मीडिया विज्ञापन की दुनिया में अखबार और टेलीविजन के बाद तीसरा सबसे बड़ा रुतबा होर्डिंग उद्योग को प्राप्त है। पर जितनी बड़ी इसकी हैसियत है, इसे नियंत्रित करना उतना ही मुश्किल है।
अवैध निर्माण, ग्रीन बेल्ट्स में अवैध कब्जा, ट्रैफिक में व्यवधान जैसी कुछ समस्याएं इससे जुड़ी हुई हैं। होर्डिंग से अटे पड़े शहरों ने पर्यावरण और ट्रैफिक समस्याओं के कारण इन्हें नियंत्रण में रखने के लिए नियम भी बना लिए हैं। वैसे इन नियमों को लागू कर पाना टेढ़ी खीर है।
कई बार ऐसा भी देखने को मिला है कि जब-जब नियमों को लागू करने के लिए कदम उठाए जाते हैं तो अदालतों के पास विज्ञापनदाताओं की याचिकाओं के अंबार लग जाते हैं। खास तौर पर दिल्ली और तमिलनाडु में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं। एक ऐसा ही उदाहरण नोवा ऐड्स बनाम सेक्रेटरी का है जब उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु से सौ से ज्यादा अपीलों पर विज्ञापनदाताओं के खिलाफ फैसला दिया।
मद्रास उच्च नयायालय ने एक समिति गठित की है जिसका जिम्मा चेन्नई में उन स्थलों को रेखांकित करना है जो मनोरम और ऐतिहासिक महत्त्व के हैं या फिर जहां पूजा अर्चना की जाती है। उच्च न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया था कि अवैध रूप से कब्जा जमाकर जिन जगहों पर होर्डिंग लगाए गए हैं, उन्हें वहां से हटा दिया जाए। इस काम में आगे चलकर जिला कलेक्टर ने भी सहयोग दिया था।
अवैध स्थानों पर लगाए गए होर्डिंग को हटाने में परेशानियां इस वजह से भी आती हैं क्योंकि दीवानी अदालतों ने इन पर रोक लगाई होती है। वहीं उच्च न्यायालय ने भी यह निर्देश दिया था कि अदालतें किसी भी ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई न करें जो अवैध स्थानों पर लगाए गए होर्डिंग को हटाने के विरोध में दायर की गई हों।
विज्ञापनदाताओं और होर्डिंग मालिकों की यह दलील होती है कि नागरिक प्रशासन उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कारोबार की स्वतंत्रता में खलल डाल रहे होते हैं। ऐसी और कई सारी दलीलों को उच्चतम न्यायालय ने नारायण भट्ट बनाम तमिलनाडु राज्य (2001) के मामले में खारिज किया था। टाटा प्रेस बनाम एमटीएनएल मामले में विज्ञापनदाताओं की यह दलील भी थी कि होर्डिंग कारोबारी अभिव्यक्ति का जरिया हैं। हालांकि, इन सब दलीलों को उच्चतम न्यायालय ने खारिज कर दिया था।
न्यायालय को इसी तरह की एक समस्या से, दिल्ली में एम सी मेहता बनाम यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (1997) मामले में सामना करना पड़ा था। अदालत ने यह आदेश दिया था, ‘दिल्ली विकास प्राधिकरण, रेलवे, पुलिस और यातायात अधिकारियों समेत नागरिक प्रशासन को निर्देश दिया जाता है कि वे सड़क किनारे उन होर्डिंग की पहचान करें जो सुचारू यातायात में व्यवधान डालते हों।
इन आदेशों को बिना किसी दूसरे आदेशनिर्देश जिसे किसी अधिकारी, अदालत या टिब्यूनल ने जारी किया हो, को पुलिस की सहायता से माना जाए। इसमें किसी का भी दखल न हो।’ शुरुआत में इस आदेश का फर्क तो देखने को मिला था, पर जैसा कि देखा जा सकता है कि राजधानी अब भी इन होर्डिंग से अटी पड़ी है।
जिस तरह चेन्नई के विज्ञापनदाता दो सालं तक अपनी हारी हुई बाजी के लिए लड़ते रहे, वैसे ही दिल्ली के विज्ञापनदाता भी कॉरपोरेट नियामकों के खिलाफ तब तक लड़ते रहे जब तक उनके आरोपों को उच्चतम न्यायालय ने खारिज नहीं कर दिया। वर्ष 1998 में शीर्ष अदालत ने जो फैसला सुनाया वो और भी सख्त था: ‘यह बहुत साफ है कि ट्रैफिक संकेतों और रोड संकेतों को छोड़कर सड़क के किनारे लगे सभी होर्डिंग को हटा दिया जाए, इससे फर्क नहीं पड़ता कि वह किस तरीके के हैं।
भले ही ये होर्डिंग सड़क किनारे हों या न हों अगर इनसे सुचारू यातायात व्यवस्था में दखल पहुंचता हो तो उनकी पहचान कर उन्हें हटा दिया जाए।’ ऐसा नहीं है कि अधिकारियों के पास अधिकार नहीं हैं। वर्ष 1995 में सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के एक मामले में उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ ने आदेश सुनाया था, ‘जनहित को ध्यान में रखते हुए आम लोगों के ट्रस्टीज के तौर पर राज्यों को यह अधिकार है कि वे सड़कों के अतिक्रमण पर रोक लगा सकें।’
होर्डिंग की समस्या प्लेग की तरह दुनिया के तमाम शहरों में फैल चुकी है और इसे रोकने के लिए अब तक कोई पुख्ता कानून नहीं बनाया जा सका है। अमेरिका में 1909 के दौरान सड़क किनारे लगे होर्डिंग पर रोक लगाने के लिए कोशिशें की गई थीं पर पहले संशोधन ने इन कोशिशों की राह मुश्किल कर दी।
यातायात सुरक्षा विशेषज्ञों ने आउटडोर विज्ञापनों और दुर्घटनाओं के बीच संबंध का पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया था, पर उन्हें इनके बीच कोई सीधा संबंध नहीं मिल पाया। तो उन्होंने ऐसा मान लिया कि सड़क किनारे लगे इन विज्ञापनों से दुर्घटनाओं का खतरा नहीं बढ़ता। पर कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना था कि जिन जगहों पर होर्डिंग लगे हैं वहां ट्रैफिक की रफ्तार धीमी हो जाती है और कई बार दुर्घटनाएं भी होती हैं।
आज के दौर में इन दुर्घटनाओं को बढ़ावा देने का काम एलसीडी विज्ञापन भी कर रहे हैं। इन वैद्य तर्कों को काट कर यह कह पाना कि होर्डिंग की वजह से दुर्घटनाएं नहीं हो रही हैं थोड़ा मुश्किल है। इसे दुनिया भर के यातायात नियमों से आसानी से समझा जा सकता है। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि अजीबो गरीब किस्म के कुछ विज्ञापनों से सड़कों और इमारतों की सुंदरता भी प्रभावित होती है।
यह भी महत्वपूर्ण है कि इन होर्डिंग पर छपे विज्ञापनों के रंग, उनपर छपी आकृतियां, उनका आकार कितना बड़ा है। ये विज्ञापन कितने खतरनाक हैं इनका अंदाजा इन तथ्यों को जानकर भी किया जा सकता है।