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मंदी और निराशा के बीच मौजूद हैं उम्मीद की किरणें

Last Updated- December 07, 2022 | 2:46 PM IST

महंगाई दर बढ़ रही है। रिजर्व बैंक इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठा रहा है। ब्याज दरें बढ़ाई जा रही हैं और कंपनियों के मुनाफे के परिणामों ने निराशा देना शुरू कर दिया है।


इस सबके बावजूद, मुझे वित्तीय बाजार के रुख में बदलाव नजर आ रहा है। उदासी की जगह अब आशावाद के साथ सावधानी ने ले ली है। उदाहरण के लिए, परिसंपत्ति बाजार में मंदी है और तमाम बुरी खबरें आ रही हैं।

इसके बावजूद इस समय वे नई रणनीति अपना रहे हैं- पिछले इतिहास और वर्तमान को देखें और भविष्य की कीमतों पर गौर करें। वर्तमान में जो आंकड़े और खबरें आ रही हैं, उससे यही लगता है कि भविष्य में संकट नहीं है। मानसिकता में आए इस बदलाव की कई वजहें हैं। तेल और जिंस के दामों में तेजी से गिरावट आ रही है, जिससे थोड़ी उम्मीद जगी है।

यह जानना दिलचस्प हो सकता है कि इन आंकड़ों से क्या बदलाव आए हैं। बाजार में इस समय मंदी की मानसिकता है। 2008 की पहली छमाही में वैश्विक मंदी का रुख रहा तथा महंगाई दर कम होने की बजाय वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी और महंगाई दर में बढ़ोतरी का रुझान बना रहा। सबसे बड़ी समस्या यह रही कि इस बात को लेकर भ्रम बना रहा कि मंदी बड़ी समस्या है या बढ़ती महंगाई दर। दोनों का असर यह हुआ कि खतरे की संभावना बढ़ती गई और बाजार में मंदी बनी रही।

जिंसों की कीमतें कम नहीं होने से मदद नहीं मिल रही है, इसे लेकर भी भ्रम की स्थिति है। अगर चालू व्यापार चक्र पिछले दिनों की ओर वापस जाता है तो वृहत आर्थिक प्रबंधन का लक्ष्य परिभाषित करना ज्यादा आसान हो जाएगा। महंगाई पर काबू पाने और विकास को बढावा देने के लक्ष्यों के बीच उपजे विरोधाभास में अब सरकारें और केंद्रीय बैंक अब खासतौर पर मंदी से निपटने की ओर रुख कर सकते हैं। इससे बाजार में स्पष्टता आएगी।

लब्बोलुआब यह है कि वित्तीय बाजारों में व्यापार चक्र में अचानक बदलाव नहीं आ सकता। इस समय जो कदम उठाए जा रहे हैं, उसे देखते हुए बाजार के विश्लेषक इसी निष्कर्ष पर पहुंच रहे हैं कि अगली कुछ तिमाही मे विकास में गिरावट आएगी। इस बात से उम्मीद की किरण नजर आती है कि अगर जिंस बाजार में महंगाई पर लगाम लगती है तो मैक्रो इकनॉमिक नीतियों में बदलाव आ सकता है और नीतियां, मंदी को कम करने की दिशा में जा सकती हैं।

आइये अब भारत की स्थिति की ओर गौर करते हैं। अगर जिंसों की कीमतें वैश्विक स्तर पर स्थिर होती हैं तो इसका स्तर घरेलू महंगाई दर पर पड़ेगा, जो इस समय प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। अगर साल दर साल की दर से महंगाई दर देखी जाए तो यह बढ़ती हुई नजर आएगी, लेकिन मासिक आधार पर कीमतों में गिरावट नजर आएगी। इस तरह से अक्टूबर तक महंगाई दर बढ़कर 12 से 13 प्रतिशत के उच्च स्तर पर पहुंच जाए तो उसके बाद इसमें कमी आनी शुरू हो जाएगी।

