पंजाब की स्टील इकाइयों को मजदूरों की कमी की समस्या का सामना पहले ही करना पड़ रहा था। पर अब इसमें एक कारण और जुड़ गया और स्टील की कीमतों में बढ़ोतरी के वजह से कई बंद होती गईं।
फिलहाल बढ़ती हुई महंगाई के कारण संकट बरकरार है। पंजाब में छोटे और मझोले उद्योगों के लिए समस्याओं का दौर कभी खत्म ही नहीं होता है। स्टील की कीमतों पर नियंत्रण लगाने में सरकार को लगभग एक महीने लगे। हालांकि लुधियाना में छोटे और मझोले उद्योगों के लिए बेहतर नतीजे पाना मुमकिन न हो सका।
इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट प्रोमोशनल काउंसिल के क्षेत्रीय चेयरमैन एस. सी. रेहलान के मुताबिक स्टील की कीमतों का मुद्दा बरकरार है। इस महीने की शुरूआत में स्टील की बार की कीमत 33,300 रुपये प्रति टन थी जो अब 42,000 रुपये प्रति टन हो गई है यानी इसमें 26 प्रतिशत का इजाफा हुआ। रेहलान कहते हैं कि स्टील गुट और स्टील के निर्यात पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार भले ही कई उपाय कर रही हो लेकिन फिर भी पंजाब की इस्रपात इंडस्ट्री मुनाफा नहीं कमा पा रही है।
शिकायती लहजे में उनका कहना है कि जब स्टील उत्पादों पर निर्यात शुल्क लगाया जाता है तब स्टील उत्पादकों ने इंजीनियरिंग इंडस्ट्री के लिए स्टील की आपूर्ति को काफी सीमित कर दिया था। स्टील उत्पादों पर निर्यात शुल्क खत्म करने की संभावना है जिससे एक बार फिर से स्टील की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना है। रेहलान कहते हैं कि इंजीनियरिंग उद्योग इस स्थिति में नहीं हैं कि वे अपने आप को चला सकें। राज्य के कई उद्योगपतियों ने दूसरे कारोबार में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया है जिसमें रियल एस्टेट भी शामिल है।
रेहलान के मुताबिक जब तक छोटे और मझोले उद्योगों को बचाने के लिए कोई कदम नहीं उठाए जाएंगे, इस तरह के दूसरे कारोबार में किस्मत आजमाने का चलन जारी रहेगा। लुधियाना के यूनाइटेड साइकिल और पार्टस मैन्यूफैक्चरिंग एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डी. एस. चावला कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों में केवल स्टील ही नहीं बल्कि दूसरे कच्चे माल की कीमतों में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। दिसंबर में माइल्ड स्टील राउंड बार की कीमतें 27,000 रुपये प्रति टन थीं जो जून में बढ़कर 47,000 रुपये प्रति टन होर् गईं। इसी तरह दिसंबर में एचबी वायर की कीमत 32,000 रुपये प्रति टन थी जो अब 54,000 रुपए प्रति टन हो चुकी है।
दिसंबर में रबर की कीमतें 100 रुपये प्रति किलोग्राम थी जो अब 148 रुपये प्रति किलोग्राम हो चुकी है। चावला का कहना है कि स्टील की कीमतों में पहले से ही बढ़ने के कारण लुधियाना के कई छोटे उद्योग साइकिल के पुर्जे बनाने के काम में जुट गए। दूसरे उद्योगों ने अपने उत्पादन में 30 से 35 प्रतिशत की कटौती की। हालांकि अब साइकिल बनाने वाले दूसरे पार्ट्स की कीमतों में भी बढ़ोतरी हुई। इसके बेहद गंभीर नतीजे हो सकते हैं। पंजाब के छोटे और मझोले उद्योगों के विकास में एक बाधा फरनेस ऑयल की कीमतों के कारण भी है।
एपेक्स चैंबर ऑफ कामर्स ऐंड इंडस्ट्री के प्रेसीडेंट पी. डी. शर्मा कहते हैं कि दो साल पहले फरनेस ऑयल की कीमत 13 रुपये प्रति लीटर थी जो अब 38 रुपये लीटर हो गई है। शर्मा अफसोस जताते हुए कहते है कि केंद्र ने राज्य सरकार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर बिक्री कर में कटौती करने को कहा।
लेकिन साइकिल और ढलाई उद्योग में इस्तेमाल होने वाले फरनेस ऑयल की कीमतों में कमी के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। भारतीय रिजर्व बैंक सीआरआर और रेपो रेट बढ़ा दी है जिससे उद्योगपतियों को आशंका है कि पीएलआर भी बढ़ जाएगी। कई छोटे और मझोले उद्योग अपनी वित्तीय समस्या के हल के लिए बैंकों पर निर्भर होते हैं और पीएलआर बढ़ रही है। इसी वजह से छोटे और मझोले उद्योगों के लिए मुश्किलों भरे दिन आने वाले हैं।