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जीन संरक्षण पर टिका है कृषि का भविष्य

Last Updated- December 06, 2022 | 9:43 PM IST

जलवायु परिवर्तन और नए कीट-पतंगों के खतरों के मद्देनजर हमारे देश की कृषि को भविष्य में कई चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है।


इन चुनौतियों से निपटने में कृषि संबंधी जैवविविधता की हमारी ताकत काफी सहायक साबित हो सकती है। हालांकि इस बात में कोई शक नहीं है कि संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और लापरवाही की वजह से पौधों और पशुओं की कई प्रजातियां नष्ट हो चुकी हैं, लेकिन अब भी कुछ हद तक जैवविविधता बची हुई है।


इसके जरिये फसलों और जानवरों के जीन में संशोधन कर उन्हें बदलती परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जा सकता है। बायो-पायरेसी की वजह से देश को बहुमूल्य जेनेटिक संसाधनों से वंचित होना पड़ा है। हालांकि इस बाबत हुए नुकसान का ठीक-ठीक आकलन करना बहुत मुश्किल है।


बहरहाल अच्छी बात यह है कि जैविक संपत्ति के संरक्षण और इनका संप्रभु अधिकार हासिल करने के लिए कोशिशें शुरू हो गई हैं। बासमती, नीम और हल्दी के विदेशों में पेटेंट होने के बाद इसके खिलाफ शुरू हुई कवायदों से यह बात पता चलती है।


भारत न सिर्फ पेड़-पौधों के संसाधनों के मामलों में समृध्द है, बल्कि पशुधन, छोटे-छोटे जीवों और अन्य कई अन्य जैविक प्रजातियां यहां मौजूद हैं। इसी तरह दुनिया के 12 मेगा-जीन सेंटरों में भारत का अहम स्थान है। दरअसल, वैश्विक स्तर पर जैवविविधता के 31 प्रमुख स्थलों में 2 भारत में मौजूद हैं। ये स्थल हैं- उत्तर-पूर्वी हिमालय के क्षेत्र और पश्चिमी घाट।


कुल मिलाकर दुनिया की 11.9 फीसदी वनस्पति और 10 फीसदी माइक्रोबायल बायोडायवर्सिटी (जैवविविधता) भारत में मौजूद है। जहां तक पशुधन क्षेत्र की बात है, देश में गायों की 30, भैंसों की 10, भेड़ों की 42, घोड़ों की 6, बकरियों की 20, ऊंटों की 8 और पोल्ट्री की 18 मान्यता प्राप्त नस्लें मौजूद हैं। इसके अलावा इस उपमहाद्वीप के जलीय इलाकों में मछलियों की तकरीबन 2,200 किस्में मौजूद हैं।


हालांकि मानवीय गतिविधियों और परंपरागत फसलों के विस्थापन की वजह से जैवविविधता में कमी आने का खतरा बरकरार है। इसके मद्देनजर विभिन्न प्रजातियों के संरक्षण के लिए जीन बैंक बनाने की महती जरूरत है। 


सौभाग्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) इस क्षेत्र में पहले ही अहम शुरुआत कर चुकी है। इसके तहत परिषद ने चार राष्ट्रीय जेनेटिक संसाधन संरक्षण ब्यूरो (नेशनल जेनेटिक रिसोर्स कंजरवेशन ब्यूरो) स्थापित किया है।


ये कुछ इस तरह हैं : द नेशनल ब्यूरो ऑफ प्लांट जेनेटिक रिर्सोसेज (एबीपीजीआर), द नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिर्सोसेज (एनबीएजीआर), द नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिर्सोसेज (एनबीएफजीआर)और नेशनल ब्यूरो ऑफ एग्रीकल्चरली इंर्पोटेंट माइक्रोऑर्गेनिज्म (एबीएआईएम)।


इस पहल को आगे बढ़ाने के मद्देनजर अब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की योजना देश के कीट-पतंग संसाधनों के संरक्षण के लिए भी इसी तरह का ब्यूरो बनाने की है। इसे नेशनल ब्यूरो ऑफ इनसेक्ट रिर्सोसेज का नाम दिया जाएगा और यह सिर्फ कीट पतंगों के मामले में ही नहीं, बल्कि अन्य क्षेत्रों में रिसर्च के लिए काफी उपयोगी साबित होगा। इससे पारिस्थितिक संतुलन के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।


गौरतलब है कि नई दिल्ली के पूसा स्थित कृषि अनुसंधान परिषद में मौजूद कीट-पतंगों की प्रजातियों का संग्रह केंद्र दक्षिणपूर्व एशिया में इस क्षेत्र का सबसे अच्छा संग्रह केंद्र है। यह धारणा काफी आम है कि कीट-पतंगों की प्रजातियां फसलों के लिए काफी नुकसानदेह होती हैं और ये पौधों, जानवरों और इंसानों में कई तरह की बीमारियां फैलाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। लेकिन हकीकत ठीक इसके उलट है।


कीट-पतंगों की कई प्रजातियां फसलों के साथ-साथ इंसानों के लिए भी काफी फायदेमंद होती हैं। कुछ कीट-पतंग फसलों की बीमारियों के लार्वा से अपना भोजन ग्रहण करते हैं, जबकि तितली और मधुमक्खी फसलों और सब्जियों के पौधों में फलों के उत्पादन में सहायक होते हैं। देश का पौधों से संबधित जीन बैंक भी काफी बड़ा है। इस जीन बैंक में 2 लाख 47 हजार से भी ज्यादा नमूने मौजूद हैं।


इसमें 28 हजार नमूने विभिन्न देसी फसलों के पुराने संस्करण हैं, जिनके बारे में विभिन्न खोज अभियानों के दौरान पता लगाया गया था। इसके अलावा बीजों की 21 लाख किस्मों को आयात किया गया है, जबकि कृषि व बागवानी से जुड़े फसलों के पौधों और पुरानी प्रजातियों को दूसरे देशों और ग्लोबल फॉर्म रिसर्च सेंटरों से मंगवाया गया है।


पौधों के विदेशी जीन की वजह से भारत को पहले भी काफी लाभ हुआ है और इनका इस्तेमाल कृषि के भविष्य को बेहतर बनाने में भी किया जा सकता है। याद रहे कि हरित क्रांति की सफलता में विदेशों से प्राप्त ठिगने गेहूं और चावल के जीन का प्रमुख योगदान था।


बहरहाल, पौधों के जीन संरक्षण के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को सराहनीय माना जा सकता है, इसके बावजूद जेनेटिक संसाधनों के संरक्षण के मामले में संतुष्ट होने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है।


पूरी दुनिया में बौध्दिक संपदा संबंधी नियम काफी सख्त हो रहे हैं और इसके मद्देनजर आने वाले दिनों में विदेशी जीनों को हासिल करने में काफी मुश्किल खड़ी हो सकती है। ऐसे में जीन बैंकों को समृध्द करने के उपायों के तहत हर जरूरी संसाधनों को हासिल करने के लिए दोगुने उत्साह के साथ काम करने की जरूरत है। हमारी संपन्नता का संरक्षण भी इसी बात पर निर्भर करेगा।

First Published - May 6, 2008 | 11:00 PM IST

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