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तेल की गर्मी से मिला संकट को न्योता

Last Updated- December 07, 2022 | 6:46 PM IST

पिछले महीने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जो इजाफा किया गया था, उसकी सबसे बड़ी वजह तेल कंपनियों का दिवालियापन की कगार पर पहुंच जाने को बताया गया था।


जबरदस्त घाटे से जूझ रही उन कंपनियों के पास इतना भी पैसा नहीं बचा था कि वे कच्चा तेल आयात कर सकें। लेकिन तब से अब तक कच्चे तेल की कीमत में काफी गिरावट आ चुकी है। लेकिन कमी का भूत पीछा छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।

दिल्ली में सीएनजी स्टेशनों के बाहर गाड़ियों की लाइन बढ़ती ही जा रही है। एलपीजी सिलेंडरों के नए कनेक्शन के लिए लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। पेट्रोल पंपों में डीजल न मिलने की खबर भी मुल्क के हर हिस्से से आ रही है क्योंकि तेल कंपनियां अपना घाटा कम करने के लिए प्रीमियम पेट्रोल और डीजल ही मुहैया करा रही हैं।

वजह काफी साफ है, तेल कंपनियों को भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। सरकार को अब भी 60 हजार करोड़ रुपये इन कंपनियों को चुकाने हैं, जिसका वादा उसने तेल बॉन्ड के रूप में किया था।  इसमें से 40 हजार करोड़ रुपये तो उसे पिछले वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही और चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के लिए चुकाने हैं।

दूसरी तरफ, बाकी का पैसा उसे चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का हिसाब साफ करने के लिए चुकाना है। अब तक तो पुराने तेल बॉन्डों के सहारे वह अपनी नैया पार लगा रहे थे, लेकिन अब वे भी खत्म हो चुके हैं। इसलिए उनके लिए उम्मीद की आखिरी किरण भी बुझ चुकी है। कंपनियां अपने खर्च कम करने की भी पूरी कोशिश में कोई नया पेट्रोल पंप नहीं खोल रही हैं।

उन्होंने निवेश के लिए परियोजना पर भी थोड़े समय के लिए रोक लगा दिया। सरकार का यह कहना है कि वह इसलिए नए तेल बॉन्ड जारी नहीं कर रही है क्योंकि इसके लिए उसे संसद से अनुमति लेनी पड़ेगी। इसका मतलब उन्हें अगले कुछ और हफ्तों तक पैसा नहीं मिल सकता है क्योंकि संसद का सत्र बुलाने के बारे में अब तक कोई घोषणा नहीं हुई है।

अगर सत्र अगले कुछ हफ्तों में नहीं बुलाया गया, तो जनता को पेट्रोलियम उत्पादों की कमी के लिए तैयार रहना होगा। सवाल उठता है कि इस हालात में संकट को टालने के लिए क्या किया जाए? सबसे आसान रास्ता तो यह है कि कीमतों के बारे फैसला लेने का हक तेल कंपनियों को ही दे दिया जाए, ताकि उन्हें सरकार का मुंह देखने की जरूरत ही न पड़े।

लेकिन इस सबसे आसान रास्ते को हमारे ‘बुध्दिमान’ नेता बकवास कहकर दरकिनार कर देंगे। अब दूसरा तरीका यह है कि तेल कंपनियों को खुले बाजार से कर्जे उठाने की इजाजत दे दी जाए, लेकिन कर्ज लेने की सीमा की वजह से इस कदम से कामयाबी की  उम्मीद कम है।

एक रास्ता है, तेल कंपनियों को शेयर बाजार में उतरने का, लेकिन इसके लिए उन्हें संसद की इजाजत चाहिए होगी। आखिरी रास्ता यह है कि सरकार इन कंपनियों को कर्ज मुहैया करवा दे। इसके लिए भी सरकार को कानून की पूरी किताब पढ़नी पड़ेगी कि वह ऐसा कर सकती है या नहीं।

स्पेशल मार्केट ऑपरेशंस स्कीम के तहत रिजर्व बैंक तेल बॉन्डों के बदले में तेल कंपनियों को डॉलर मुहैया करता आया था। लेकिन अब उनके तेल बॉन्ड चुक गए हैं, इसलिए उन्हें अब खुले बाजार से डॉलर की खरीदारी करनी पड़ रही है। इस वजह से रुपये की सेहत पर भी असर पड़ रहा है। अब एक ही रास्ता बचा है कि सरकार तेल कंपनियों को कीमत तय करने का अधिकार दे दे।

First Published - August 26, 2008 | 10:50 PM IST

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