महंगाई दर से लड़ने के लिए प्राथमिक इस्पात उत्पादकों पर दबाव डालने लेकिन लौह अयस्क के दामों पर अंकुश लगाने के वास्ते खास कुछ नहीं करने के सरकार के निर्णय से एक अजीब स्थिति पैदा हो गई है।
इस महीने की शुरुआत में इस्पात उत्पादक तीन महीनों के लिए कीमतें स्थिर रखने पर सहमत हो गए थे और उन्होंने कुछ कीमतें बढ़ाने का हाल का फैसला वापस ले लिया था।
लेकिन लौह अयस्क के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया जो इस्पात उत्पादकों का प्रमुख कच्चा माल है और कुल लागत में इसका हिस्सा करीब 35 प्रतिशत होता है। ज्यादातर इस्पात निर्माताओं की अपनी खदानें नहीं हैं और वे राज्य सरकार के नियंत्रण वाली नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कार्पोरेशन (एनएमडीसी) से इसकी खरीद करते हैं। यह भी केंद्र सरकार के इस्पात मंत्रालय के अधीन आता है।
इस तरह से महंगाई रोकने के लिए लगता है कि मंत्रालय का एक हिस्सा यह नहीं जानना चाहता है कि दूसरा हिस्सा क्या कर रहा है। पिछले अक्टूबर महीने में एनएमडीसी ने घरेलू इस्पात निर्माताओं के लिए लौह अयस्क की कीमतों में 47 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी कर दी, जबकि वह अपने समुद्रपार के ग्राहकों को कम कीमत पर कच्चा माल देती है। विदेश के बड़े ग्राहकों जैसे जापानी और कोरियाई स्टील मिलों की तुलना में घरेलू कारोबारियों से 97-231 प्रतिशत ज्यादा पैसा लिया जाता है।
स्टील फर्में अपने लाभ में गिरावट आने की भी उम्मीद कर रही हैं। इस्पात मंत्रालय को निश्चित रूप से इन सवालों का जवाब देना चाहिए। लौह अयस्क की कीमतों में बढ़ोतरी से अक्टूबर के बाद मोटी कमाई हुई, वहीं इस्पात उत्पादकों ने जनवरी के बाद से कई बार कीमतें बढ़ाईं और फिर वापस भी ले लीं। कोकिंग कोल की भी कीमतें तेजी से बढ़ीं हैं।
जहां तक घरेलू और विदेशी उत्पादकों को दिए जाने वाले लौह अयस्क की कीमतों का सवाल है, विदेशी उत्पादकों से लंबे समय के लिए समझौते होते हैं और इसकी समीक्षा एक साल बाद ही होती है। लंबे समय तक बाजार में बने रहने और प्रतिस्पर्धा बरकरार रखने के लिए जिंस की कीमतों में उछाल और गिरावट के मुताबिक बाजार का संचालन नहीं होना चाहिए।
निश्चित रूप से जापान और कोरिया के खरीदार मोलभाव करेंगे, लेकिन वे बाजार के सिध्दहस्त खिलाड़ी हैं। वे वैश्विक बाजार में कीमतों का एक मानक तय कर लेंगे। भारतीय कर की वर्जनाएं समय के साथ टूटी हैं, ऐसे में यह अव्यावहारिक है कि भारत सरकार घरेलू इस्पात की कीमतों पर लगाम लगाने की कोशिश करे। कच्चे माल और तैयार माल की कीमतों में अंतर कम होने पर कीमतें अपने आप तय हो जाएंगी।
हालांकि इससे वह असमानता नहीं दूर होगी कि टाटा स्टील और सेल के पास खुद की खदानें हैं और आरआईएनएल तथा एस्सार स्टील के पास नहीं है। खदानों के आवंटन में सुधार करके उत्पादकों को ही खदानें मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि एक बार ऐसा हो जाता है तो खदानों के आवंटन में भी देरी नहीं होगी। ऐसा तभी हो सकता है जब नई खनन नीति लागू हो।