अभी हाल ही में रिजर्व बैंक के 22वें गवर्नर ने अपनी कुर्सी संभाली है। 1977 के बाद से डॉ. रंगराजन को छोड़कर इस कुर्सी पर बैठने वाला हर शख्स वित्त मंत्रालय में बतौर सचिव अपनी हाजिरी लगा चुका है।
नए गवर्नर साहब ने भी इस परंपरा को कायम रखा है। असल दिक्कत गुणवत्ता को लेकर नहीं है। नए गवर्नर समेत जितने भी लोग इस कुर्सी पर बैठे हैं, उन सभी का रिकॉर्ड काफी अच्छा रहा है। दिक्कत, एक नौकरशाह को चुपचाप रिजर्व बैंक के गवर्नर की कुर्सी पर बिठाने को लेकर है, जिससे बैंक की नीतियों और नियमों पर असर पड़ सकता है।
वित्त मंत्रालय का एक नौकरशाह कैसे उठा-पटक को शांत कर सकता है, जिसके लिए कहीं न कहीं वह खुद भी जिम्मेदार रहा हो। बैंकों पर नकेल कसने के बारे में वह एकदम से कैसे निष्पक्ष राय कायम कर सकता है, जबकि उस सेक्टर का एक बड़ा हिस्सा कुछ दिनों पहले तक उसी के अंदर में था?
हमें वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक के बीच एक सुरक्षा घेरे की जरूरत है। जहां तक राजकोषीय नीतियों की बात है तो राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) कानून, नए कर्ज प्रबंधन विभाग और रंगराजन सुधारों की वजह से कुछ सुधार तो आए हैं। राजकोषीय घाटे को कम करने की कोशिश का नतीजा मुल्क की ब्याज दरों को चुकाना पड़ सकता है।
लेकिन जहां तक बात बैंकिंग की आती है, तो हमें एक लंबा रास्ता अख्तियार करना है। हमारे पास बैंकिंग व्यवस्था पर नजर रखने के लिए एक खास नियामक संस्था नहीं है, जैसे सेबी पूंजी बाजार पर नजर रखता है। यह जिम्मेदारी अब भी रिजर्व बैंक के कंधों पर है। कई बैंकरों के मुताबिक इस काम को रिजर्व बैंक काफी सख्ती के साथ करता है।
लेकिन फिर भी बैंक के पहले गवर्नर ओसबॉर्न स्मिथ के अलावा इस कुर्सी पर बैठने वाला एक भी शख्स पेशे से बैंकर नहीं रहा है। भारतीय जीवन बीमा निगम के रास्ते रिजर्व बैंक की सबसे ऊंची कुर्सी तक पहुंचने वाले के. आर. पुरी को एक अपवाद के रूप में देखा जा सकता है। खुद रिजर्व बैंक के अपने कैडर से आने वाले लोगों को भी ज्यादा मौके नहीं मिले हैं।
अब तक इस कैडर से आने वाले इकलौते गवर्नर एम. नरसिम्हन थे, जिन्होंने केवल सात महीनों के लिए इस कुर्सी की शोभा बढ़ाई थी। मालिकाना हक और नियामक अधिकारों के ताने-बाने में उलझने की वजह से रिजर्व बैंक और आम बैंकों के रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना एक राजनीतिक कदम था। तब सरकार के पास इतनी ताकत नहीं थी कि वह इन्हें ठीक तरह से चला सके।
इसी वजह से बैंकिंग विभाग या वित्तीय सेवा विभाग में विकास के बावजूद सरकारी बैंकों के प्रबंधन में रिजर्व बैंक का सिक्का चलता रहा। कोई भी नियामक उन इकाइयों पर नियमों की चाबुक नहीं चला सकता, जिनका मालिक वह खुद हो। हमें सार्वजनिक उपक्रमों को सार्वजनिक जिम्मेदारियों से अलग करना ही पड़ेगा। नियामक को खुद कानून बनाने वाली संस्था भी नहीं समझना चाहिए।
उसे खुद को प्राइवेट सेक्टर की भूमिका या विदेशी बैंकों जैसे मुद्दों तक ही समेटकर रखना चाहिए। नए गवर्नर को मालिकाना हक जैसे मुद्दों को वित्त मंत्रालय पर ही छोड़ देना चाहिए। वह वहां बैंकों के मालिकों के हितों की रक्षा करने के लिए नहीं बैठे हैं। उनका काम वहां कायदे-कानूनों को लागू करना है।
दूसरी दिक्कत उन सेवाओं के प्रकार को लेकर है, जो मुहैया कराई जा रही हैं। राष्ट्रीयकरण के दो दौरों की वजह से 80 से 90 बैंक सरकारी आधिपत्य के तहत आ गए हैं। अच्छे बैंकिंग के मुद्दे पर सरकार और रिजर्व बैंक का एक ही पक्का नजरिया है। इसी एक नजरिये को मुल्क में बैंकिंग के विकास के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी वजह से बैंक मैनेजरों के पास दूसरे रास्ते तलाशने के मौके काफी कम हो गए हैं।
