उद्योगों पर पड़ रहा है बुरा असर
संजय अग्रवाल
निदेशक, रिजेंसी समूह
महंगाई में लगाम लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक बार-बार सख्त कदम उठा रहा है।
उसका परिणाम क्या होगा यह तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन अभी तो उसका नतीजा यह हो रहा है कि देश में सबसे तेजी से विकसित होने वाले उद्योग विशेषकर रियल स्टेट और ऑटो क्षेत्र पर इसका बुरा असर पड़ रहा है।
आरबीआई ने अपनी मौद्रिक नीति में एक बार फिर से रेपो दर और सीआरआर में बढ़ोत्तरी करके आम आदमी के ‘अपना भी हो एक घर’ के सपने को तोडने का काम किया है। महंगाई और होम लोन की दर में लगातार हो रहे इजाफे से आम आदमी पर दोहरी मार पड़ी है।
एक तरफ महंगाई सारे रिकॉडों को तोड़ते हुए 12 फीसदी केआसपास मंडरा रही है, तो दूसरी ओर बैकों की ब्याज दर 14 फीसदी तक पहुंच चुकी है। कर्ज केदरवाजे भी बंद हो रहे हैं और पहले से लिए कर्ज को चुका पाना भी मुश्किल हो रहा है। लोगों की खरीद क्षमता में कमी आ रही है। इसका सबसे बुरा असर मध्यम वर्गीय लोगो पर पड़ रहा है।
अपने घर का सपना सजोने वाले मिडिल क्लास के लोगों को अब यह सपना देखना ही बंद कर देना चाहिये। चारों तरफ छाई महंगाई से भवन निर्मात भी नहीं बचे है। पिछले साल की अपेक्षा इस समय भाडे में 20-25 फीसदी, मजदूरी 10-15 फीसदी, सीमेंट, लोहा और ईंट केदामों में लगभग 20 फीसदी वृध्दि होने के बावजूद प्रॉपर्टी की कीमतों में 4 से 5 फीसदी की गिरावट देखने को मिल रही है। यह गिरावट आप को अलग अलग क्षेत्रों और अलग अलग भवन निर्माताओं के साइडों में मांग में आई कमी के हिसाब से देखने में मिलेगी।
अपने को दिवालिया होने से बचाने के लिए छोटे बिल्डरों ने सस्ते में ही फ्लैट बेचना शुरु कर दिया है। बड़ी कंपनियों को उतना नुकसान नहीं हो रहा है या कहें की उनमें इस आंधी को झेल जाने की क्षमता है, लेकिन छोटे या कहे कम पूंजी वाले भवन निर्माताओं की तो लुटिया ही डूब सकती है। महंगाई में रोक लगाना जरुरी है लेकिन ऐसा न हो जाए की मुश्किल से पाई गई विकास की रफ्तार ही रुक जाए। इस वर्ष भारत की विकास की रफ्तार दहाई अंक में पहुंचने की उम्मीद की जा रही थी जो अब अगर 8 फीसदी तक भी पहुंच जाए तो बड़ी बात होगी ।
रियल इस्टेट इसके पहले भी मंदी का दंश झेल चुका है और एक बार फिर से उस मंदी की आहट सुनाई देने लगी है। हालांकि मुझे विश्वास है कि 1992-96 के दौरान जो मंदी का दौर चला था वैसी स्थिति नहीं आने वाली है। पर 2003-07 में जो रफ्तार इस इंडस्ट्री ने पकड़ी थी उसमें थोड़ा सा ग्रहण जरुर लगता दिखाई दे रहा है। सरकार को एक बार यह सोचना होगा कि महंगाई की आड़ में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले क्षेत्रों के विकास में कब तक आड़ंगेबाजी की जाएगी।
महंगाई को रोकना जरुरी है लेकिन विकास और किसी इंडस्ट्री का गला घोट कर नहीं होना चाहिए। इस तरह यदि महंगाई में काबू भी कर लिया जाता है तो एक मर्ज को कम करने के चक्कर में दूसरे कई रोगों को निमंत्रण देने वाली बात होगी । सरकार को महंगाई को काबू करने के साथ-साथ देश के उद्योग धन्धों के विकास के बारे में सोचना चाहिए और सोचने के साथ ही उनके विकास के लिए भी कुछ जरुरी कदम उठाने होगें, नहीं तो हमारे देश में आज जो हाल कृषि का है, वही हाल रियल इस्टेट और दूसरे पूंजी प्रवाह से जुड़े उद्योगों का भी हो जाएगा।
आम आदमी के हित में था जरूरी
हितेश अग्रवाल