रिजर्व बैंक के हाल के फैसलों से बैंकों को दरें बढ़ानी पड़ी हैं। इसका असर कर्ज लेने और विकास पर पड़ेगा और मेरे विचार से 2008 की अंतिम तिमाही तक विभिन्न गतिविधियों में शिथिलता स्पष्ट रूप से नजर आने लगेगी। इस बोझ से कंपनी का लाभ कम हो जाएगा। अगर ऐसी हालत होती है तो रिजर्व बैंक क्या कदम उठाएगा? हाल ही में जारी मौद्रिक नीति से दो संकेत मिलते हैं। आइए, मौद्रिक नीति के कुछ वाक्यों पर गौर करते हैं। मौद्रिक नीति के एक हिस्से में कहा गया है, ‘मांग में कमी आने की वजह से जिंसों की कीमतों में गिरावट आ सकती है।

बहरहाल महंगाई दर का दबाव बना रहेगा। यह कहना मुश्किल है कि ऐसी स्थिति कब तक रहेगी।’ मौद्रिक नीति में आगे कहा गया है, ‘मांग को बनाए रखना भी जरूरी है, ऐसे में जरूरी है कि वर्तमान हालात को देखते हुए आपूर्ति क्षमता और उत्पादन तथा कार्यक्षमता में विस्तार किया जाए, जिससे इस समस्या का दूरगामी हल निकाला जा सके।’ केंद्रीय बैंक के यह कहने का क्या मतलब है? मेरा यह मानना है कि अगर जिंसों की कीमतों में वर्तमान रुख जारी रहता है और मौद्रिक नीतियों में कड़ाई की वजह से बाजार में निवेश की मात्रा में कमी आती है तो भारतीय रिजर्व बैंक मौद्रिक नीतियों को पलट सकता है।

पहले तो वह उदासीन होगा और दरों को बढ़ाने पर रोक लगाएगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि विकास की दर पर कितना असर पडेग़ा। उसके बाद ब्याज दरों में चक्रीय परिवर्तन आएगा। यह संभव है कि इस साल के अंत में या अगले साल की शुरुआत तक रिजर्व बैंक, ब्याज दरों में कमी और आरक्षित अनुपात को कम करना शुरू कर दे। मेरा अनुमान यह है कि वित्तीय बाजार, खासकर बॉन्ड बाजार में इस संभावना के चलते आशा का वातावरण बनेगा। स्टॉक बाजार इससे ज्यादा प्रभावित हो सकता है, लेकिन अगर एक बार यह माहौल बन जाए कि इस समय ब्याज दरें चरम पर हैं तो डर कम होगा और लालच प्रभावी हो जाएगा।

बाजारों की फिर से वापसी के पीछे एक और कारण हो सकता है। वह है कि पिछले साल की तुलना में यूरो और पाउंड जैसी मुद्राओं की तुलना में डॉलर मजबूत हो रहा है। मेरी समझ से अमेरिकी मुद्रा वैश्विक स्तर पर असरकारी होती है। उभरते हुए बाजारों की इक्विटी और डेट पर लड़खड़ाता हुआ डॉलर ज्यादा प्रभाव डालता है। इसमें भारत का इक्विटी और डेट भी शामिल है। डॉलर मजबूत रहता है तो विश्व की विकास दर बेहतरीन रहती है। इस समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है। इससे निवेशकों का विश्वास बढ़ रहा है।

हालांकि यह संपूर्ण खतरों को देखते हुए बहुत ही मामूली होगा। अमेरिकी वित्तीय प्रणाली अभी भी खतरों से बाहर नहीं है। अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली अभी और भी हिचकोले खा सकता है और निवेशकों को जिंसों के भंडारण की ओर भेज सकता है। भारत में बढ़ती स्थानीय मांगों के चलते खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं और रिजर्व बैंक ऐसे में आसानी से ढील नहीं दे सकता। बहरहाल खतरों और खुशियों के बीच संतुलन को देखते हुए परिसंपत्ति बाजार में कुछ उम्मीद की किरणें जरूर हैं।

First Published - August 4, 2008 | 12:50 AM IST

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