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अब भी अधूरी है छोटे शहरों की विकास गाथा

Last Updated- December 07, 2022 | 7:42 AM IST

भारतीय कार्यकारी और भारत में एक दो साल बिता चुके विदेशी देश के छोटे शहरों में आए कारोबारी उछाल से चकित हैं।


हम सभी जानते हैं कि किस तरह मर्र्सिडीज के भारत में सफल कारोबार के पीछे पंजाब के छोटे शहरों का भी योगदान रहा है। यह सच है कि ऐसी कंपनियां जो उत्पाद और सेवा क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं और टेलीविजन से लेकर वॉशिंग मशीन, बीमा और दूसरी वित्तीय सेवाएं उपलब्ध कराती हैं वह भी टियर 1 और टियर 2 शहरों में उपभोक्ताओं को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं उपलब्ध कराने में जुटी हुई हैं। इसकी एकमात्र वजह यह नहीं है कि बड़े शहरों में अब कारोबारी विकास की दृष्टि से एक ठहराव सा आ गया है बल्कि छोटे शहरों में अब भी काफी प्रतियोगिता देखने को मिल रही है।

सरकारी और अर्द्धसरकारी दोनों ही तरह के शोध संगठनों के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि अपेक्षाकृत छोटे शहरों जैसे कोयंबटूर और नागपुर की ओर ऐसी कंपनियां ज्यादा दिलचस्पी दिखा रही हैं। वजह साफ है कि यहां कंपनियों को कारोबारी विकास के पर्याप्त अवसर नजर आ रहे हैं और साथ ही इन शहरों में भी लोगों की क्रय शक्ति में बढ़ोतरी हुई है।

देश के छोटे शहरों में जो बदलाव आया है उसे देखकर आसानी से पता चल जाता है कि कारोबारियों और कारोबारी इकाइयों को काफी पहले से ही इस बात का आभास हो गया था कि अगर उन्हें अपने कारोबार का और अधिक विस्तार करना है तो छोटे शहरों में अपनी पकड़ को मजबूत बनाना होगा। और इस बात की पुष्टि खेत खलिहानों के आसपास खड़े कांच के चमचमाते आलीशान शॉपिंग मॉल्स को देखकर ही हो जाएगी।

इन्हीं लहलहाते खेतों के पास आपको बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े बड़े चमकते बोर्ड दिख जाएंगे। आर्थिक विकास और रोजगार की बढ़ती संभावनाओं की वजह से ही नागपुर से लेकर मैसूर और देहरादून से लेकर भुवनेश्वर जैसे शहरों में इन कंपनियों को नई संभावनाएं नजर आ रही हैं। भारत में अपेक्षाकृत छोटे शहरों की यह विकास गाथा चीन से बिल्कुल जुदा है। भारत के इन शहरों में विकास की कहानी नीचे से ऊपर तक पहुंची है न कि बड़े शहरों से होते हुए छोटे शहरों तक।

लोग इसे अच्छा कहें या बुरा पर यूरोप में जितने भी पुराने और खूबसूरत शहर हैं वे सभी 18वीं और 19वीं शताब्दी में वहां आई औद्योगिक क्रांति की देन हैं। पर तत्कालीन चीन और औद्योगिक क्रांति के काल के यूरोप में शहरों मे आया बूम उत्पादन की देन था। लीड्स का प्रमुख ‘क्लॉथ हॉल्स’ जो महिलाओं को खासा आकर्षित करता हैं, वह टेक्सटाइल मैन्युफैक्चरिंग उद्योग की देन हैं। गुआनझू जो पहले धान के खेतों से अटा पड़ा था, अब आधुनिक शहर में तब्दील हो चुका है।

पर भारत की तस्वीर इससे अलग है। छोटे शहरों में लोगों की आय में बढ़ोतरी होने की एक बड़ी वजह है कि अब इन इलाकों के ज्यादा से ज्यादा लोग तेजी से विकास कर रहे सेवा क्षेत्रों से जुड़ने लगे हैं। चाहे वह आईटी क्षेत्र हो, या आईटी संबंधित क्षेत्र, होटल, एयरलाइंस या फिर वित्तीय सेवा क्षेत्र, यहां लोगों की अत्यधिक मांग है और छोटे शहरों से लोग इनमें प्रवेश भी कर रहे हैं। इन क्षेत्रों में मांग इतनी अधिक है कि केवल बड़े शहरों के भरोसे इनकी मांग को पूरा कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है।

