सरकार ने काफी आगा-पीछा करने और संशय की स्थिति बनाए रखने के बाद आखिरकार पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढाने का फैसला कर ही लिया।
खास बात यह रही कि इसके भार को थोड़ा-थोड़ा कई क्षेत्रों पर डाला गया। लेकिन सच्चाई यह है कि दाम बढाए जाने और करों में कटौती किए जाने के बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों को प्रति लीटर तेल या प्रति सिलेंडर गैस पर काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह ऐसा काम है जिसे पेंचीदा हालात में आधा किया गया है।
यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें कम नहीं होने जा रही हैं, बल्कि बढ़ेंगी ही। भविष्यवाणी की जा रही है कि अगले दो साल में इनकी कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी। इसमें एक दशक पहले की तुलना में नाटकीय बढ़ोतरी हुई है। इसके कई कारण हैं।
पहला- पूरी दुनिया के लोग कह रहे हैं कि चीन और भारत की उभरती अर्थव्यवस्था के चलते तेल की खपत में उनकी भागीदारी बढ़ रही है। उनकी मांग बढ़ रही है और यह तय है कि आपूर्ति नहीं बढ़ रही है। यह कमोबेश स्पष्ट है कि हाइड्रोकार्बन का युग समाप्त हो रहा है।
दूसरी बात यह है कि खदानों की क्षमता घट रही है क्योंकि कोई भी बड़ी नई खदान नहीं मिली है और आंशिक रूप से जो बचा भी है, वहां से तेल का दोहन बहुत ही जोखिम भरा काम है। एक यही उम्मीद बची है कि तेल उत्खनन की नई तकनीकें सामने आ रही हैं, जिससे दुनिया की पहुंच वहां तक हो सकती है, जहां पहले नहीं पहुंचा जा सका था। लेकिन इन तमाम तथ्यों पर गौर करने पर यही बात सामने आती है कि अब आसान और सस्ते तेल के दिन खत्म हो चुके हैं।
ऐसे परिदृश्य में तेल की थोड़ी कीमतें घटाने या करों में कटौती किए जाने का कदम बहुत प्रभावी नहीं है। इस समय हमें मांग में कमी करने की रणनीति बनाने की जरूरत है। इसके साथ तेल की हर बूंद का अधिकतम उपयोग करने और इसके अन्य विकल्पों पर भी विचार करना होगा। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि भारत में बहुत कम लोग पेट्रोलियम का सीधे प्रयोग करते हैं और उससे भी ज्यादा संख्या उन लोगों की है जिन्हें इसकी जरूरत है। ऐसी स्थिति में इसके लिए दूरगामी नीति और भी जरूरी हो जाती है।
यही वे तमाम मुद्दे हैं जिन पर बहस की जरूरत है। लिक्विड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की कीमतों को ही लें। सरकार ने 14.50 किलोग्राम के एक सिलेंडर की कीमतों में 50 रुपये की बढ़ोतरी करने की घोषणा की है। जबकि हालत यह है कि वास्तविक कीमत तक पहुंचने के लिए इसमें कम से कम 300 रुपये बढ़ाए जाने की जरूरत थी। दूसरे शब्दों में, खाना बनाने वाली ऊर्जा पर सब्सिडी जारी है। लेकिन इसमें कुछ भी नया नहीं है।
हकीकत यह है कि एलपीजी को हमेशा ही सब्सिडी देकर इसे प्रयोग किए जाने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। समस्या यह है कि हममें से बहुत से लोग एलपीजी का उपयोग करते हैं और सरकार सबको सब्सिडी देती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो अभी अमीर लोग ही गैस का इस्तेमाल करते हैं और जब गरीब लोग भी इसका उपयोग करने लगेंगे तो सरकार के लिए सब्सिडी देना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन इस समय भार सहना ही वास्तविक सवाल है जिसमें भारतीय शैली के समाजवाद में गरीबों के नाम पर अमीरों को सब्सिडी दी जाती है।
अगर हम खाना बनाने के लिए और अपनी गाड़ियां चलाने के लिए कार्बनिक पदार्थों का इस्तेमाल करने का खर्च वहन करने में सक्षम हैं तो हमारे पास इस पर चर्चा करने के लिए कोई वक्त नहीं है। हमारे अर्थशास्त्री भी इसी मुद्दे पर बहस करते हैं कि कीमतों में बढ़ोतरी का भार सहने में हमारी अर्थव्यवस्था सक्षम नहीं है, इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी नहीं होनी चाहिए।
उदाहरण के लिए बाजार के वर्तमान रुख में हमें संगठित रिटेल चेनों के लिए जिंसों की ढुलाई दूर दराज के इलाकों से करनी है, इसलिए ईंधन के दामों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी इस व्यवसाय पर बुरा असर डालेगी। इसलिए हम अपने यातायात को बेहतर किए जाने को प्रोत्साहन दे रहे हैं। रेल की बजाय सड़कों का विस्तार हो रहा है। इसलिए ऐसा दिखाया जा रहा है कि कीमतें ज्यादा लोगों को प्रभावित कर रही हैं।
ज्वलंत मुद्दा यह भी है कि गरीबों और आम लोगों का ईंधन कहे जाने वाले डीजल को भी संरक्षण नहीं दे सकते क्योंकि हमारी नीतियों या कहें कि उनकी कमजोरी की वजह से निजी वाहनों में इसके इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है। आज मर्सिडीज बेंज भी इस ईंधन से चलती है, जिसके बारे में सरकार का कहना है कि इस पर करीब केरोसिन जितना ही करीब 31.58 रुपये प्रति लीटर का नुकसान होता है।
आज की हालत में अगर डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जाती है, तो इसका मतलब होगा कि अमीरों की कारों के लिए सब्सिडी दी जा रही है। अब हालत यह है कि अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बहुत ज्यादा अंतर होता है तो कार से चलने वाले लोग पेट्रोल कार से न चलकर डीजल से चलने वाली कारों का इस्तेमाल करने लगेंगे। इससे सब्सिडी का बोझ और बढ़ जाएगा। कितनी हास्यास्पद हैं हमारी नीतियां!
स्पष्ट रूप से यह फैसले की घड़ी है। हम अपने शहरों में सार्वजनिक यातायात की बात कर सकते हैं, लेकिन इसके साथ ही हमें हमारी सड़कों पर चलने वाली कारों की बजाय बसों पर लगने वाले करों को खत्म करना होगा। जब मैने वित्तमंत्री पी. चिदंबरम को बसों पर लगने वाले उत्पाद शुल्क को कम करने के लिए खत लिखा तो उन्होंने छोटी कारों पर लगने वाले कर को खत्म किया और इसका बोझ बसों पर डाल दिया।
यहां पर कार्य कुशलता को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती। मैं इस तरह के कदमों के लिए बार बार कोशिश कर सकती हूं। यह उचित वक्त है कि हमारे प्रधानमंत्री ऊर्जा की सुरक्षा के लिए बात शुरू करें। वे अपनी शोभायात्राओं में कारों के काफिले की बजाय बसों का प्रयोग कर सकते हैं। यही समय है कि हमारे राजनेताओं को समझना चाहिए कि बचत करना गरीबी की निशानी नहीं है।