हर व्यक्ति का नजरिया पूर्वग्रह से ग्रस्त होता है क्योंकि वह उसके निजी अनुभवों पर आधारित होता है, भले ही उसका अनुभव वास्तविकता की तुलना में काफी कम हो। मेरे एक वरिष्ठ कहा करते थे, ‘कोई पुरस्कार जीतने या किसी पत्रिका के कवर पर आने से सावधान रहो, यह आपके सफल करियर में आगे आने वाली गिरावट का संकेत हो सकता है।’ वह प्रसिद्धि और सार्वजनिक चमक-दमक से असहज महसूस करते थे जो हर संतुलित नेता को नष्ट कर देते हैं। एक मुख्य कार्याधिकारी तथा सभी प्रमुख नेताओं को यह सीखना चाहिए कि सार्वजनिक ध्यानाकर्षण और चमक-दमक से कैसे बचा जाए। ऐसी सुर्खियां चाहे अस्थायी ही हों लेकिन ये काफी नुकसान पहुंचाती हैं।
ऋग्वेद में चरैवेति शब्द का उल्लेख है। यह शब्द संस्कृति के चर और इति से मिलकर बना है जिनका अर्थ होता है ‘हमेशा चलते रहना’। यदि आप चरैवेति को व्यवहार में अपनाएं तो आप विनम्र हो जाते हैं। आप इस बात को लेकर सचेत हो जाते हैं कि हर अच्छा या बुरा समय बीत जाएगा। जॉन डी रॉकफेलर को एकांतप्रिय, खामोश रहने वाला और अंतर्मुखी माना जाता था। कहा जाता है कि वह एक कविता का पाठ किया करते थे जिसका अर्थ कुछ इस तरह था, ‘एक बूढ़ा समझदार उल्लू ओक के एक वृक्ष पर रहा करता था, वह जितना अधिक देखता था उतना ही कम बोलता था, वह जितना कम बोलता था, उतना ही ज्यादा सुनता था, हम सब उस समझदार बूढ़े उल्लू की तरह क्यों नहीं हैं?’ मुझे अबाउट स्मिट नामक फिल्म के सेवानिवृत्त वॉरेन स्मिट की याद आती है जिसके किरदार को जैक निकलसन ने बखूबी निभाया था।
मीडिया की तारीफ और खुद को महत्त्वपूर्ण समझने की भावना आत्म संभ्रम के सहरा में मृग मरीचिका के समान हैं। ब्लैक-स्कोल्स मॉडल की इसलिए सराहना की जाती थी क्योंकि उसने निवेश और वित्त को विज्ञान में तब्दील किया। उन्हें नोबेल पुरस्कार से भी पुरस्कृत किया गया। उनकी कंपनी एलटीसीएम (लॉन्ग टर्म कैपिटल मैनेजमेंट) का पतन हो गया। लेखक मॉर्गन हाउजल एक चौंकाने वाली बात रेखांकित करते हुए कहते हैं, ‘सफलता की तुलना पैसे कमाने से की जाती है। पैसे कमाने का इस बात से कोई खास संबंध नहीं होता है कि आप कितने चतुर हैं। इसका संबंध आपके व्यवहार से है। व्यवहार सिखाना कठिन है, खासतौर पर चतुर लोगों को।’ अच्छे नतीजों को मेधावी व्यक्तियों की रणनीतिक पहल का नतीजा बताया जाता है जबकि आपदाओं को बदकिस्मती के माथे मढ़ दिया जाता है।
मैंने यूनिलीवर और टाटा में काम किया है और दोनों कंपनियां कॉर्पोरेट इकिगाई पर लंबे समय से अमल करती आयी हैं। यह जापानी अवधारणा जीवन जीने के उद्देश्य के बारे में हैं। उन कंपनियों में काम करने के अपने अनुभव से हम जानते हैं कि टिकाऊ सफलता को ऐसे गर्भ में पोषण मिलता है जिसे छह तत्त्वों का पोषण मिलता हो-रूढि़वादी वित्त, नवाचार, अनवरत सुधार, अथक अनुकूलन और हकीकत से दूर अविश्वासी कॉर्पोरेट संचालन। ऐसी कंपनियां अपने अच्छे कर्म के दीर्घकालिक लाभ का फायदा पाती हैं। यह व्यवहार स्टार्टअप के लिए भी बहुत बेहतर होता है।
