प्रोविडेंट फंड बोर्ड ने प्रोविडेंट फंड योजनाओं के तहत आने वाले श्रमिकों की तादाद में भारी इजाफा करने की सिफारिश की है।
बोर्ड ने सिफारिश की है कि अब 10 श्रमिकों वाले सभी संस्थान और 20 कर्मचारियों वाले कोऑपरेटिव को प्रोविडेंट फंड के दायरे में लाया जाए। इससे प्रोविडेंट फंड के दायरे में आने वाले लोगों की तादाद दोगुनी होकर आठ करोड़ हो जाएगी। इस कदम की सचमुच तारीफ करनी चाहिए क्योंकि इससे सामाजिक सुरक्षा को उन हिस्सों को पहुंचने में मदद मिलेगी, जो अब तक दायरे से बाहर रहे हैं।
हालांकि इसके साथ-साथ कुछ और बड़े कदमों की जरूरत थी, जिनकी पीएफ बोर्ड ने सिफारिश नहीं की। इन कदमों को सरकार को खुद उठाना चाहिए। मिसाल के तौर पर पीएफ संस्थान को अपने आदम के जमाने के रूप को छोड़कर एक आधुनिक और सेवाओं पर आधारित संस्था के गुण अपनाने चाहिए। जब इसकी वार्षिक रिपोर्ट ही एक या दो साल की देरी से आती हैं, तो आप ऐसी संस्थाओं से क्या उम्मीद कर सकते हैं। इसकी हालिया रिपोर्ट मार्च, 2006 की थी। इसके खातेदारों के पास न तो पास-बुक है और न ही उनका कोई इंटरनेट डेटाबेस है, जिस तक खाता धारक बस एक पासवर्ड के जरिये पहुंच सकते हैं।
इस संस्थान ने अपने खातेदारों को एक ऐसा अदद फोन नंबर भी नहीं दे रखा है, जहां फोन करके लोग-बाद अपनी शंका को मिटा सकते हैं। यहां आज भी अपने ही पैसों को निकालने के लिए लोगों को तरह-तरह के पापड़ बेलने पड़ते हैं। एक वाक्य में कहें तो पीएफ संस्था को खुद को बदलने की जबरदस्त जरूरत है। बदलावों की सिफारिश का जो दूसरा सेट आने वाला है, उसमें एक प्रतिस्पर्ध्दी माहौल की सिफारिश जरूर की जाए। इससे इस मामले में सरकारी एकाधिकार का खात्मा होना ही चाहिए, जिसकी वजह से सेवा का स्तर इतना घटिया है।
जो भी प्रोविडेंट फंड में निवेश करना चाहें, उन्हें अपने फंड को चुनने की आजादी दी जानी चाहिए। इस काम में उनकी मदद करेंगे फंड मैनेजर और असेट मैनेजमेंट कंपनियों, जिनकी अपने मुल्क में कोई कमी नहीं है। साथ ही, इनमें सरकारी पीएफ संस्था के मुकाबले ज्यादा अक्ल तो है ही है। प्रतिस्पध्र्दा की वजह से खर्च में भी कमी आएगी। ऊपर से रेगुलेटर की मौजूदगी और निवेश नियमों की वजह से एक प्रतिस्पर्ध्दी माहौल का आगमान होगा। इन निवेश नियमों में खास तौर पर लोगों की पूंजी की सुरक्षा का ख्याल रखा जाएगा। वैसे, एक और बदलाव की जरूर है और शायद इन सभी से ज्यादा जरूरत है।
वह बदलाव यह है कि पीएफ की ब्याज दरों को निर्धारित करने की जिम्मेदारी ट्रेड यूनियनों और राजनेताओं की जगह पर बाजार पर छोड़ दी जाए। टे्रड यूनियन और राजनेता आमतौर सामान्य वित्त नियमों को अनदेखा करके ब्याज दरों को तय करते हैं। आज यह मांग की जा रही है कि पीएफ की ब्याज दर को 8.5 फीसदी से बढ़ाकर 12 फीसदी तक कर दिया जाए, ताकि वह महंगाई की दर के बराबर हो सके। हालांकि, ये वही लोग हैं कि जो जब महंगाई की दर केवल 4.5 फीसदी थी, ब्याज दर को कम करने की मांग का विरोध कर रहे थे।