नई सोच रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय की भुलभुलैया में कहीं खो सी गई है। इस कोढ़ में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों का काफी छोटा कार्यकाल खाज का काम करता है। इसी वजह से सरकारी बैंकों में अलग हटकर सोचने की कोई जहमत ही नहीं उठाता। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि इससे निकलने का रास्ता नहीं है। मिसाल के तौर पर घरेलू प्राइवेट बैंकों को ही ले लीजिए।
उन्होंने काफी अच्छा काम किया है और उनसे हम काफी हद तक सीख सकते हैं। इन बैंकों को उनके बोर्ड चलाते हैं और उनमें नौकरशाहों की तरह गैर-जिम्मेदारी भी नहीं होती। उनका नेतृत्व काफी आगे की सोच रखने वाले लोग-बाग करते हैं, जिनसे काफी कुछ सीखा जा सकता था। लेकिन इस बारे में कभी सोचा ही नहीं गया।
देसी बैंक अब एक बड़े बदलाव के युग में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें संगठन और भूमंडलीकरण ही असली ताकत होगी। इसमें नियामकों की जरूरत कम से कम होगी और उद्यमशीलता की ज्यादा से ज्यादा। यह उद्यमशीलता मिलेगी नई और अलग सोच वाले प्रमुखों से, जिन्हें काम करने के लिए कम से कम दो-तीन से ज्यादा वक्त मिलना ही चाहिए।
सरकार के लिए हरेक संस्थान में अपने पांव पसारना तो राजनीतिक तौर पर काफी मुश्किल होगा। इसलिए आर्थिक विकास की खातिर वित्त मंत्रालय को सरकारी बैंक के काम-काज से जुड़े मामलों की निगहबानी करने का अधिकार उनके बैंकों को ही देना चाहिए। साथ ही, सरकार को अपना काम उन बैंकों के बोर्ड के गठन तक सीमित कर देना चाहिए।
एक उद्यमशील और बड़ी बैंकिंग व्यवस्था सभी लोगों के लिए अच्छी साबित होगी। खास तौर पर उनके लिए जो निचले तबके से ताल्लुक रखते हैं। पूंजी बाजार में भी ऐसा ही हुआ था, जब सरकार ने वहां से अपने कदम वापस खींच लिए थे। इसके लिए सरकार माइक्रोफाइनैंस संस्थाओं की मिसाल ले सकती है, जिसने पिछले कुछ सालों में अपने कदम तेजी से फैलाए हैं। लेकिन आज भी इसका प्रभाव आज भी सीमित है।
मिसाल के तौर पर ये संस्थान पैसे जमा नहीं कर सकते और न ही पैसे एक अकाउंट से दूसरे में ट्रांसफर कर सकते हैं। फिर भी कम लागत में उन्होंने खुद को अच्छी तरह से पेश किया है। तो क्या सभी बैंकों को भी हमें इसी तरह से चलाना चाहिए? क्या हम ऐसे बैंकों के बारे में नहीं सोच सकते, जो कुछ खास सेवाएं ही मुहैया करवाएं?
ऐसे बैंक जिनके पास 300 करोड़ रुपये से कम पूंजी हो, लेकिन उनके जोखिम उठाने की ताकत पर भी लगाम लगी हो। दूसरी तरफ, हमें जल्द से जल्द बड़ी-बड़ी कंपनियों को भी काफी अच्छी सेवाएं घरेलू स्तर पर ही मुहैया करवानी होगी, जिनकी तलाश में वे विदेशी बैंकों का सहारा लेते हैं। करेंसी में वायदा कारोबार की शुरुआत और ब्याज दरों के वायदा कारोबार को शुरू करने का वादा एक अच्छी पहल है।
साथ ही, हमें देसी बैंकों को उसी तरीके से काम करने का मौका देना चाहिए, जैसा विदेशी बैंकों को मौका मिलता है। एक खुला और वैश्विक स्तर का वित्तीय उद्योग पूरे मुल्क के लिए अच्छा होगा। यह मुल्क के लिए आईटी और बीपीओ के बाद एक बड़ी क्रांति साबित हो सकती है। इस बारे में पर्सी मिस्त्री और रघुराम राजन कमेटी की रिपोर्ट पहले ही रास्ता दिखा चुकी हैं।
अगर आज की तारीख में रिजर्व बैंक के गवर्नर बैंकिंग सेक्टर से ताल्लुक रखने वाले होते तो वह खुले तौर पर नॉर्थ ब्लॉक में इसकी वकालत करते। बेशक, मुल्क के सबसे ताकतवर बैंक के मुखिया होने के नाते उनकी पहली प्राथमिकता विकास दर को चोट पहुंचाए बिना महंगाई को काबू करना ही होनी चाहिए। लेकिन वित्तीय व्यवस्था पर भी उनकी नजर तो होनी ही चाहिए।