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बदली बदली सी है भारत चीन निवेश की दास्तान

Last Updated- December 07, 2022 | 6:00 PM IST

भारत की यात्रा पर आए एक चीनी कंसल्टेंट ने एक बार कहा था कि जब उन्होंने भारतीय कंपनियों से यह कहा कि चीन में निवेश नहीं करने से उनका विकास अवरुद्ध हो जाएगा तो उन्होंने इसका जवाब देने में कोई उत्साह नहीं दिखाया।


किसी भी घरेलू कारोबारी को उन्हें यह कहना चाहिए था कि भारतीय कंपनियों को भी यही लगता है कि अगर चीन की कंपनियों को विकास करना है तो उन्हें भारत में निवेश करना ही होगा। भले ही भारत-चीन निवेश नीति को अब भी वैश्विक कारोबारी रणनीतियों में गंभीरता के साथ देखा जाता है, फिर भी अगर भारतीय और चीनी कारोबारियों का जिक्र करें तो उनके रुख में खासा परिवर्तन आया है।

जिस तरीके से दोनों देशों की कंपनियां विदेशी विलय और अधिग्रहण में दिलचस्पी दिखा रही हैं उनसे यह साफ होता है कि अब कारोबारी राष्ट्रीयता की भावना से ऊपर उठकर कारोबार करने में दिलचस्पी ले रहे हैं। अब दोनों ही देशों के कारोबारियों के लिए इतना भर काफी नहीं है कि वे सीमा पार भारत और चीन में निवेश कर रहे हैं, उनके लिए यह सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है कि वे कितनी जल्दी बेहतर उत्पादों को उपभोक्ताओं तक पहुंचा पा रहे हैं, फिर चाहे वे देश के किसी भी कोने में क्यों न रहते हों।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत और चीन के कारोबारी उपभोक्ता केंद्रित होकर अपनी कारोबारी नीतियां तैयार कर रहे हैं बल्कि, यूरोप, अमेरिका, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया और कई दूसरे देश भी काफी पहले से उपभोक्ताओं को केंद्र में रखकर कारोबार करने की कोशिश में जुटे हुए हैं और ऐसा करने में वे कामयाब भी हो रहे हैं।

हां इतना जरूर है कि कंपनियों की ओर से कारोबारी नीतियां तैयार करते वक्त यह ध्यान रखा जाता है कि वे किस तरीके की सेवाएं या उत्पाद उपभोक्ताओं तक पहुंचा रही हैं। वर्ष 2000 में चीन सरकार ने विशाल विदेशी मुद्रा भंडार और अपने पक्ष में व्यापार संतुलन को देखते हुए ही ‘गो ग्लोबल’ नाम से विदेशों में प्रत्यक्ष निवेश या ओडीआई नीति की घोषणा की थी।

तब से चीन से हो रहा विदेशी निवेश बढ़कर 15 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि वर्ष 2011 तक यह 60 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर जाएगा। पर जिस तेजी के साथ चीन में सरकारी कंपनियां विदेशों में ऊर्जा संपत्तियों के विस्तार के लिए बोली लगा रही हैं, उससे लगता है कि यह आंकड़ा अनुमानित आंकड़े से भी अधिक होगा।

चीनी कंपनियों ने कुछ महत्त्वपूर्ण विदेशी अधिग्रहण भी किए हैं। इनमें साल 2005 में लेनेवो की ओर से आईबीएम की पीसी इकाई का अधिग्रहण और बेनक्यू की ओर से सीमेंस के मोबाइल कारोबार का अधिग्रहण महत्त्वपूर्ण है। भारत के संदर्भ में अगर बात की जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार ने देश में कारोबारी नीतियां बनाते समय कोई ठोस वैश्विक नीति का ध्यान नहीं रखा है।

अगर भारतीय कारोबारियों ने बड़े पैमाने पर विदेशों में पैसा लगाया है तो उसकी एक वजह यह भी है कि देश में अपने कारोबार विस्तार में उन्हें कई दिक्कतें पेश आती हैं। उदाहरण के लिए हम टाटा स्टील का ही जिक्र करते हैं।

कंपनी को चाहिए था कि वह पूर्वी भारत में ही अपने कारोबार को मजबूत करने का प्रयास करती, पर झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में कंपनी 2.3 करोड़ टन की नई क्षमता का विकास करना तो चाहती है पर उसकी परियोजनाएं किन्हीं कारणों से इन पूर्वी राज्यों में अटकी पड़ी हैं। ऐसे में टाटा के लिए अपने से कई गुना बड़ी ऐंग्लो-डच कंपनी कोरस का अधिग्रहण करना देश में विस्तार करने से कहीं आसान था।

टाटा मोटर्स का उदाहरण भी कुछ इसी तरह का है। कंपनी को पश्चिम बंगाल के सिंगुर में कार संयंत्र लगाने में जितनी मुश्किलें आईं उसकी तुलना में बड़ी आसानी से कंपनी ने विदेशी लग्जरी ब्रांडों लैंड रोवर और जगुआर को अपने काफिले में शामिल कर लिया था।

वहीं कुछ छोटी कंपनियां बड़ी तेजी से अपने से कई गुना बड़ी विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण इसलिए भी कर रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें बड़ी तेजी के साथ विस्तार करने की जरूरत है। यही वजह है कि अगर भारत की ओर विदेशी विलय और अधिग्रहण ने पिछले साल अगर 35 अरब डॉलर के आंकड़े को छू लिया है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

पर एक सवाल जिसका जवाब अब भी खोजा नहीं जा सका है वह यह है कि क्या जिस आसानी के साथ दोनों देशों की कंपनियां विदेशी अधिग्रहण कर रही हैं, क्या वे विदेशी बाजार में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों का उसी आसानी के साथ मुकाबला कर पा रही हैं? कम से कम चीनी कंपनियों के लिए तो इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं होगा।

उदाहरण के लिए सीमेंस की मोबाइल इकाई का अधिग्रहण करने के एक साल बाद बेनक्यू को पता चला कि यह अधिग्रहण सफल नहीं रहा और उसने रिकार्ड 1 अरब डॉलर का नुकसान दर्ज किया। वहीं दूसरी ओर भले ही आईबीएम के पीसी कारोबार का अधिग्रहण करने से लेनेवो बाजार हिस्सेदारी के मामले में एशिया प्रशांत क्षेत्र में आगे रही है, पर फिर भी वैश्विक बाजार में अब भी लेनेवो प्रतिद्वंद्वी कंपनियों एचपी और डेल से पीछे चल रही है।

इसे साल 1991 तक भारत की मिश्रित अर्थव्यवस्था नीति का ऐहसान ही माना जाए कि भारतीय कारोबारी अर्द्ध-प्रतियोगी बाजारों में चीनी कारोबारियों की तुलना में अधिक सहजता के साथ व्यापार कर पाते हैं। एशियन पेंट्स और भारत फोर्ज जैसी कंपनियों ने अपने विदेशी उपक्रमों से भारी मात्रा में कमाई की है।

पर असली परीक्षा तो तब होगी जब यह देखने को मिलेगा कि टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और आदित्य बिड़ला समूह जैसी भारतीय कंपनियां विदेशी अधिग्रहणों के बाद उन कंपनियों का परिचालन कितने बेहतर ढंग से कर पाती हैं। हालांकि इस सवाल का जवाब मिलने में अभी पांच से अधिक सालों का इंतजार करना पड़ेगा।

First Published - August 20, 2008 | 10:47 PM IST

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