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चिंतित करता मध्यवर्ग का सिकुड़ता दायरा

Last Updated- December 11, 2022 | 5:43 PM IST

मैं डॉक्टरों के परिवार से हूं। मेरे दादा जी और पिता जी डॉक्टर थे। मेरी खुद योग्यता आधारित शिक्षण तंत्र में गहन आस्था है। ये सभी पहलू मुझे एक खांटी मध्य वर्ग की श्रेणी में रखते हैं और इस वर्ग का हिस्सा होने के नाते मुझे तब बहुत बेचैनी होने लगती है, जब मुझे भारत के साथ-साथ अमेरिकी और यूरोपीय मीडिया में ऐसी सुर्खियां पढ़ने को मिलती हैं कि दुनिया में मध्यम वर्ग के आकार में नाटकीय रूप से कमी आ रही है।
एक प्रतिष्ठित अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर का कहना है, ‘आर्थिक सुस्ती के परिणामस्वरूप वर्ष 2020 में भारत में मध्य वर्ग के आकार में 3.2 करोड़ की कटौती का अनुमान है।’ जर्नल ऑफ इकनॉमिक इशूज की एक अन्य रपट के अनुसार, ‘यूरोप के 26 में से 18 देशों में मध्य वर्ग का आकार घटा है।’ वहीं बिजनेसइनसाइडर.कॉम की रपट में कहा गया है, ‘वर्ष 2000 के दौरान अमेरिका में मध्य वर्ग की 7.2 करोड़ नौकरियां उपलब्ध थीं, जो अब केवल 6.5 करोड़ रह गई हैं।’ ये रुझान यही संकेत करते हैं कि मध्यम-वर्गीय नौकरियों में आ रही कमी के चलते ही मध्यम वर्ग का दायरा सिकुड़ रहा है।
यदि दुनिया भर में मध्यम-वर्गीय नौकरियों में कमी आ रही है तो क्या दुनिया में कहीं कोई ऐसी औद्योगिक क्रांति भी हो रही है, जैसी 18वीं शताब्दी में हुई थी, जब बुनाई और कताई मशीनों की दस्तक ने इंगलैंड से लेकर यूरोप और भारत तक हथकरघे पर काम करने वाले लोगों के रोजगार छीन लिए थे।
इसकी गहन पड़ताल से पहले यह विचार करने योग्य है कि यदि किसी देश में मध्यम-वर्ग का आकार घटता है तो उस देश को इसका क्या खमियाजा भुगतना पड़ सकता है? अरस्तू के समय से ही तमाम विद्वान यह मानते आए हैं कि जो समाज सशक्त मध्यम वर्ग द्वारा संचालित-प्रशासित होते हैं, वे धनी या बेहद गरीब लोगों द्वारा प्रशासित समाजों से बेहतर प्रतीत होते हैं। मध्यम वर्ग एक ऐसा स्तंभ है जो सामाजिक समरसता और आर्थिक प्रदर्शन को ठोस आधार प्रदान करता है।
भारत के मामले में ही देख लीजिए कि जिन नेताओं ने भारी त्याग कर आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिया, वे मुख्य रूप से मध्यम वर्ग से ही थे। इनमें गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता, अरविंद घोष, जवाहरलाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल और मौलाना आजाद जैसे तमाम नाम शामिल हैं। ऐसे में बड़ा प्रश्न यही है कि अगर इस समय देश में मध्यम वर्ग का आकार सिकुड़ रहा है तो भविष्य में हम किस प्रकार के नेताओं की अपेक्षा कर सकते हैं?
यह मुद्दा स्पष्ट रूप से इतना महत्त्वपूर्ण हो गया है कि विकिपीडिया ने इसके लिए ‘मिडल-क्लास स्क्वीज (मध्यम-वर्गीय सिकुड़न)’ नाम से एक नया खंड ही बना दिया है। यह मध्यम वर्ग को, ‘बेहतर वेतन के साथ एक भरोसेमंद-टिकाऊ नौकरी, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, सुरक्षित एवं स्थायी आवास, अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की व्यवस्था, जिसमें उच्च शिक्षा भी शामिल है, सैर-सपाटे और जीवन के कुछ बड़े अवसरों पर अवकाश का प्रावधान और गरिमापूर्ण तरीके से सेवानिवृत्ति’ जैसे पहलुओं के आधार पर परिभाषित करता है। यह काफी आश्वस्त करने वाला है।
….परंतु, फिर कुछ बड़े झटकों की बारी आती है। यह भारत से फोर्ड मोटर्स, जनरल मोटर्स और हार्ली डेविडसन के बाहर निकलने का उल्लेख करता है कि कई वर्षों के घाटे के कारण इन दिग्गजों को यह फैसला करना पड़ा, क्योंकि यहां पर्याप्त क्रय शक्ति वाले मध्यम वर्ग का अभाव था।
