वक्त वाकई में काफी खराब हो गया है। एक मुसीबत खत्म होती नहीं कि दूसरी सिर पर सवार हो जाती है।
जब कर्ज संकट से कुछ राहत मिलने के आसार दिख रहे थे, तभी उससे भी बड़ी मुसीबत, तेल संकट ने आ घेरा। कच्चे तेल की कीमत 135 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार करने के साथ सचमुच आसमान पर पहुंच चुकी है। दिक्कत की बात तो यह है कि कच्चे तेल की यह आग बुझती भी नहीं दिख रही है।
अब तक तो हम सभी जान गए हैं कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें मुल्क की माली हालत को कितना नुकसान पहुंचाती हैं। इसकी वजह से महंगाई में इजाफा होता है, विकास दर कम होती है और तो और उपभोग पर भी इसका असर पड़ता है। इसकी वजह से सिर्फ रिजर्व बैंक ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों के माथे पर शिकन की लकीरें साफ दिखाई देने लगी हैं।
इसकी वजह से इन बैंकों की विकास दर को संभाले रखने की ताकत पर जबरदस्त असर पड़ा है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों से पैदा हुई महंगाई की वजह से बाजार विश्लेषकों के दिलों में मंदी का खौफ फिर से हिलोरें मारने लगा है। वैसे, इस वक्त वित्त बाजार तेल में लगी इस आग के कारणों की चर्चा से अटे पड़े हैं।
बाजार की नब्ज पर करीब से नजर रखने वाले गोल्डमैन और कुछ कमोडिटी फंडों का कहना है कि 135 डॉलर प्रति बैरल की कीमत असल में एक समय-समय पर आने वाले तेजी और मांग-आपूर्र्ति के बिगड़ते संतुलन का परिणाम है। उनका कहना है कि चीन और भारत जैसे दुनिया के आर्थिक मानचित्र पर तेजी से उभरते हुए देशों में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ाई गई हैं, इसलिए वहां इनके इस्तेमाल पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ा है।
दूसरी तरफ, तेल का उत्पादन कम होता जा रहा है। वजह है रूस, मेक्सिको और दूसरे बड़े तेल उत्पादक मुल्कों का अपना उत्पादन नहीं बढ़ाना। वेनेजुएला और इराक जैसे देशों में जहां तेल मौजूद भी है, वे आज की तारीख में बड़े राजनैतिक संकटों से जूझ रहे हैं। इसका असर उनके तेल उत्पादन पर भी पड़ा है। उत्पादन में जो थोड़ा बहुत इजाफा भी हम आज की तारीख में देख रहे हैं, उसकी वजह बॉयोफ्यूल, एनजीएल और सिंथेटिक ऑयल हैं।
इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था तो 3.8-4 फीसदी की रफ्तार से ऊपर जा रही है, लेकिन जब तेल का उत्पादन केवल एक फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहा है। ऐसे में संतुलन तो बिठाना ही पड़ेगा। इसलिए यह तो साफ बात है कि तेल की कीमतें बढ़ती ही रहेंगी और तब तक बढ़ती रहेंगी जब तक मांग और आपूर्ति के बीच बैलेंस कायम नहीं हो जाता।
बाजार में तेजी की उम्मीद करने वालों के मुताबिक यह संतुलन तब तक कायम नहीं होगा, जब तक शॉर्ट टर्म में तेल की कीमतें 150 डॉलर को पार नहीं कर जातीं। वैसे, लंबे समय में तो इन्हें और भी आगे जाना है। पिछले पांच साल की तेल कीमतों के रिकॉर्ड पर नजर डालें तो ऐसे लोगों की बात सच ही साबित होती है।
वहीं बाजार में नरमी की उम्मीद करने वालों को मांग और आपूर्र्ति के संतुलन पर ज्यादा भरोसा नहीं है। वे तेल बाजार आई तेजी की तुलना 1990 के दशक के इंटरनेट बूम से करते हैं। उनके मुताबिक बुनियादी बातों का तेल कीमतों में आई तेजी के साथ कोई नाता नहीं है।
उनका कहना है कि 2004 से लेकर 2007 के दौरान विश्व में कच्चे तेल की मांग 36 लाख बैरल प्रतिदिन से सात लाख बैरल प्रतिदिन कम हो गई है। इसलिए आज की तारीख में तेल की मांग गैर ओपेक देशों में तेल उत्पादन के आए इजाफे की तुलना में कम तेजी से बढ़ रही है। इन चार सालों में गैर ओपेक देशों के उत्पादन में 8 लाख बैरल प्रति दिन का इजाफा हुआ है।
ओपेक देशों के उत्पादन में भी इजाफा हुआ है। इस वजह से अब दुनिया के पास जल्द ही हर दिन 50 लाख बैरल तेल अतिरिक्त होगा। वे उन खबरों की तरफ इशारा करते हैं कि ईरान और कुछ दूसरे देश बड़ी तादाद में टैंकरों को जुटा रहे हैं, ताकि वे उस तेल इनमें रख सकें जिसे वह इन ऊंची कीमतों पर नहीं बेच पा रहे। दुनिया में तेल की कमी कैसे हो सकती है, जब ईरान अपने उत्पादन को बेच ही नहीं पा रहा?
