोग प्रोत्साहित हो रहे हैं। आज स्पाइरुलिना खेती को कृषि का एक उच्च मूल्य वाला क्षेत्र माना जाने लगा है। सामान्यतौर पर इसकी खेती छोटे जलाशयों या एक एकड़ से कम क्षेत्र वाले तालाबों में की जाती है। पानी के रिसाव को रोकने के लिए इन तालाबों को अक्सर कंक्रीट या प्लास्टिक शीट से ढका जाता है।
भारत का दक्षिणी क्षेत्र स्पाइरुलिना उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है जहां पूरे वर्ष गर्म जलवायु और पर्याप्त धूप उपलब्ध रहती है। महाराष्ट्र और तेलंगाना में भी इसकी खेती हो रही है क्योंकि वहां पर्याप्त धूप और गर्म मौसम उपलब्ध है। तमिलनाडु देश का सबसे बड़ा स्पाइरुलिना उत्पादक राज्य बन चुका है, जबकि इसके बाद कर्नाटक और आंध्र प्रदेश का स्थान आता है। देश में प्रतिवर्ष लगभग 2,000 से 2,500 टन स्पाइरुलिना का उत्पादन होता है, जिसमें अकेले तमिलनाडु का योगदान लगभग 1,500 टन है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक का उत्पादन क्रमशः लगभग 300 और 400 टन आंका गया है।
कई किसानों ने अब नियंत्रित वातावरण में स्पाइरुलिना उत्पादन की आधुनिक इकाइयां भी तैयार की हैं। हालांकि इसमें अधिक लागत आती है लेकिन ऐसी खेती का उत्पाद 10,000 से 15,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिकता है। इस कारण यह खेती खाद्य और नकदी फसलों में सबसे अधिक लाभदायक मानी जा रही है। खुले तालाबों में उगाए गए स्पाइरुलिना की कीमत भी 5,000 से 8,000 रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद अब वैज्ञानिक तरीके से स्पाइरुलिना की खेती को बढ़ावा दे रहा है। नई दिल्ली में मौजूद भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने हाल ही में स्पाइरुलिना की खेती, प्रसंस्करण, मार्केटिंग और इससे बने मूल्यवर्धित उत्पादों पर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया। स्पाइरुलिना उद्योग के अनुमान के अनुसार, इसकी वार्षिक मांग में वर्तमान में 15 से 20 फीसदी की दर से वृद्धि हो रही है।
माना जा रहा है कि जैसे-जैसे लोगों में इसके स्वास्थ्य लाभों के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, इसकी मांग और भी तेजी से बढ़ सकती है। सरकार को चाहिए कि वह स्पाइरुलिना और इससे बने मूल्यवर्धित उत्पादों को अपनी पोषण संबंधी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से बढ़ावा दे। विशेष रूप से कृषि मंत्रालय द्वारा हाल ही में शुरू किए गए ‘सेहत मिशन’ में इसे शामिल किया जा सकता है। इस मिशन का उद्देश्य नए तरह के और पौष्टिक खाद्य पदार्थों के माध्यम से बेहतर पोषण सुनिश्चित करना है। स्पाइरुलिना इस पहल के लिए पूरी तरह उपयोगी खाद्य पदार्थ साबित हो सकता है।