इस लेख को लिखते वक्त मेरे पास 6 जून, 2008 के महंगाई के आंकड़े हैं और इन्हें देखकर पता चलता है कि थोक मूल्य सूचकांक (डब्लूपीआई) में साल दर साल के हिसाब से 8.24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
हालांकि, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से महंगाई की दर पर जो प्रभाव पड़ा है, वह इसमें शामिल नहीं है। ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के प्रभाव को आने वाले हफ्तों में जब इसमें शामिल कर लिया जाएगा तो महंगाई का आंकड़ा दहाई के अंक को भले ही न छू पाए पर यह 9 फीसदी को पार कर जाएगा, इतना तय है।
आखिरी उपलब्ध आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि वास्तविक दृष्टि से सरकारी प्रतिभूतियों का प्रतिफल नहीं के बराबर है और ऐसे में यह बहस छिड़ चुकी है कि केंद्रीय बैक को ब्याज दरें बढ़ानी चाहिए या नहीं। पर पहले बात करते हैं पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतों में बढ़ोतरी की। अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर पेट्रोलियम उत्पाद की कीमतों को बढ़ाने से हमें हासिल क्या होने वाला है।
हां यह तो जरूर है कि कीमतें बढ़ाने से मार्क्सवादियों को हो हल्ला मचाने का मौका मिल गया और भारतीय जनता पार्टी को सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए एक नया हथियार मिल गया। पर सिद्धांतत: पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ाने के दो उद्देश्य हो सकते हैं:
1- कीमतें बढ़ाकर सरकार पेट्रोल और डीजल की खपत को कम करना चाह रही है। साथ ही कीमतें बढ़ने से अब ऊर्जा के वैकल्पिक संसाधन ढूंढने की कवायद तेज होगी। दीर्घकालिक नजरिये से देखें तो यह कदम उचित जान पड़ता है क्योंकि, हाइड्रोकार्बन संसाधनों का भंडार सीमित है और कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग के जल्दी ठंडा होने की संभावना भी नहीं दिख रही है।
पर पेट्रोल, डीजल की कीमतें बढ़ाने से लगता तो नहीं कि सरकार का यह उद्देश्य पूरा हो पाएगा क्योंकि कीमतों में की गई बढ़ोतरी काफी कम है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से अपील की है कि वे बिक्री शुल्क में कटौती करें। अगर सरकार की मंशा सिर्फ और सिर्फ पेट्रोल, डीजल की खपत को कम करना होता तो वह राज्य सराकारों से यह अपील तो नहीं करती।
वहीं एक अन्य घटनाक्रम के तहत ठीक उसी दिन जिस दिन भारत सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाईं, मलेशिया सरकार ने भी अपने देश में इन उत्पादों की कीमतों में 40 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी।
2- सरकार का दूसरा उद्देश्य पेट्रोलियम पदार्थों की आयातित कीमत और देश में बेची जा रही रियायती दर के बीच के अंतर को कुछ कम करना है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और ऐसे में यह नुकसान सालाना 2,50,000 करोड़ रुपये का है। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में की गई बढ़ोतरी और कुछ अप्रत्यक्ष करों को खत्म करने से यह नुकसान करीब 20 फीसदी तक कम हो सकता है।
पर कीमतों को बढ़ाने के बावजूद अब भी करीब 40,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया है। किसी भी हालत में कीमतों को बढ़ाने से इस समस्या का कोई स्थायी समाधान निकल कर सामने नहीं आ रहा है।
