हाल में राजनीतिक दलों द्वारा ‘मुफ्त उपहारों’ के वादे की घोषणा पर एतराज को लेकर हो रही बहस से फिलहाल कुछ भी खास नतीजा नहीं निकलने वाला है लेकिन सरकार कैसे खर्च करती है, इस पर व्यापक चर्चा से भविष्य के लिए उम्मीद नजर आ सकती है। आमतौर पर ऐसे विषयों में रुचि संपादकीय पृष्ठों तक ही सीमित रहती है। उदाहरण के तौर पर इस स्तंभ में विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण से पहले राजनीतिक दलों द्वारा किए जा रहे वादों के संदर्भ में जनवरी में सब्सिडी का मुद्दा उठाया गया था।
हाल के हफ्तों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस संदर्भ में बात करने के बाद इस मामले ने सबसे अधिक ध्यान खींचा है और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक नेता द्वारा इस संबंध में दायर याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई करने का फैसला किया। हालांकि अदालत ने इस पर चिंता जाहिर की है लेकिन यह देखा जाना बाकी है कि वह क्या कर सकती है क्योंकि यह एक विधायी मामला है। कुछ अन्य राजनीतिक दलों ने भी इस मामले में हस्तक्षेप करने का फैसला किया है जिससे बहस और व्यापक हुई है।
हालांकि यह जानना हमेशा अहम होता है कि भारत जैसे देश में सरकार कितनी कुशलता से खर्च करती है लेकिन सरकारी वित्त पर महामारी के प्रभाव के कारण यह मुद्दा अधिक प्रासंगिक हो गया है। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर बजट घाटा काफी बढ़ गया जबकि सामान्य सरकारी ऋण, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 90 प्रतिशत तक बढ़ गया।
इस प्रकार सरकार को न केवल अर्थव्यवस्था का समर्थन करना है बल्कि अपनी बैलेंसशीट को भी सुधारना है। अगले कुछ वर्षों में सरकारी वित्त का प्रबंधन कैसे किया जाता है यह भारत की महामारी के बाद की आर्थिक दिशा को भी अहम तरीके से प्रभावित करेगा।
उदाहरण के तौर पर महामारी वाले साल में केंद्रीय स्तर पर राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 9.2 प्रतिशत हो गया और सरकार चालू वित्त वर्ष में इसे जीडीपी के 6.4 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य लेकर चल रही है। चालू वित्त वर्ष में सरकार अपने कर राजस्व का लगभग आधा हिस्सा ब्याज भुगतान के लिए इस्तेमाल कर सकती है। अगर ऋण अधिक होता है तब अधिक ब्याज भुगतान के चलते वृद्धि वाले परिसंपत्ति निर्माण और जनकल्याण योजना पर खर्च करने की सरकार की क्षमता सीमित हो जाएगी।
राज्य सरकार के खजाने को भी इसी तरह के मुद्दों का सामना करना पड़ता है। खर्च की गुणवत्ता राज्य स्तर पर अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि सामूहिक रूप से वे, केंद्र सरकार की तुलना में कहीं अधिक खर्च करते हैं। कुछ राज्यों में राजकोषीय स्थिति चिंताजनक है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अर्थशास्त्रियों के एक हाल के अध्ययन से पता चला है कि सभी राज्य सरकारों द्वारा किए गए कुल खर्च में राजकोषीय स्तर पर 10 सबसे अधिक कमजोर राज्यों का योगदान करीब आधा है। इन राज्यों में बजट की बढ़ती कमी से कुल खर्च प्रभावित होगा। अध्ययन से पता चलता है कि 10 कमजोर राज्यों में से पांच में डेट स्टॉक अब टिकाऊ नहीं है और पिछले पांच वर्षों से सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) की तुलना में ऋण तेजी से बढ़ रहा है।
ऐसे में आवश्यक है कि दोनों स्तरों पर सरकारें संभावित वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए खर्च को तर्कसंगत बनाएं और प्राथमिकता दें। सरकारें कुछ अहम खर्च वाली मदों में बदलाव नहीं कर सकती हैं जैसे कि ब्याज भुगतान आदि। ऐसे में उन्हें सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने की आवश्यकता होगी। आरबीआई के अध्ययन में बताया गया है कि राज्यों के लिए कुल राजस्व खर्च में सब्सिडी का हिस्सा वर्ष 2019-20 में 7.8 प्रतिशत से बढ़कर 2021-22 में 8.2 प्रतिशत हो गया।
