इकोनॉमिक्स का एक पुराना नियम है कि अगर बाजार में प्रतिस्पध्र्दा हुई तो उसका फायदा उपभोक्ता को कम कीमत के रूप में मिलता है।
लेकिन भारतीय टेलिविजन जगत में इस वक्त इस नियम का ठीक उल्टा हो रहा है। टीवी रेटिंग मुहैया करने के बिजनेस में टेलिविजन ऑडियंस मेजरमेंट (टैम) और ऑडियंस मेजरमेंट एंड एनालिटिक्स लि. (एमैप) के बीच कम्पीटिशन तो काफी तेज हो चुकी है। लेकिन इस वजह स्पेशलाइज्ड रेटिंग की कीमत कम होने के बजाए इसमें 10-15 फीसदी का इजाफा होने की पूरी उम्मीद है।
क्यों अहम है रेटिंग?
इस वक्त 80 से ज्यादा एड एजेंसियों और 40 के करीब ब्रॉडकास्टरों ने अपनी दर्शकों की तादाद और विज्ञापनों के ट्रेंड पर नजर रखने के लिए इनका सब्सक्रिप्शन ले रखा है। इन्हीं के डेटा के आधार पर तो विज्ञापनों को स्लॉट तय किया जाता है।
इन कंपनियों द्वारा भेजा गया रेटिंग डेटा बताता है कि कौन से सीरियल लोगों को ज्यादा भा रहे हैं और किस चैनल पर विज्ञापन देना फायदे का सौदा साबित होगा। यह डेटा 200 से ज्यादा कंपनियों के 7500 करोड़ रुपये के विज्ञापन बजट के विभिन्न चैनलों के बीच बंटवारे के लिए काफी अहम स्थान रखता है।
कड़ी प्रतिस्पर्धा
इस वक्त एड एजेंसियां और ब्रॉडकास्टर इस डेटा के लिए इन दोनों कंपनियों को हर साल 80-110 करोड़ रुपये चुकाने पड़ते हैं। वैसे, इस बाजार के अधिकतर हिस्से टैम का कब्जा है। हालांकि, एमैप भी काफी तेजी से प्रगति कर रहा है। दूसरी तरफ, टैम के ऊपर इस बात से भी काफी ज्यादा प्रेशर है कि विज्ञापनदाताओं और ब्रॉडकॉस्टरों के एसोसिएशन, ब्रॉडकास्टर रिसर्च यूजर कॉउंसिल (बीआरयूसी) ने अपनी एक नई रेटिंग एजेंसी खोलने की घोषणा की है।
सूत्रों की मानें तो इसी वजह से तो टैम नई प्रीमियम सर्विसेज लॉन्च करने की सोच रही है, जिसमें ज्यादा बड़े इलाके में टीवी कार्यक्रमों की व्यूअर्रशिप के बारे में जल्द से जल्द पता लगाया जाएगा। साथ ही, टैम डीटूएच दर्शकों के लिए अलग से सर्व करेगी।
इंडस्ट्री के एक जानकार का कहना है कि, ‘टैम और एमैप के बीच की कड़ी प्रतिस्पर्धा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि टैम ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के पहले कुछ मैचों के व्यूअरशिप डेटा का विश्लेषण केवल तीन दिन में ही कर डाला। लेकिन अहम टीवी इवेंट्स की डेटा के जल्द विश्लेषण में ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल होता है, इसलिए इन कीमत तो सब्सक्राइबर से ही वसूली जाएगी। इसीलिए ये डेटा कम से कम 10-15 फीसदी कीमती हो जाएंगे।’
क्यों होगा इजाफा?
एमैप और टैम के व्यूअरशिप डेटा की महीने के सब्सक्रिप्शन की कीमत तीन से लेकर सात लाख रुपये तक के बीच है। वैसे, सूत्रों का कहना है कि खास टीवी कार्यक्रमों के तेज और विस्तृत विश्लेषण में कम से कम 30 से लेकर 70 हजार रुपये तक का खर्च सब्सक्राइबर को उठाना पड़ सकता है।
टैम के सीईओ एल. वी. कृष्णन का कहना है कि, ‘आईपीएल के कुछ मैचों का जैसा हम जल्दी में विस्तृत विश्लेषण किया है, पहले भी उस तरह के विश्लेषण हम अपने ग्राहकों तक पहुंचा चुके हैं। हम बार बार यह साबित कर चुके हैं कि हम जल्दी में अच्छी सर्विस मुहैया करवा सकते हैं।’ टैम ने तो अब दिल्ली और मुंबई के डीटीएच दर्शकों की पसंद, नापसंद पर भी नजर रखनी शुरू कर दी है। वह जल्दी ही इसे भी एड एजेंसियों और ब्रॉडकास्टरों को ऑफर करने की सोच रही है।
कौन है मैदान में?
टैम, दरअसल एसी नेलशन और कंटार मीडिया रिसर्च आईएमआरबी के बीच की ज्वाइंट वेंचर कंपनी है। इसके पास इस वक्त देश भर में 7000 हजार पीपुलमीटर हैं। पीपुलमीटर वह यंत्र होता है, जिससे व्यूअरशिप का पता लगता है। दूसरी तरफ, इसके प्रतिद्वंद्वी कंपनी एमैप का जन्म 2004 में हुआ था। उसे अमेरिकी निवेशकों से पैसे मिलते हैं और उसके देश भर में 6000 हजार से ज्यादा पीपुलमीटर हैं।
यह अपने डेटा को हर दिन जारी करती है, जिसमें क्षेत्र, व्यूअरशीप और दूसरी चीजों के बारे में विस्तृत जानकारी होती है। जीटीवी, एनडीटीवी ग्रुप और नेटवर्क 18 समूह इसके अहम सब्सक्राइबर में शामिल हैं। इसकी प्रवक्ता का कहना है कि, ‘हम तो अब अपने डेटा विश्लेषण के स्पोक को बड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।’
इंडस्ट्री सूत्रों की मानें तो एमैप और टैम के बीच छड़ी हुई इस जंग की वजह से अब बीआरयूसी की नई रेटिंग एजेंसी के लिए बाजार में जगह बनाना मुश्किल काम साबित होगा। उनके मुताबिक अगर इस एजेंसी को अपनी जगह बनानी है तो उसे नई और बेहतर सेवाएं ऑफर करनी होंगी।
सरकार की है नजर
इस बाजार के इतना गर्म होने के एक बड़ी वजह यह भी है कि सरकार भी इस बाजार में कूद पड़ी है। वह इस वक्त इस तरह की सेवाएं उपलब्ध करवाने वाली कंपनियों के लिए नियम कायदे बनाने में लगी हुई है। हाल ही टीवी रेटिंग्स के मुद्दे पर बाजार नियामक ट्राई ने एक सलाह पत्र जारी किया था। इस पत्र में ट्राई ने रेटिंग एजेंसियों के लिए न्यूनतम पात्रता आधार, रेटिंग मशीनों के लिए गाइडलाइंस, सैम्पल साइज और कवरेज एरिया की घोषणा की थी।
ट्राई ने इस बारे में सुझाव भी मंगवाए हैं कि रेटिंग एजेंसियों का ऑडिट होना चाहिए या नहीं। साथ ही, उसने इस बात पर भी सलाह मांगी है कि रेटिंग एजेंसियों और उनके क्लाइंट्स के बीच क्रासहोल्डिंग्स पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए या नहीं।