हेड ऑफ रिसर्च, एंजेल ब्रोकिंग
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी मौद्रिक नीति में जो कदम उठाये हैं, उनका मकसद महंगाई पर रोक लगाना है। देश में महंगाई दर 12 फीसदी तक पहुंच जाने के बाद भी रिजर्व बैंक हाथ में हाथ धरे तो नहीं बैठ सकता है।
केंद्रीय बैंक ने सही कदम उठाते हुए सीआरआर 0.25 फीसदी बढ़ाकर 9 फीसदी और रेपो रेट 0.50 फीसदी बढ़ाकर 9 फीसदी कर दिया है। इस कदम से बाजार में अतिरिक्त नकदी की तरलता को काबू में किया जा सकेगा। अनुमानत: इस कदम से बाजार में से 8000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा की नकदी में कमी आएगी।
आरबीआई ने इस वित्त वर्ष में सीआरआर में चौथी बार और रेपो रेट में तीसरी बार बढ़ोतरी की है। यहां पर यह ध्यान देना होगा कि इस समय भारतीय बाजार में नकदी की तरलता इतनी ज्यादा है कि जब आरबीआई, सीआरआर और रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोत्तरी करता है तो अगले तीन महीनों में बैंक इसको भी कवर कर लेते हैं।
29 अप्रैल को आरबीआई ने मौद्रिक नीति के सहारे एक बार फिर से महंगाई में काबू करने के लिए चाबुक चलाया तो यह सवाल उठने लगा कि केंद्रीय बैंक चाहता क्या है? इसकेपहले सीआरआर और रेपो रेट में वृध्दि करके आरबीआई ने अपने इरादे बैंकों को बता दिये थे लेकिन इसकेबावजूद भी कई बैंकों ने अपनी ब्याज दरों में किसी तरह की बढ़ोत्तरी नहीं की थी, जिसके बाद मजबूरी में आरबीआई को इस तरह के कदम उठाने पड़े। इसके अलावा कुछ बैंकों ने तो अपने फंड केस्रोतों की अपेक्षा ज्यादा ऋण भी दिया ,जिससे उनके जमा और ऋण के अनुपात में असमानता आई है।
कुछ बैंको के बढ़ते जा रहे ऋण पोर्टफोलियो को काबू में करने के लिए भी इस तरह केकदम जरुरी हो गये थे। कुछ लोगों का कहना हैं कि इन कोशिशों का महंगाई की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। यह सवाल करने वालों को यह पता होना चाहिए कि महंगाई की मुख्य वजह घरेलू कारण नहीं बल्कि वैश्विक कारण हैं। हमारे यहां से कही अधिक मंदी का दंश दूसरे देश झेल रहे हैं, अमेरिका जैसी विकसित और मजबूत मानी जाने वाली अर्थव्यवस्था की भी चूलें हिल गई हैं। यह बात आरबीआई को अच्छी तरह पता है, लेकिन वह किसी भी तरह का घरेलू स्तर पर महंगाई को पैर पसारने का मौका नहीं देना चाहती है।
आरबीआई ने जहां बैंकों पर लगाम लगाकर महंगाई रोकने की कोशिश कर रहा है, वही सरकार भी कई जिंसों केकारोबार में रोक लगा कर इससे निपटने का प्रयास कर रही है। इन्ही प्रयासों केइस वित्त वर्ष के अंत तक महंगाई घटकर 7 फीसदी तक पहुंचने की उम्मीद की जा रही है। देश की विकास दर में कमी होने की जहां तक बात है, तो मैं इससे पूरी तरह सहमत नहीं हूं क्योंकि विकास दर 8 फीसदी भी रहती है तो वैश्विक मंदी के इस दौर में बेहतर मानी जानी चाहिये।
बैंकों द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी किए जाने से सबसे ज्यादा हाय तौबा रियल इस्टेट और ऑटो सेक्टर के लोग मचा रहे हैं। किसी भी क्षेत्र में हमेशा मंदी या तेजी नहीं रहती है। व्यापार का एक चक्र होता है जो चलता रहता है। रियल इस्टेट से जुडे लोगों को 1992 की मंदी याद होगी और 2003 के बाद जिस तेजी के साथ इस क्षेत्र से जुड़े लोगों ने पैसा बनाया है उतना फायदा किसी को भी नहीं हुआ है। अगर सच्चाई कही जाये तो अभी भी महानगरों में प्रापर्टी की कीमतें अपनी वास्तविक कीमतों से कही ज्यादा हैं।
बातचीत: सुशील मिश्र