यही वजह है कि नियोक्ता और कंपनियां छोटे शहरों की ओर रुख करना बेहतर समझ रही हैं। यही वजह है कि आपको सिलीगुड़ी और दार्जिलिंग जैसे शहरों में होटल और एयरलाइंस उद्योग में रोजगार के विज्ञापन भरे मिलेंगे। इन शहरों में लोगों में पश्चिमी सभ्यता की थोड़ी बहुत झलक मिलती है और वे अच्छी खासी अंग्रेजी भी बोल लेते हैं। यही वजह है कि इन शहरों के लोगों की मांग इन उद्योगों में काफी होती है।

वहीं बाकी के दूसरे शहरों से चार्टर्ड एकाउंटेंट, आईटी इंजीनियर, प्रशासकीय अधिकारियों की मांग को पूरा किया जाता है। यहां तक कि अब तो उन क्षेत्रों में भी छोटे शहर के लोगों का योगदान बढ़ रहा है जिन पर पहले केवल बड़े शहरों का ही दबदबा रहा करता था। फैशन इंडस्ट्री में भी छोटे शहरों के लोग अब धीरे धीरे आने लगे हैं। यही नहीं कई जानी मानी मॉडल तो छोटे शहरों से ही ताल्लुक रखती हैं।

भले ही उभरती भारतीय प्रतिभाओं की मांग काफी हद तक छोटे शहरों से पूरी की जा रही है, पर अब भी उनके लिए बाजार बड़े शहर ही बने हुए हैं। ऐसे ज्यादातर लोग बड़े शहरों में बसने चले जाते हैं और अपनी कमाई को छोटे शहरों में लगाते हैं। इसका सबसे आसान सा उदाहरण आप इसे समझ सकते हैं कि अगर एयरलाइंस का कोई स्टीवर्ड जो भले ही किसी बड़े शहर में रह रहा हो, अपने पैतृक शहर में अपना एक मकान जरूर बनवाएगा। इसके लिए स्वाभाविक है कि उसके पैतृक शहर में कंस्ट्रक्शन उत्पादों और संबंधित जरूरतों की खपत बढ़ेगी।

बड़े शहरों में जिस रफ्तार से भीड़ भड़ती जा रही है और कच्चे माल समेत तमाम उत्पादों की कीमतें भी बढ़ती जा रही हैं उससे कारोबारियों के पास देश के छोटे और निचले दर्जे के शहरों की ओर रुख करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बचा है। साथ ही इसी वजह से वे छोटे शहरों में अपना उत्पादन आधार बढ़ाने पर भी विचार कर रही हैं। अभी हाल ही में देश की एक बड़ी कंपनी के प्रमुख ने इस बात के संकेत दिए थे कि कंपनी दिल्ली और बंगलुरू जैसे बड़े शहरों से इतर भी कुछ छोटे शहरों में विस्तार पर विचार कर रही हैं।

अब अगर आईटी जैसे उद्योगों की बात करें तो इनके लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि इस क्षेत्र से ताल्लुकात रखने वाली कंपनियों को एक ही शहर में बंधे रहने की कोई बाध्यता नहीं होती है। कंपनी के उसी सीईओ ने बताया कि कंपनियों के लिए सबसे बड़ी बाधा छोटे शहरों के रहन सहन और वहां के हालात होते हैं। न तो इन छोटे शहरों में मनोरंजन के पर्याप्त साधन होते हैं, न ही शिक्षा की समुचित व्यवस्था और नागरिक और बुनियादी सेवाओं का भी यहां अभाव होता है। इस वजह से कंपनी के कई आला अधिकारी वापस से बड़े शहरों में बसने की कोशिश में लगे हैं।

हालांकि अगर लोग इन असुविधाओं की वजह से छोटे शहरों में नहीं रहना चाहते तो इसमें कोई गलती भी नहीं है क्योंकि नागरिक बुनियादी ढांचे से किसी व्यक्ति के जीवन और उसके रहन सहन पर खासा प्रभाव पड़ता है। सरकार को चाहिए कि वे इन दिशाओं में भी कारगर कदम उठाए। अगर हम इन शहरों के समग्र विकास की बात करते हैं तो निश्चित तौर पर इन सुविधाओं को दरकिनार नहीं किया जा सकता है।

First Published - June 25, 2008 | 10:31 PM IST

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