वर्ष 2018 में 19 जून को जिस दिन आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड की सीईओ चंदा कोछड़ छुट्टी पर गईं और संदीप बख्शी ने इसके मुख्य परिचालन अधिकारी का पदभार संभाला, उस दिन बैंक का शेयर 4 फीसदी चढ़ा। इसके साढ़े तीन महीने बाद अक्टूबर में जब कोछड़ ने इस्तीफा दिया और बख्शी को सीईओ बनाया गया तो शेयर 5.8 फीसदी उछल गया। कई साल पहले वर्ष 2007 के आखिर में जब बाजार को यह भनक लगी कि एबीएन एमरो बैंक एनवी के कार्यकारी उपाध्यक्ष (कंट्री एक्जीक्यूटिव भारत और यूएई एवं उपमहाद्वीप के प्रमुख रमेश सोबती इंडसइंड बैंक लिमिटेड के प्रमुख बनने जा रहे हैं तो इस निजी बैंक का शेयर उछलकर दोगुने से ज्यादा पर पहुंच गया। सोबती ने फरवरी 2008 में कमान संभाली। अब हाल में 13 जून, 2022 पर आते हैं। आरबीएल बैंक लिमिटेड ने सप्ताहांत में घोषणा की थी कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने उसके सीईओ और एमडी के रूप में आर सुब्रमण्यकुमार की नियुक्ति को मंजूरी दे दी है। इसके बाद बैंक का शेयर 22.45 फीसदी फिसलकर 87.9 रुपये पर बंद हुआ, जो उसका अब तक का सबसे निचला स्तर था।
विश्ववीर आहूजा बैंकिंग नियामक की तरफ से एक अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किए जाने और निस्संदेह आरबीआई के उनके कार्यकाल को बढ़ाने से इनकार करने के विरोध में दिसंबर में छह महीने की छुट्टी (अपना कार्यकाल खत्म होने के साथ ही) पर चले गए, जिसके बाद राजीव आहूजा ही कामकाज संभाल रहे थे। एक अन्य पुराने निजी बैंक के प्रमुख की तरह आहूजा को भी एक साल का कार्यकाल मिला था, जो जून में खत्म होना था। अन्य बैंकर को एक साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद तीन का साल का दूसरा कार्यकाल मिल गया, लेकिन आहूजा इतने भाग्यशाली नहीं रहे। अगर उन्हें तीन साल का कार्यकाल मिलता तो वह आरबीएल बैंक के प्रमुख के तौर पर 15 साल पूरे करते, जो नियामक द्वारा स्वीकृत अधिकतम अवधि है।
ऐसे में सवाल उठता है कि बैंक का शेयर क्यों गिरा? प्रथम दृष्टया आरबीएल बैंक किसी किसी समस्या से नहीं घिरा है। यह येस बैंक लिमिटेड से इतर किसी धोखाधड़ी का शिकार नहीं है। यह वृद्धि के लिए असीमित महत्त्वाकांक्षा का मामला है। असल में आरबीएल एकमात्र ऐसा बैंक है, जिसने वित्त वर्ष 2022 में 74.74 करोड़ रुपये का घाटा दर्ज किया, जबकि आलोच्य वर्ष में इस उद्योग ने अब तक का सबसे अधिक शुद्ध लाभ दर्ज किया है। लेकिन बैंक के वित्तीय आंकड़े इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। वित्त वर्ष 2022 में बैंक के कुल फंसा कर्ज (एनपीए) मामूली बढ़कर 4.34 फीसदी से 4.4 फीसदी पर पहुंच गया। हालांकि प्रावधान के बाद शुद्ध एनपीए 2.12 फीसदी से घटकर 1.34 फीसदी पर आ गया है। इसका प्रावधान कवरेज अनुपात मार्च में 70.4 फीसदी और पूंजी पर्याप्तता अनुपात 16.8 फीसदी था। तरलता कवरेज अनुपात भी नियामकीय जरूरत से काफी अधिक था। जब आरबीआई द्वारा नियुक्त निदेशक इसके बोर्ड में शामिल हुआ और आहूजा छुट्टी पर चले गए, उस समय दिसंबर में कुछ बड़ी जमाओं की निकासी के बावजूद इसका जमा पोर्टफोलियो वित्त वर्ष 2022 में 8 फीसदी बढ़कर 79,000 करोड़ रुपये को पार कर गया। इसमें से 35.3 फीसदी जमाएं चालू एवं बचत खातों की हैं। इसका अग्रिम पोर्टफोलियो महज 2 फीसदी बढ़ा मगर बैंक की पूरी बैलेंस शीट में कुछ भी चिंताजनक नहीं है।
ऐसे में शेयर क्यों लुढ़का? एक कारण यह हो सकता है कि इससे तत्काल पहले सुब्रमण्यकुमार प्रशासक के रूप में ऋणग्रस्त दीवान हाउसिंग फाइनैंस कॉर्प के परिसमापन का कामकाज संभाल रहे थे। निवेशकों ने शायद यह महूसस किया होगा कि वे यहां भी उसी काम- परिसमापन के लिए आ रहे हैं। हालांकि यह सही नहीं है। सुब्रमण्यकुमार के लिंक्डइन प्रोफाइल में उन्हें ‘संकट से उबारने वाला विशेषज्ञ’, ‘वित्तीय समावेशन सलाहकार एवं परामर्शदाता,’ ‘बैंकिंग तकनीक विशेषज्ञ’ बताया गया है। इसमें उनकी आईटी प्रबंधन, अनुपालन, प्रशासन और ऑडिट आदि में विशेषज्ञता का भी जिक्र किया गया है।