कुछ राज्यों के राजस्व खर्च में सब्सिडी का हिस्सा 10 प्रतिशत से अधिक है। अनुमानों से पता चलता है कि विभिन्न राज्यों में मुफ्त उपहारों पर खर्च की जाने वाली राशि जीएसडीपी का 0.1 से 2.7 प्रतिशत है। मुफ्त उपहारों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है और अक्सर इसे जरूरी कल्याणकारी योजनाओं के खर्च के साथ जोड़ा जाता है। इस चर्चा को सार्थक तरीके से आगे बढ़ाने के लिए बजट सब्सिडी और किए गए खर्च के स्तर को अलग करना जरूरी है। इस संबंध में सुदीप्त मंडल और शताद्रु सिकदर का 2019 का एक शोध पत्र उपयोगी हो सकता है।
शोध पत्र से पता चलता है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी का स्तर वर्ष 1987-88 में जीडीपी के 12.9 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में 10.3 प्रतिशत हो गया। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध पत्र स्पष्ट रूप से पात्र और अपात्र सब्सिडी के बीच अंतर करता है। इसने भोजन, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और स्वच्छता के लिए जरूरी सब्सिडी सीमित कर दी है। अन्य सभी सब्सिडी को अनुचित माना जाता था।
इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह शोध पत्र स्पष्ट रूप से पात्र और गैर-पात्रता वाली सब्सिडी के बीच अंतर करता है। इस शोध पत्र में भोजन, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और स्वच्छता के लिए सब्सिडी को अनिवार्य बताया गया है जबकि अन्य सभी सब्सिडी को अनुचित बताया गया।
शोध पत्र में कहा गया है कि जरूरी सब्सिडी का हिस्सा 1987-88 में लगभग 36 प्रतिशत से बढ़कर 2015-16 में 44 प्रतिशत से अधिक हो गया। लेकिन इसका मतलब यह हुआ कि 50 प्रतिशत से अधिक सब्सिडी अब भी गैर-जरूरी मद में चली गई। इस शोध में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और पीएम-किसान सम्मान निधि के तहत खर्च को शामिल नहीं किया गया। अधिकांश गैर-जरूरी सब्सिडी, राज्य सरकारों द्वारा दी गई जो सकल घरेलू उत्पाद का 4 प्रतिशत से अधिक है।
ऐसे में पहले यह जानने की आवश्यकता है कि केंद्र और राज्यों द्वारा जरूरी और गैर-जरूरी सब्सिडी पर कितना खर्च किया जा रहा है। यह विशेषज्ञों के एक स्वतंत्र समूह द्वारा किया जा सकता है। चूंकि खर्च की गुणवत्ता की निगरानी करनी जरूरी होती है, ऐसे में एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद के बारे विचार करने की आवश्यकता है।
परिषद, अर्थव्यवस्था की स्थिति, संसाधन जुटाने, सरकार के दोनों स्तरों के लिए खर्च की गुणवत्ता और दीर्घकालिक अनुमानों का एक स्वतंत्र मूल्यांकन करा सकती है। चूंकि संसाधनों का आवंटन केवल विधायिका द्वारा तय किया जा सकता है, ऐसे में परिषद का मूल्यांकन और इसकी सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होंगी। हालांकि, इसका विश्लेषण और रिपोर्ट अधिक चर्चा की गुंजाइश बनाएगा।
उदाहरण के तौर पर मतदाता के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि यदि किसी सरकार को ऋण चुकाने में कठिनाई हो रही है, तो वह सभी घरों को मुफ्त बिजली देने की स्थिति में नहीं है। राजकोषीय स्तर पर संकट से घिरी सरकारें कल्याणकारी कामों और पूंजीगत खर्च में कटौती करेंगी, तब इससे आमदनी के निचले पायदान पर रहने वाले नागरिकों की मुश्किल बढ़ेगी। ऐसे में किसी मुफ्त उपहार की गुंजाइश नहीं है। इस तरह के खर्च की वास्तविक लागत का अंदाजा देश के अधिकांश हिस्सों में मौजूद बुनियादी ढांचे, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति से लगाया जा सकता है।