नरमी की उम्मीद करने वालों का यह भी कहना है कि अगर अमेरिकी कार कंपनियां अपनी कारों को यूरोपीय मानकों के मुताबिक बनाने लगें तो अमेरिका का तेल उपभोग, पूरे चीन की पेट्रोल मांग के बराबर कम हो जाएगा। उनका यह भी मानना है कि कभी न कभी तो चीन और भारत की सरकारें तो अपने मुल्कों में पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ाएंगी ही।
इस बारे में दूसरे सिध्दांत के मुताबिक संस्थागत निवेशकों का बड़े कमोडिटी इंडेक्स फंडों के जरिये की गई तेल की मोटी खरीदारी ही तेल और दूसरे अहम सामान की कीमतों में आए उछाल की असल वजह है। हाल ही में अमेरिकी कांग्रेस के समक्ष दिए गए अपने बयान में हेज फंड मैनेजर माइकल मास्टर्स ने इस बारे में विस्तार से बताया था।
उन्होंने कहा था कि कमोडिटी आज की तारीख में एक तरह की परिसंपत्ति बन चुकी है, जिसमें हर कोई अपना हिस्सा चाहता है। इससे वे अपने पोर्टफोलियो में नए सेगमेंट को जोड़ सकें। उनके मुताबिक 2003 के अंत तक कमोडिटी इंडेक्स में 13 अरब डॉलर की रकम लगी हुई थी, जो आज की तारीख में 260 अरब डॉलर को पार कर चुकी है। वैसे, मास्टर्स ने अपने पक्ष में वाकई काफी जबरदस्त डेटा सामने रखे हैं, लेकिन मेरे मुताबिक वह इंडेक्स कमोडिटी फंडों के असर को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहे हैं।
इंडेक्स फंड में जब पैसा लगाया जाता है, तो उससे किसी एक कमोडिटी का भविष्य अनुबंध खरीदा जाता है। उस अनुबंध के खत्म होने से पहले या तो उस सामान की डिलीवरी लेनी पड़ती है या उसे फिर से लंबे समय के लिए दुबारा बेच देना पड़ता है। इसलिए इसका उस वस्तु की असल कीमत पर कोई खास असर नहीं पड़ता। साथ ही, वह यह भी बताने में नाकामयाब रहे कि क्यों लौह अयस्क और स्टील जैसी वायदा बाजार में नहीं बिकने वाली चीजों के दामों में तेल से भी तेज उछाल क्यों आया है।
मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि तेल की कीमतें अभी और भी ऊंचे स्तर तक पहुंचेंगी। एक ऐसे स्तर पर, जहां जाकर सरकारों के लिए सप्लाई को बरकरार रखना नामुमकिन हो जाएगा और उन्हें इसकी मांग कम करने के रास्ते ढूंढ़ने पड़ेंगे। कीमतें एक ऐसे स्तर पर पहुंचने वाली हैं, जिसकी बराबरी करने के लिए डिमांड को काफी कम करना पड़ेगा। साथ ही, अब दुनिया को वैकल्पिक ऊर्जा के नए स्रोतों की तलाश में भी जुटना पड़ेगा।