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सरकार ने फेरी असल मुद्दों से नजर

Last Updated- December 07, 2022 | 8:04 AM IST

एक जमाने में उर्वरक कंपनियां मोटा मुनाफा काटा करती थीं, लेकिन सरकार की कछुआ चाल की वजह से अब उनकी हालत पस्त हो चुकी है।


आखिरकार सरकार ने कुछ फैसले तो लिए हैं, जिनसे उनकी हालत सुधर पाएगी। हालांकि, अब भी सरकार का ध्यान असल मुसीबत की तरफ नहीं गया है। वह अब भी उर्वरक सब्सिडी के मोटे-ताजे बिल को चुकाने के लिए कुछ नहीं कर रही है।

सब्सिडी का यह बिल साल के अंत तक 95 हजार करोड़ रुपये के स्तर तक पहुंच जाएगा और इसकी वजह से इन कंपनियों को पैसों की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही, सरकार ने उर्वरक बनाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली चीज यानी यूरिया के लिए भी कोई कदम नहीं उठाया है। यह कहा जा सकता है कि सरकार ने कुछ छोटे-छोटे मुद्दों को हल करके बड़े मुद्दों पर चुप्पी साध ली है।

पिछले हफ्ते सरकार ने जिस पैकेज की घोषणा की थी, उसके केंद्र में फॉस्फोटिक और पोटैसिक उर्वरक थे। इन दोनों को आधिकारिक रूप से तो सालों पहले ही सरकारी चुंगल से आजाद कर दिया गया था, लेकिन सरकार ने इनकी कीमतों को तय करने के मामले में अपना नियंत्रण जारी रखा था। इसीलिए सरकार ने अब इन उर्वरकों के लिए नई छूटों की घोषणा की है। कॉम्पेलेक्स और मिक्सड उर्वरकों के लिए जारी की गई इस न्यूट्रिएंट्स आधारित सब्सिडी से उनकी लागत कम होगी।

वहीं माल ढुलाई पर दी जाने वाली सब्सिडी को फिर से व्यवस्थित करने से उर्वरक अब दूर-दराज के इलाकों में भी जा पाएंगे। साथ ही, सरकार ने ट्रिपल सुपर फॉस्फेट और अमोनियम सल्फेट को भी सब्सिडी के तहत ला कर अच्छा काम किया है।  इसके अलावा, 3.5 लाख टन के डी-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) और एक लाख टन पोटैस म्यूरिएट का बफर स्टॉक बनाना भी एक सही कदम है। इससे बुआई के वक्त उर्वरक की कमी होने का खतरा भी कम हो जाएगा।

फॉस्फेटिक और पोटैसिक उर्वरकों के लिए घोषित की गई नई सब्सिडी स्कीम में घरेलू उत्पादकों को हर्जाना आयात समतुल्य मूल्य यानी इम्पोर्ट पैरिटी प्राइस के तहत मिलेंगे। इससे वह ऊहापोह की स्थिति खत्म हो गई, जो मार्च में पिछली मूल्य नीति के खत्म होने के बाद से बनी हुई थी। हालांकि इस नई नीति से सब्सिडी को चुकता करने में आसानी होगी और इससे विश्व व्यापार संगठन की जरूरत भी पूरी होती है, लेकिन घरेलू डीएपी उत्पादकों में इससे असंतोष फैल सकता है। असल में इस नई नीति का मकसद प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना है, जो घरेलू उत्पादकों को कतई पसंद नहीं आएगी।

इन लोगों की चाहत एक ऐसी नीति की है, जो इस बाहरी व्यापार से इन लोगों की रक्षा कर सके। साथ ही, इससे एक दिक्कत इसके बाहरी व्यापार अवधारणा से भी पैदा हो सकती है। इसके तहत फॉस्फोटिक और पोटैसिक उर्वरक को उर्वरक उद्योग की सामूहिक मोलभाव औसत आयात कीमत से कम दाम पर आयात करने पर आयातक उस अंतर का 65 फीसदी हिस्सा अपने पास रख सकता है, जबकि 35 फीसदी हिस्सा सरकार के हवाले करना पड़ेगा। हालांकि, इस बात की संभावना कम ही है कि कोई व्यक्तिगत खरीदार सामूहिक कीमत से कम दाम पर उर्वरक हासिल कर पाएगा। 

First Published - June 30, 2008 | 12:00 AM IST

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