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झमाझम मानसूनी बारिश से ही खिलते हैं किसानों के मुरझाए चेहरे

Last Updated- December 07, 2022 | 6:05 AM IST

झांसी के एक गांव में रहने वाले मेहरबान सिंह की खुशी का ठिकाना नहीं है। उन्हें उम्मीद जागी है कि एक बार फिर फसल लहलहाएगी।


बुंदेलखंड इलाके में 5 साल बाद पिछले सोमवार को पूरे दिन झमाझम बारिश हुई। उन्हें उम्मीद है कि बारिश का सिलसिला कुछ दिन तक जारी रहेगा, और पटरी से उतर चुकी बुंदेलखंड की खेती उन्हें खुशहाल कर देगी।

यह खुशी केवल एक आदमी की नहीं है। जब भी पानी नहीं बरसता, न केवल विभिन्न इलाकों में बल्कि वहां रहने वाले किसानों की जिंदगी में सूखा पड़ जाता है। दुनिया में मानसून के अलावा कोई ऐसी जलवायु नहीं है, जिससे हर साल बहुतायत में लोग प्रभावित होते हैं।

भारत उन 20 एशियाई देशों में से एक है, जहां कृषि और उस पर आधारित अर्थव्यवस्था मानसून पर निर्भर है। इसके अलावा चीन, जापान, इंडोनेशिया, उत्तरी और दक्षिणी कोरिया तथा भारत के पड़ोसी देश आते हैं। बहरहाल जापान, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों ने तो औद्योगिक विकास कर लिया है, लेकिन बाकी देशों की अब भी मानसून पर निर्भरता बनी हुई है। इन देशों में धान का उत्पादन मानसून पर ही निर्भर करता है।

हालत यह है कि धान का उत्पादन भिन्न-भिन्न इलाकों में होता है, इसलिए इसका क्षेत्रवार निर्धारण करना भी कठिन है कि किन इलाकों में कितने पानी की जरूरत होती है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से ही मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए कोशिशें शुरू कीं। इसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी लिया, जिससे कम समय और लंबे समय के लिए मानसून की भविष्यवाणी की जा सके। लेकिन आज भी यह नहीं कहा जाता है कि मानसून पर निर्भरता कम हुई है।

भारत में मानसून का सीधा असर कृषि पर तो पड़ता ही है, सकल घरेलू उत्पाद पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का हिस्सा करीब 20 प्रतिशत है, जो उद्योगों को कच्चा माल भी उपलब्ध कराता है। देश की 60 प्रतिशत जनसंख्या कृषि पर निर्भर है, जो उद्योगों के उत्पादों के लिए बहुत बड़ा उपभोक्ता है। इस तरह से विनिर्मित वस्तुओं का बाजार भी ग्रामीण बाजार से जुड़ा हुआ है।

अगर खेती की हालत अच्छी नहीं रहती है, तो स्वाभाविक है कि ग्रामीण इलाकों में मांग कम हो जाती है और परोक्ष रूप से इसका प्रभाव उद्योगों पर पड़ता है। किसानों ने इस समय देश भर में विकसित हो रहे विशेष आर्थिक क्षेत्रों का जोरदार विरोध करना शुरू कर दिया है। महज चार दिन पहले गोवा में रिलायंस के प्रस्तावित सेज के विरोध में किसानों ने गोवा-मुंबई हाईवे जाम कर दिया। किसानों का कहना है कि सरकार उनकी बात नहीं सुनती।

सिंचित क्षेत्र में सेज बनाया जा रहा है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। किसानों का आरोप है कि उन्हें केवल राजनेताओं से आश्वासन मिलता है, जबकि अंतिम रूप से सरकार उद्योगपतियों की ही बात सुनती है। ऐसा ही कुछ पश्चिम बंगाल के सिंगूर इलाके में हुआ। देश में अभी भी सिंचित कृषि भूमि एक तिहाई ही है। ऐसे में सिंचित भूमि पर सेज का विकास कहां से जायज है?

11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-11) के लिए कृषि प्रसार पर बने कार्य समूह का मानना है कि 60 प्रतिशत किसान कृषि के लिए विकसित नई तकनीकों से वाकिफ नहीं हैं। समिति का कहना है कि कृषि के विस्तार के लिए सूचना का प्रसार किसानों तक करना बेहद जरूरी है। उसका कहना है कि कृषि उत्पाद को 2010 तक 247.8 टन और 2020 तक 296.6 टन तक बढ़ाए जाने की जरूरत है जो 2004-05 के आंकड़ों के मुताबिक 206.39 टन है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 10 प्रतिशत बरकरार रखने के लिए जरूरी है कि कृषि क्षेत्र की विकास दर वर्तमान के 1.7 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर 4.1 प्रतिशत करनी होगी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पंजाब सिंह की अध्यक्षता में बनी योजना आयोग की समिति की 8 जून 2006 की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह असंभव सा लगता है, लेकिन सही है कि दुर्भाग्य से देश में कोई नेशनल एग्रीकल्चल एक्स्टेंशन सिस्टम नहीं बना।

रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश  की गई है कि देश में दूसरे देशों की कृषि योजनाओं की नकल के बजाय अपनी जरूरतों के मुताबिक योजना बनाए जाने की जरूरत है, जिससे क्षेत्रवार कृषि के विकास और उनकी जरूरतों को पूरा किया जा सके। रिपोर्ट में इस तरफ भी ध्यान दिलाया गया है कि जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, उसी के मुताबिक अनाज की जरूरतें भी बढ़ेंगी।

घरेलू मांगों को पूरा करने के लिए 1949-50 से 1089-90 के बीच रहे अनाजों के उत्पाद की वृध्दि दर को बढाकर 3.5 से 4 प्रतिशत करना होगा। बहरहाल जमीनी हकीकत यह है कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। एक गैर सरकारी संगठन विदर्भ जन आंदोलन समिति के अध्यक्ष किशोर तिवारी ने कहा कि पिछले एक हफ्ते में कर्ज से दबे विदर्भ के छह किसानों ने आत्महत्या कर ली।

कृषि के विकास और मानसून पर निर्भरता कम होने के दावों के बीच किसानों पर मानसून की हल्की सी मार भी उन्हें कर्ज के जाल में फंसा देती है। प्रकृति के सामने सभी शोध और आंकड़े कागजी ही साबित होते हैं। किसी शायर ने सच ही कहा है और यह भारत के किसानों पर सटीक बैठता है:

हस्ती अपनी हबाब (बुलबुला) की-सी है,
ये नुमाइश सराब (रेगिस्तान) की- सी है।

First Published - June 18, 2008 | 10:54 PM IST

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