आज से 40 वर्ष पहले वेंचर कैपिटल रूपी उद्योग अस्तित्व में नहीं था। अप्रैल में वेंचर कैपिटल फर्म सिकोया इंडिया ने एक ब्लॉग प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था, ‘कॉर्पोरेट गवर्नेंस: द कॉर्नरस्टोन ऑफ एन एंड्यूरिंग कंपनी’। एक वेंचर कैपिटल लीडर की ओर से ऐसी थीम का आना महत्त्वपूर्ण है। ब्लॉग सिकोया ग्लोबल के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी माइकल मॉर्टिज द्वारा चार्ली रोज शो में कही गई बातों के साथ भी निरंतरता वाला था। उन्होंने कहा कि अधिकांश अल्पकालिक वेंचर कैपिटल फर्म के उलट सिकोया कई दशकों से कारोबार में बनी हुई है क्योंकि ‘हम कारोबार से परे जाने से डरते हैं…हम यह मानते हैं कि आने वाला कल शायद बीते कल जैसा नहीं होगा…हम आश्वस्त नहीं रह सकते।’
ब्लॉग में यह अनुरोध किया गया कि और अधिक तादाद में कारोबारी भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल हों तथा सिकोया के ज्यादा संचालन के अनुरोध में भागीदार बनें। ब्लॉग के शुरुआती हिस्से में कंपनी ने यह बात दोहरायी है कि वह यथासंभव सतर्कता बरतती है। हालांकि शुरुआती चरण में इसकी सीमाएं हैं। सिकोया संस्थापकों एवं वरिष्ठ प्रबंधन को शासन प्रशिक्षण भी मुहैया कराती है। कंपनी का कहना है कि वह अच्छे व्यवहार को प्रोत्साहन देने के लिए हरसंभव कदम उठाने के लिए तैयार है।
मेरे लिए संदेश यह है कि सुशासन के दो कारक हैं- निगरानी वाला और व्यवहार आधारित संचालन। ढेर सारे नियमन होने से निगरानी आधारित संचालन में सुधार होता है लेकिन व्यवहार आधारित संचालन में कमी नजर आती है। अधिकांश बोर्ड अहम व्यवहारात्मक कमियों को स्पष्ट करने या उन्हें लेकर कदम उठाने में हिचकते हैं। वे प्रमाण की प्रतीक्षा करते हैं।
व्यवहारात्मक कॉर्पोरेट संचालन क्या है? यह एक व्यवहारात्मक संहिता है जो आत्मश्लाघा के जड़ें पकडऩे के पहले बोर्ड और नेतृत्व का बेहतर व्यवहार तैयार करती है। नेतृत्व के आत्ममोहग्रस्त होने पर अनगिनत पुस्तकें और आलेख लिखे जा चुके हैं।
गत 25 अप्रैल के फाइनैंशियल टाइम्स समाचार पत्र में माइकल स्कैपिंकर ने एक दिलचस्प आलेख लिखा जिसका शीर्षक था, ‘हाउ टु हैंडल आ नार्सिसिस्ट इन द वर्क प्लेस’ (कार्यस्थल पर किसी आत्ममोहग्रस्त व्यक्ति से कैसे निपटें)। आलेख में मीडिया कंपनी के मालिक रॉबर्ट मैक्सवेल का जिक्र है जिनका शव 30 वर्ष पहले समुद्र में पाया गया था। उनकी बेटी गिस्लाइन मैक्सवेल से जेफ्री एप्स्टाइन मामले में पूछताछ हुई और उन्हें सुनवाई में शामिल होना पड़ा। यह बात खबरों में रही है। स्कैपिंकर कई विशेषज्ञों के हवाले से कहते हैं कि कई आत्ममोहग्रस्त व्यक्तियों के पास प्रेम का सुरक्षित आधार नहीं होता, कुछ में यह भावना जेनेटिक कारणों से होती है, कई अत्यंत चतुर, सक्षम और कड़ा श्रम करने वाले होते हैं। कई को अत्यधिक सराहना की जरूरत होती है, उनमें दूसरों के लिए समानुभूति नहीं होती और वे पात्रता की भावना से संचालित होते हैं।
व्यवहारात्मक कॉर्पोरेट संचालन में मेरी गहरी रुचि रही है। मैंने इसके शुरुआती संकेतों को समझने के लिए एक निदेशकीय चेकलिस्ट भी तैयार की।
इस चेकलिस्ट का इस्तेमाल स्थापित कॉर्पोरेट्स और स्टार्टअप के लिए भी किया जा सकता है। भारत की स्टार्टअप पारिस्थितिकी अभी शुरुआती चरण में है। हमें हाउसिंग डॉट कॉम, भारतपे, जिलिंगो और ट्रेल जैसे प्रकरण देखने को न मिलें जो कतई वांछनीय नहीं हैं। सिकोया ब्लॉग कॉर्पोरेट संचालन जगत तथा स्टार्टअप क्षेत्र के कारोबारियों को जगा सकता है और इस विषय से अधिक गंभीरता और तात्कालिकता के साथ निपटा जा सकता है।
(लेखक टाटा संस के निदेशक एवं हिंदुस्तान यूनिलीवर के वाइस- चेयरमैन रह चुके हैं)