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बदले हालात में लालू प्रसाद के चेहरे का बदलता रंग

Last Updated- December 07, 2022 | 1:41 PM IST

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के लिए विश्वास मत जीत चुके हैं। इसका अर्थ यह है कि अब वाम दलों से दोबारा हाथ मिलाना बहुत ही कठिन है।


रिश्तों में कड़वाहट और तल्खी के चलते आने वाले आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता से बाहर रखने के लिए भी शायद नहीं। इस संदर्भ में संप्रग के अन्य घटकों की क्या भूमिका रहती है, यह जानना भी जरूरी है। कांग्रेस को मिली-जुली सरकार बनाने का गुर नहीं आता।

नाक ऊंची करके चलती है पार्टी। कांग्रेस को किसी के सामने झुकने की आदत नहीं है। लेकिन अन्य घटकों के लिए पेट का सवाल है। उनकी इतनी सामर्थ्य नहीं है कि वे मूछों पर ताव देकर बात करें। लेन-देन की भाषा वे ज्यादा अच्छी तरह से समझते हैं। लालू प्रसाद, जिनका राष्ट्रीय जनता दल (राजद) 24 सांसदों के साथ संप्रग का सबसे बड़ा घटक है, अपने विश्वास मत के भाषण में इसी भावना को प्रतिबिंबित कर रहे थे। सड़क छाप भाषा और भोजपुरी मुहावरों से लैस उनके भाषण से यदि एक बात साफ झलक कर आ रही थी तो वह थी, वामदलों का मनुहार।

फिल्मी गानों और ”घर आ जाओ, सब कुछ माफ” का राग लालू प्रसाद भोंपू से बजा रहे थे। लालू प्रसाद और वामदलों के बीच अभिन्न मित्रता रही है। जब वह बिहार में अपनी पराकाष्ठा पर थे, तब भी वामदलों ने उनका साथ दिया। 1998 का चुनाव लालू प्रसाद और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने साथ लड़ा था। हालांकि भाकपा और राजद में दूरी हो गई, भगवा रंग को बिहार में आने से रोकने की मुहिम में भाकपा ने राजद का साथ दिया था।

लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने लालू प्रसाद का साथ कभी नहीं छोड़ा- तब भी नहीं जब उसी के एक विधायक अजित सरकार की हत्या हो गई और बाद में पता चला कि हत्या करवाने वाला लालू प्रसाद का एक सहयोगी था- पप्पू यादव। 2004 के चुनाव के बाद भाकपा, लालू से अलग हो गई। लेकिन माकपा ने हाथ नहीं छोड़ा। कुल मिलाकर चारा प्रकरण, लालू चालीसा, परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से लिप्त राजद की एक बरसाती कभी नहीं गिरी- माकपा।

तब से अब क्या बदला है? लालू प्रसाद स्वयं बदल गए हैं। कहां पहले कूप मंडूक की तरह मुस्लिम-यादव संगठन की तालियों की गड़गड़ाहट से संतुष्ट रहते थे। लेकिन रेल मंत्री बनने के बाद गांव देहात से निकलकर देख रहे हैं कि दुनिया बहुत हसीन है। बिहार के लिए भी नया चश्मा है। धीरे-धीरे समझ में आ रहा है कि नीतीश कुमार क्यों बाजी मार गए। विकास का मुद्दा उतना बेमानी नहीं है, जितना माना जाता था। और गांव से शहर बनने की प्रक्रिया केवल भौतिक सुविधाएं प्रदान करने से संपन्न नहीं हो जाती।

कभी-कभी दिलों और दिमाग से लोग नगरीय हो जाते हैं। यह समझना राजनीति का एक हिस्सा है। नीतीश कुमार ने इसे समझ कर, लोगों की अपेक्षाएं भांपकर एक रिक्तता को भरना शुरू किया। लालू प्रसाद ने इसे रिक्तता माना ही नहीं- जब तक चुनाव नहीं हार गए। सवाल यह है कि नीतीश कुमार को पछाड़ कर बिहार में वापस कैसे आया जाए? बिहार के लोग विकास के इतने भूखे हैं कि कुमार का जरा सा प्रयास भी प्रशंसा का कारण बन जाता है।