अधिकांश विदेशी निवेशक राजस्व घाटे का मूल्यांकन करते वक्त ऑयल बॉन्ड्स, फूड बॉन्ड्स, कृषि ऋण माफी और वेतन आयोग के सुझावों को भी शामिल कर रहे हैं। अगर केंद्र और राज्य के घाटे को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 10 फीसदी से भी ऊपर होने की संभावना है। विदेशी निवेशकों में वित्तीय घाटा, शेयर बाजार में जारी उठा पटक और अर्थव्यवस्था में मंदी को लेकर जो चिंताएं बनी हुई हैं, वे देश में पूंजी प्रवाह के लिहाज से अनुकूल नहीं हैं।
खासतौर पर वर्तमान समय में व्यापार और राजस्व घाटा के और बढ़ने की पूरी आशंका है। इस बार अप्रैल में वस्तु व्यापार घाटा 10 अरब डॉलर के करीब पहुंच गया था, जबकि पिछले साल पूरे वर्ष के दौरान यह आंकड़ा 85 अरब डॉलर के करीब था। ऐसे में पूरी संभावना है कि इस वर्ष व्यापार घाटा, जिसमें आयात भी शामिल है, 130 से 135 अरब डॉलर को भी पार कर जाएगा। हाल की रिपोर्टों से पता चलता है कि अमेरिका में छाई मंदी की वजह से आईटी निर्यात विकास की गति भी धीमी हुई है।
मेरा मानना है कि पेट्रोल की कीमतों को लेकर जो ड्रामा किया गया है वह संकट की घड़ी में उठाया गया कदम है। ऐसा तो नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक ही दिन में अचानक से बढ़ गई हों। इसमें लगातार थोड़ी थोड़ी बढ़ोतरी होती रही है। तो ऐसे में सरकार ने शुरू से इस पर कोई कदम उठाना क्यों जरूरी नहीं समझा। एक समय नवरत्न कंपनियों में शुमार तेल कंपनियों के बाजार पूंजीकरण को जब जोरदार झटका लगा, तब जाकर ही सरकार की नींद क्यों टूटी।
जब तेल मार्केटिंग कंपनियों ने साफ साफ अपने हाथ खड़े करते हुए यह घोषणा कर दी कि अब वे और अधिक नुकसान उठाने की स्थिति में नहीं है, तब जाकर ही सरकार को कीमतें बढ़ाने की जरूरत क्यों लगी। अगर सरकार सही समय पर सोच समझकर कदम उठाती तो उसके सामने संकट की घड़ी आती ही नहीं। चरणबद्ध तरीके से पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को बढ़ाया जा सकता था और इससे आम आदमी की जेब पर भी एक साथ बोझ नहीं पड़ता।
अब सरकार के सामने एक और समस्या आ खड़ी हुई है। एक ओर ट्रक चालकों ने सरकार को हड़ताल की धमकी दे दी है और दूसरी ओर किसानों ने भी खाद की अनुपलब्धता के बीच आंदोलन छेड़ रखा है। यहां भी खेल सब्सिडी दर पर बेचे जाने वाले उत्पाद को लेकर ही है। हालांकि, इस बारे में सुरजीत भल्ला ने अपनी ओर से कहा था कि खाद पर काफी कम सब्सिडी दी जाती है।
जो कर के रूप में वसूला जाता है वही ऑयल बॉन्ड्स के रूप में वापस कर दिया जाता है। इस तरीके से राजस्व घाटे को कम करने की कोशिश की जाती है। कृषि की अर्थव्यवस्था को लेकर शरद जोशी जो दलील देते हैं, यह कहानी उससे कुछ अलग नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पादों की कीमतों की तुलना में घरेलू बाजार में कम कीमतों के रूप में निगेटिव सब्सिडी खाद सब्सिडी, ‘मुफ्त’ पानी और बिजली से कहीं अधिक है।
सब्सिडी भारत इंडिया को दे रहा है, न कि इंडिया भारत को। कृषि ऋण को माफ कर देने भर से कृषि क्षेत्र में सुधार की उम्मीद करना बेमानी है। क्या नीतिगत दरों को बढ़ाया जाना चाहिए? उम्मीद करता हूं कि फिलहाल ऐसा नहीं होगा। पर, क्या कोई इस ओर भी सोच रहा है कि ऐसे में जब कि महंगाई की दर इतनी अधिक हो चुकी है तो भविश्य निधि पर मिलने वाले ब्याज को लेकर भी कोई ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।