कुछ और चिंताजनक रुझान भी हैं, जो भारतीय मध्य वर्ग की संरचना को लेकर हमारी सामान्य समझ को हिला देते हैं। अपने हालिया फैसले में एक भारतीय अदालत ने सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को ‘लेबर’ यानी मजदूर की श्रेणी में रखा और कहा कि हमारे औद्योगिक कानूनों में मजदूरों के संरक्षण से जुड़े प्रावधान उन पर भी लागू होने चाहिए। फिर ‘गिग’ अर्थव्यवस्था के सैलाब की बात आती है। क्या आपको वे लोग याद हैं, जो ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म्स पर ऑर्डर किए गए आपके सामान को घर तक पहुंचाते हैं? गिग अर्थव्यवस्था का सरोकार उन्हीं लोगों से है। नीति आयोग की एक हालिया रपट के अनुसार ऑनलाइन डिलिवरी में ऐसे करीब 80 लाख लोग जुड़े हैं और अगले दस वर्षों के भीतर यह आंकड़ा 23.5 करोड़ तक पहुंचने के आसार हैं। इन युवाओं को गिग वर्कर्स ही कहा जाता है और विडंबनाओं की विडंबना देखिए कि सबसे बड़े आकार के ऐसे रोजगार अत्याधुनिक उच्च-तकनीकी कॉमर्स वाली कंपनियों द्वारा सृजित किए जा रहे हैं।
तमाम विश्लेषक मानते हैं कि चूंकि भारत की आबादी विशेषकर युवा आबादी पश्चिम और चीन की तुलना में अधिक है तो वर्ष 2025 तक भारत में विश्व के सबसे बड़े मध्यम वर्ग के आकार लेने की संभावनाएं हैं। अर्थशास्त्र में यह भी एक स्थापित तथ्य है कि देशों में भविष्य की आर्थिक वृद्धि युवाओं के उपभोग स्तर से ही गति पकड़ेगी। भारत के मामले में तो यह और भी अधिक प्रासंगिक है, क्योंकि हमारे सकल घरेलू उत्पाद में 60 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सेदारी निजी उपभोग की है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यही है कि ऐसी कौनसी जादुई छड़ी है, जो हमारे सक्षम युवाओं का ऐसा वर्ग तैयार कर पाएगी, जो मकान से लेकर तमाम अन्य प्रकार के सामान की खरीदारी में सक्रिय रहते हुए आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करते रहेंगे?
राष्ट्रीय शिक्षा आयोग, 2020 से अपने जुड़ाव के दौरान मैंने एक प्रमुख सुझाव की अनुशंसा की और अन्य सदस्यों ने भी उसका व्यापक तौर पर अनुमोदन किया। सुझाव यही था कि हमें स्कूलों में कक्षा आठ के बाद से ही सभी छात्रों को डेटा साइंस की शिक्षा देनी चाहिए, क्योंकि इसी तरह से वे अवसरों को भुना पाएंगे और तब कोई दसवीं पास बच्चा भी उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था में रोजगार प्राप्त कर सकता है। मैंने बताया कि यह उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था में इन युवाओं को सहज बनने के लिए तैयार करेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसे समाहित भी किया गया है। बस हमें इसके उचित क्रियान्वयन की आवश्यकता है, क्योंकि डेटा विज्ञान ही आर्थिक वृद्धि का वास्तविक सारथी बनने वाला है।
इस समय की असल चुनौती यही है कि हमारे नीति निर्माताओं को इसकी तात्कालिकता दिखाई दे। जैसा कि पहली औद्योगिक क्रांति के विषय में मैल्कम थॉमिस उल्लेख करते हैं, ‘उस दौर के तमाम दिग्गजों चाहे वह कीट्स, शैली या वर्ड्सवर्थ जैसे कवि हों या फिर स्मिथ, माल्थस और रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्री, वे सभी इससे अनभिज्ञ रहे कि उनका दौर आधुनिक विश्व के निर्माण का संक्रमण काल है।’ उसके करीब सौ वर्ष बाद अर्थशास्त्री अर्नोल्ड टायनबी ने ‘औद्योगिक क्रांति’ शब्द गढ़ा था।
(लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं)

First Published - July 8, 2022 | 12:10 AM IST

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