जाहिर है कि लालू प्रसाद इस लोक भावना के बाहर नहीं जा सकते हैं। जबसे नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हैं, लालू प्रसाद एक भी चुनाव नहीं जीत पाए हैं। महापौर से लेकर लोकसभा तक। यादवों में वे जरूर एकछत्र नेता हैं। लेकिन मुस्लिम समुदाय में- विशेष रूप से निचले तबकों में उनकी छवि अच्छी नहीं है। हां, अरब देशों और बिहार के बाहर जो मुसलमान हैं, वे जरूर लालू के साथ हैं। लेकिन इनमें से कुछ ही राज्य में मतदाता हैं। कहने का मतलब यह है कि लालू प्रसाद का प्रभाव क्षेत्र तेजी से सिकुड़ रहा है। इसे बचाने के लिए वे कांग्रेस की मदद नहीं ले सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस का बिहार में कुछ बचा ही नहीं है।

और इसलिए भी कि कांग्रेस भी नए तेवर में दिख रही है। वे कई संसदीय सीटों पर राजद से मित्रवत लड़ाई लड़ना चाहते हैं। बचा कौन?  केवल माकपा। एक मिनट के लिए नवंबर 2005 के विधानसभा चुनाव के नतीजों का विश्लेषण करें तो लालू प्रसाद की दुविधा समझ में आती है। 243 सदस्यों की विधानसभा में नीतीश कुमार और भाजपा गठबंधन की 142 सीटें आईं। उन्हें 19.85 प्रतिशत मत मिले और भाजपा को 15.88 प्रतिशत।

राजद को 24.17 प्रतिशत मत मिले, लेकिन सीटें मिलीं केवल 54। माकपा को केवल एक सीट मिली, उसका प्रभाव विस्तृत है और यह कहना कठिन है कि उन्होंने कितनी सीटों पर लालू को जिताया। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यदि वे राजद से अलग होकर लड़ते हैं तो लालू प्रसाद को कहां कहां हरा सकते हैं। इसी संभावना से लालू प्रसाद सबसे ज्यादा सशंकित हैं। माकपा साथ न हो तो नुकसान हो सकता है। लेकिन खिलाफ होकर प्रचार करने लगे तो? और इसीलिए हो रहा था इतना मान मनुहार, मान-मनौव्वल- अभी न जाओ छोड़ के , कि दिल अभी भरा नहीं का आलाप।

आज ऐसा लग रहा है कि माकपा, राजद के साथ जाए या नहीं, बिहार का जो मूड है उसमें लालू प्रसाद की सीटें 10 पार नहीं कर पाएंगी। 3-4 मिल जाएं तो गनीमत है (रघुवंश प्रसाद सिंह वैसे तो बिहार के जाने माने नेता हैं लेकिन विधानसभा चुनाव में उनके लोक सभा क्षेत्र में आने वाली सातों विधानसभा सीटें 2005 के चुनाव में राजद हार गई थी। छपरा से लालू प्रसाद के जीतने की पूरी संभावना है। लेकिन विजय वहीं होगी, जहां यादव और धनाढय मुस्लिम बड़ी संख्या में हों।

परिसीमन की वजह से गोपालगंज- जहां से उनके साले साधू यादव जीते थे, आरक्षित सीट हो गई है।  यदि लालू प्रसाद संप्रग के सबसे बड़े घटक से सबसे छोटे घटक हो गए तो परिणाम क्या होगा? क्या संप्रग फिर से सरकार बना पाएगा? या भाजपा का रास्ता साफ हो जाएगा। लालू प्रसाद के जेहन में भी यह सब बातें घूम रही होंगी। यदि बीड़ा उठाया है सांप्रदायिकता को हराने का- तो सभी शक्तियों को एकत्रित करना पड़ेगा। लालू प्रसाद अपने आप को इसी भूमिका में ढाल रहे हैं।

First Published - July 25, 2008 | 10:34 PM IST

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