आरबीएल बैंक का मामला तेज वृद्धि से जुड़ा है। वर्ष 2010 से इसके ऋण करीब 1,100 करोड़ रुपये से बढ़कर 60,000 करोड़ रुपये के पार निकल गए हैं, जबकि जमा पोर्टफोलियो 1,600 करोड़ रुपये से बढ़कर 79,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। इसके करीब 2,000 करोड़ रुपये के कॉरपोरेट ऋण फंसने के बावजूद इसकी पूंजी में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। यह देनदारियों और बिना संपत्ति गिरवी रखे परिसंपत्ति ऋण देने के लिए मोटी जमाओं पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर वित्त वर्ष 2020 से आरबीआई के निशाने पर है। इसके ऋण पोर्टफोलियो में बिना संपत्ति गिरवी वाला क्रेडिट कार्ड कारोबार करीब 20 फीसदी था, जो इस उद्योग में सबसे अधिक है। बैंक परिसंपत्ति वृद्धि के मामले में धीरे चल रहा है। यह जोखिम प्रबंधन एवं अंडरराइटिंग नियमों और छोटी खुदरा जमाओं पर ध्यान दे रहा है तथा बिना संपत्ति गिरवी वाले अपने सूक्ष्म खुदरा ऋणों में कमी ला रहा है। यह प्रणाली, प्रक्रियाएं और तकनीकी प्लेटफॉर्म बनाने पर निवेश कर रहा है। हालांकि आरबीएल बैंक किसी संकट में नहीं है, लेकिन इसके सीईओ को चुना जाना चौंकाने वाला है। मैं बैंक के बोर्ड की खोज समिति द्वारा छांटे गए दो उम्मीदवारों की तुलनात्मक खूबियों का आकलन नहीं कर सकता हूं। लेकिन यह एक दुर्लभ मौका है, जब आरबीआई ने बैंक के प्रमुख के लिए सौंपी गई सूची में पहले के बजाय दूसरे व्यक्ति को चुना।
आम तौर पर नियामक उम्मीदवारों की काबिलियत के पचड़े में नहीं पड़ता है और अगर व्यक्ति अयोग्य नहीं पाया जाता है तो पहले नाम को स्वत: ही मंजूरी मिल जाती है। इस मामले में यह वजह नहीं हो सकती क्योंकि सूची में पहले व्यक्ति-स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक की क्लस्टर मुख्य कार्याधिकारी (भारत एवं दक्षिण एशियाई बाजार- बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका) जरीन दारुवाला को अप्रैल से तीन साल का नया कार्यकाल मिला था। सुब्रमण्यकुमार ने 1980 में पंजाब नैशनल बैंक से अपना बैंकिग करियर शुरू किया था। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के इस बड़े बैंक में तीन साल तक बिज़नेस ट्रांसफॉर्मशन की अगुआई की। इसके बाद वह इंडियन बैंक के कार्यकारी निदेशक बने और इंडियन ओवरसीज बैंक के एमडी और सीईओ के रूप में सेवानिवृत्त हुए। इस 62 साल के पुराने बैंकर को आरबीएल बैंक की समस्याओं के समाधान का अनुभव है।
दारुवाला को लेकर आप क्या कहेंगे? क्या वह अपनी विदेशी बैंक की पृष्ठभूमि के कारण सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त नहीं हैं? उन्होंने प्रख्यात चार्टर्ड अकाउंटेंट और आरबीआई के वाईएच मालेगाम बोर्ड में सबसे लंबे समय तक निदेशक रहने के बाद बैंकिंग में अपना पहला अनुभव विकास वित्त संस्थान आईसीआईसीआई लिमिटेड में लिया, जिसका बाद में आईसीआईसीआई बैंक में विलय हो गया।
वह आईसीआईसीआई बैंक में कॉरपोरेट बैंकिंग और ग्रामीण बैंकिंग का कामकाज संभालती थीं। असल में उन्होंने इस बैंक में ग्रामीण और कृषि कारोबार शुरू किया। उन्होंने वर्ष 2016 में स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक से जुड़ने के बाद इस बैंक के खुदरा कारोबार को सुधारा।
खोज समिति में आरबीएल बैंक के बोर्ड की मनोनयन एवं वेतन-भत्ता समिति के दो सदस्य शामिल थे। बोर्ड के एक अन्य व्यक्ति और बाहरी प्रदीप शाह थे, जो रेटिंग एजेंसी क्रिसिल लिमिटेड के पहले एमडी और इंडएशिया फंड एडवाइजर्स के संस्थापक थे। समिति को एक वैश्विक प्रबंधन सलाहकार और कार्याधिकारी खोज कंपनी एगोन झेंडेर से मदद मिली।
मुझे पूरा भरोसा है कि आरबीआई ने आरबीएल बैंक का सीईओ चुनते समय संस्कृति, अनुपालन, सुसंगतता और वेतन-भत्तों पर विचार किया होगा। दारुवाला का मौजूदा पैकेज काफी अच्छा है, इसलिए खोज समिति ने उनके लिए भरपूर ईसॉप्स की सिफारिश की होगी। क्या यह दारुवाला के खिलाफ गया? लेकिन ईसॉप्स तो अर्जित किए जाते हैं। व्यक्ति को ईसॉप्स के जरिये पैसा कमाने के लिए अच्छा प्रदर्शन करना होता है। या स्टैंडर्ड चार्टर्ड में उनके कार्यकाल में हाल में विस्तार ने आरबीएल बैंक में उनका रास्ता रोक दिया?
हालांकि मैं आरबीआई की चयन पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। लेकिन एक चीज सुनिश्चित है- ऐसा लगता है कि नियामक को बोर्ड में भरोसा नहीं था। या कुछ ऐसा है, जिसके बारे में हम नहीं जानते हैं?
(लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ परामर्शदाता हैं)