facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता

Last Updated- December 07, 2022 | 3:43 AM IST

निर्णय क्यों लिया गया


भारत कुल तेल की खपत का 70 फीसदी विदेशों से आयात करता है। आंकडों पर गौर करें, तो 2007-08 में 12.167 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया गया।

इसके लिए सरकार ने सब्सिडी के तौर पर 8.7 अरब डॉलर चुकाए थे। जो कि सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 फीसदी था। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस वर्ष यह सब्सिडी सकल घरेलू उत्पाद के 2.2 फीसदी के बराबर हो जाएगी।

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग और केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोलियम पदार्थो में दी जा रही भारी सब्सिडी से कंगाल होने को आई पेट्रोलियम कंपनियों को बचाने के लिए कीमतों में बढोतरी ही एकमात्र रास्ता बचा था। इंडियन ऑयल लिमिटेड के उच्च अधिकारी ने बताया कि सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम तेल कंपनियों के हित को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है।

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि तेल की कीमतें अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। सरकार द्वारा दी जा रहीं तेल सब्सिडी और इसी तरह के अन्य उपादानों के कारण खुदरा वस्तुओं के दाम में काफी उछाल आ गया। जो निश्चित तौर आम आदमी के लिए परेशानी का सबब बन गया। आम आदमी के बीच में अपनी पैठ बनाने और अपनी साख को बचाए रखने के लिए सरकार द्वारा मंहगाई को नियंत्रित करने का कदम उठाया जाना जरूरी हो गया।

पेट्रोलियम कीमतों में बढोतरी होने से पेट्रोलियम कंपनियों को जहां एक तरफ थोड़ा सुकून मिला है। वहीं केन्द्र की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई है। इस बाबत फेडरेशन ऑफ आल इंडिया पेट्रोलियम ट्रेडर्स के अतुल पेशवरिया ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा पेट्रोल की कीमतों में बढोतरी के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था।

धर्मसंकट से बचने के उपाय

केन्द्र सरकार के सामने एक तरफ कुआं और एक तरफ खाई वाली स्थिति उत्पन्न हो गई थी। अगर सरकार पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों में किसी तरह की बढ़ोतरी नहीं करती, तो कच्चे तेल के बढ़ते आयात और पेट्रोलियम कंपनियों के नुकसान के चलते अर्थव्यवस्था की रीढ़ का टूटना तय था। इससे भारी व्यापार घाटा हो रहा है।

पिछले चार साल से यूपीए सरकार द्वारा चलाई जा रही महंगाई रोकने की कवायद वास्तविकता में सरकार का चुनावी एंजेडा थी। यूपीए को विश्वास था कि इसका पत्ता खेलकर अगले लोकसभा चुनावों में बाजी मारी जा सकती है। लेकिन केन्द्र सरकार का यह दांव उल्टा पड़ गया। वह मंहगाई रोकने में नकामायाब रहीं। यहीं नहीं यूपीए के घटक भी पेट्रोल कीमतें बढ़ाने के खिलाफ पहले से ही विरोध का सुर अलाप रहे हैं।

निर्णय नहीं लेते तो क्या होता?

केन्द्र सरकार द्वारा अगर पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतें बढ़ाने का निर्णय नहीं लिया जाता तो भारी राजस्व घाटा होना तय था। इस बाबत अतुल पेशवरिया का कहना है कि अगर सरकार पेट्रोलियम कीमतों को बढ़ाए बिना इसका कोई विकल्प ढूढ़ने की कोशिश करती तो सरकार को राजस्व प्राप्ति में भारी घाटा उठाना पड़ता, क्योंकि सरकार इसके लिए उत्पाद शुल्क व अन्य टैरिफों में कटौती करती।

इसका सीधा प्रभाव विकास दर पर पड़ता, क्योंकि सरकार के पास विकास परियोजनाओं में व्यय करने के लिए उचित मात्रा में राजस्व नहीं रहता। अगर राजस्व घाटे की बात की जाए तो वित्त वर्ष 2007-08 में यह 82550 करोड़ रुपये रहा।

सरकार द्वारा तेल की कीमतों में होने वाली इस बढोतरी से राजस्व घाटे में 22,800 करोड़ रुपये की बढोतरी हो जाएगी। यही नहीं सरकार ने अपने कार्यकाल के चार वर्षो के दौरान दानवीर कर्ण की तरह सब्सिडी देने में भी बिल्कुल हिचक महसूस नहीं की। वित्त वर्ष 2007-08 में ही सब्सिडी के तौर पर 51247 करोड़ रु पये दिये गए।

व्यापार शेष असंतुलन

भारतीय तेल की बास्केट 125 डॉलर होने के बाद बढ़ते आयात व्यय को रोकने के लिए पेट्रोल कीमतों में बढोत्तरी करना जरूरी हो गया था। आकड़ों पर गौर करें तो यूपीए सरकार ने पिछले चार सालों में पेट्रोलियम पदार्थो के दामों में 11 बार फेरबदल किया।

इस अवधि में कीमतों में आठ बार वृद्धि और तीन दफा कमी की गई। इसके बावजूद पेट्रोलियम पदार्थो के आयात व्यय में वृद्धि होती गई। आयात व्यय में होती वृद्धि ने भारी व्यापार घाटे को जन्म दिया। आयात व्यय में कच्चे तेल,पेट्रोलियम और उत्पाद क्षेत्र की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2006-07 के 15 फीसदी से बढ़कर वित्त वर्ष 2007-08 की पहली छमाही में बढ़कर 18 फीसदी हो गई।

व्यापार शेष वित्त वर्ष 2006-07 के 63171 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 2007-08 की पहली छमाही में ही 42401 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया। तेल की कीमतों में हो रही बढोतरी का सीधा असर देश के प्राथमिक बाजार में पड़ रहा था। मुद्रास्फीति की ऊंची दरों के पीछे तेल की कीमतों का न बढ़ना भी प्रमुख कारण रहा। मुद्रास्फीति नियंत्रित करने के लिए जो उपाय अपनाए वे उतने सशक्त नहीं थे जो बढ़ती महंगाई को रोक सकें।

कौन बचाएगा

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि  जटिल होती अर्थव्यवस्था में केन्द्र सरकार के लिए कोई सुग्रीव बन सकता है तो वह केवल मानसून है और कोई नहीं क्योकि खाद्यानों के दामों में आई वृद्धि को उत्पादन बढ़ा के रोका जा सकता है। सरकार को भी भरोसा है कि मानसून के बाद बिना ब्रेक के भागती मंहगाई एक्सप्रेस को रोका जा सकेगा।

रसोई गैस की कीमत (रुपये में)

                                पहले                  अब
दिल्ली                      294.75             344.75 
कोलकाता                300.50             350.50 
मुंबई                       298.00             348.00   
चेन्नई                     288.10              338.10
     

डीजल की कीमत (रुपये में)

                                पहले                  अब          
दिल्ली                     31.80                  34.80          
कोलकाता               33.96                  37.17            
मुंबई                       36.12                 39.54          
चेन्नई                    34.44                  37.73

पेट्रोल की कीमत (रुपये में)

                       पहले                अब           
दिल्ली             45.56             50.56           
कोलकाता       48.98             54.29         
मुंबई              50.54             55.88           
चेन्नई           49.64              55.07
   

First Published - June 5, 2008 | 1:47 AM IST

संबंधित पोस्ट