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कथित नक्सलियों की कहानी फिल्म निर्माता की जुबानी

Last Updated- December 07, 2022 | 4:40 PM IST

चलिए हम आपसे एक सवाल पूछते हैं कि अगर कोई फिल्म निर्माता जेल में कैद हो तो वह क्या करेगा?


जवाब देना शायद थोड़ा मुश्किल हो, पर अगर इस चर्चा में फिल्म निर्माता अजय टीजी का नाम जोड़ दें तो कह सकते हैं कि कैद भी उनके लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन सकती है। अजय दुर्ग जेल में अपने ही तरह के 74 दूसरे लोगों के जीवन से कहानी की प्रेरणा ले रहे थे जिन्हें बिना किसी वजह के नक्सलवादी करार देकर जेल में डाल दिया गया था।

अजय को चार महीने पहले जेल में बंद कर दिया गया था और पिछले ही हफ्ते उन्हें कैद से रिहा किया गया है। पर शायद इस समय को भी उन्होंने यादगार बना लिया। दरअसल जब वह जेल में कैद थे तो उनके पास काफी समय था कि वह भिलाई में बिताए तीन दशकों को याद कर सकें जब वह केरल के त्रिशूर जिले में इंगादीयुर गांव को छोड़ कर आए थे। तब वह केवल 15 साल के थे।

जब अजय अपना गांव छोड़कर आए थे तब शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि वह फिल्म की दुनिया में कदम रखेंगे। वह दरअसल अपने पिता के छोटे से कारोबार में हाथ बंटाने के लिए भिलाई आए थे। पर शायद उनकी किस्मत में कुछ और ही लिखा था और उन्होंने यहां आकर कैमरा चलाना सीखा और मानवविज्ञानी जोनाथन पेरी के साथ भी काम किया। पेरी औद्योगीकरण के बीच बरकरार गरीबी के बारे में शोध कर रहे थे। आखिरकार नक्सलवादी करार देकर उन्हें जेल में कैद कर दिया गया।

छत्तीसगढ़ पुलिस अजय के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाई और इसी वजह से पिछले हफ्ते उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। हालांकि अजय अगर जेल से रिहा किए गए हैं तो इसके पीछे फिल्म जगत का इस बारे में एकजुट होना भी एक वजह है। अडूर गोपालकृष्णन और मृणाल सेन जैसे फिल्मनिर्माताओं ने उनकी गिरफ्तारी पर पुलिस की काफी आलोचना की थी।

आखिरकार इसे फिल्म जगत की ही जीत माना जाएगा क्योंकि छत्तीसगढ़ पुलिस को भी इस बात का एहसास हो गया कि उसने बिना किसी सबूत के ही अजय को गिरफ्तार कर लिया है। जब अजय दुर्ग जेल में कैद थे उस दौरान मानवाधिकार अभियानों के जरिए उनकी रिहाई को लेकर काफी प्रयास किए गए। देश भर के स्वयंसेवी संगठनों ने उनकी रिहाई को लेकर आवाज उठाई।

हालांकि खुद अजय को अपनी गिरफ्तारी पर बहुत आश्चर्य नहीं होता है। वह कहते हैं कि अगर वह सिर्फ एक फिल्मनिर्माता होते तो शायद उनकी गिरफ्तारी पर अचरज किया जा सकता था। पर वह खुद को एक फिल्म निर्माता के पहले एक सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं। अजय कहते हैं, ‘मैंने एक भी ऐसी फिल्म नहीं बनाई है जो प्रायोजित हो। मैं कम खर्चे में फिल्में बनाने में यकीन रखता हूं और मैंने ऐसा ही किया है। खुद मेरी पत्नी ने उन फिल्मों की एडिटिंग की है।’

जिस समय अजय को गिरफ्तार किया गया था उस समय को याद करते हुए वह बताते हैं कि जनवरी में जब पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा था उसी समय वह समझ गए थे कि आगे कुछ होने वाला है। पुलिस छापेमारी के बाद उनका कंप्यूटर और कुछ कागजात भी अपने साथ ले गई थी। बाद में 5 मई को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।

अजय बताते हैं कि पुलिस ने कभी भी उनसे पूछताछ नहीं की क्योंकि उनके पास न तो कोई सबूत था और न ही कोई ऐसी सूचना थी जिसके आधार पर उन्हें गिरफ्तार किया जा सकता हो। अजय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता रहे हैं और फिलहाल पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज (पीयूसीएल) के सदस्य हैं।

अजय कहते हैं, ‘चूंकि छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी ऐक्ट, 2005 के तहत पीयूसीएल को टारगेट किया जा रहा था, इस वजह से मुझे थोड़ा बहुत अंदेशा था कि ऐसा कुछ हो सकता है।’ ये तो हुई अजय के गिरफ्तार और उनसे जुड़ी कुछ बातें, पर अब हम जरा इनसे हटकर उन कामों का जिक्र करते हैं जो वह जरूरतमंदों के लिए कर रहे हैं।

वह भिलाई में जहां रहते हैं वहां उनके घर के पास ही एक स्लम है जहां वह बच्चों के लिए एक स्कूल चलाते हैं। द्राक्षी नाम के इस स्कूल में अजय अपने दो दोस्तों के साथ पढ़ाते हैं। यहां करीब 25 बच्चों को न सिर्फ पढ़ाया जाता है बल्कि उनके भरण पोषण की व्यवस्था की गई है। अजय की कोशिश है कि इन बच्चों को फिर से मुख्य धारा में वापस लाया जा सके।

दरअसल अजय जब शोध कार्य से जुड़े थे, उसी दौरान उन्होंने गरीबी को काफी नजदीक से देखा था और तब से उनके मन में यह बात बैठ गई थी कि उन्हें गरीबों के लिए कुछ करना चाहिए। अजय कहते हैं, ‘मैं यह नहीं बर्दाश्त कर सकता कि मैं जिन लोगों पर शोध कर रहा हूं उनकी मदद न कर सकूं।’

उन्हें इस बात की खुशी है कि अडूर जैसे लोगों ने उनके काम को समझा है और अब वह हिंदी में एक फीचर फिल्म बनाने की ख्वाहिश रखते हैं। इस फिल्म की स्क्रिप्ट अजय ने दुर्ग जेल में लिखी थी। उन्हें नहीं लगता कि राज्य और छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच जो विवाद चला आ रहा है वह इतनी आसानी से खत्म हो पाएगा।

बस्तर क्षेत्र संसाधनों के मामले में काफी समृध्द है पर उसके बाद भी वहां के लोग नहीं चाहते कि उस इलाके में खनन का काम शुरू किया जाए। पर जब तक जमीन के नीचे खनिज संसाधन छिपे हैं तो तय है कि सरकार इसे बेचने को तैयार ही रहेगी।

और आखिर में अजय से नक्सलियों के बारे में पूछा गया। क्या वे विद्रोही हैं? पर इस बारे में अजय ने कुछ भी नहीं कहा, उन्होंने इस सवाल का जवाब अपने कैमरे पर छोड़ दिया। शायद इसका जवाब वह डायरी देगी जिसे नक्सलवाद के संदेह में कैद किए गए कैदी ने जेल की चहारदीवारी में लिखा था।

First Published - August 11, 2008 | 10:32 PM IST

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