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यह है 3जी की भूलभुलैया से भरी हमारी दुनिया

Last Updated- December 07, 2022 | 2:46 PM IST

पिछले हफ्ते सरकार ने 3जी स्पेक्ट्रम पॉलिसी की घोषणा की। वामपंथी दलों के चंगुल से हाल ही में मुक्त हुई सरकार ने इसकी मार्केटिंग सुधार के एक बड़े कदम के रूप में की।


लेकिन हकीकत तो यही है कि यह नीति घटिया और पुरानी पड़ चुकी नीतियों का पुलिंदा है, जिससे प्रतिस्पध्र्दा को कतई बढ़ावा नहीं मिलेगा। ऊपर से, इस नीति में सुधार के नाम पर सुधार की राह में कई रोड़े हैं, जिनकी वजह से आगे बढ़ना काफी मुश्किल होगा।

इस नीति में कई ऐसी उलझनों को पैदा करने वाले नियम भी हैं, जिनकी वजह से टेलीकॉम कंपनियों को बार-बार पलट कर सरकार के पास स्पष्टीकरण और छूट मांगने के लिए आना पड़ेगा। दूरसंचार मंत्री ए. राजा के कदमों को देखें तो साफ लगता है कि कैसे मंत्री जी ने अपनी पसंदीदा कंपनियों को कम कीमतों पर 2जी स्पेक्ट्रम दिलाने के लिए इस नीति के साथ खेल खेला। इसी वजह से लोगों के बीच यह धारणा बनी है।

सरकार ने इस नीति के तहत फैसला किया है कि नए खिलाड़ियों को इंट्री फीस के लिए 1,651 करोड़ रुपये की रकम भी चुकानी पड़ेगी। इसके साथ-साथ उन्हें 3जी स्पेक्ट्रम की खातिर जो बोली लगाई है, वह भी चुकानी पड़ेगी। यह सीधे-सीधे प्रतिस्पध्र्दा को चोट पहुंचाने वाला कदम है। नए खिलाड़ियों को पुरानों से कड़ी टक्कर लेनी पड़ेगी क्योंकि पुरानी कंपनियां बाजार के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुकी होती हैं। लोगों को अपनी तरफ खींचने के लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।

ऊपर से उन्हें सरकार को एक मोटी रकम भी चुकानी पड़ेगी। मजे की बात यह है कि छह महीने पहले 2 जी स्पेक्ट्रम के आवंटन के वक्त यह कहा था कि खुद ए. राजा ने ही इस नीति के खिलाफ कहा था। 2001 में 2जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में पूरे भारत के लिए लाइसेंस के वास्ते कंपनियों को 1,651 करोड़ रुपये की रकम चुकानी पड़ी थी। यह कीमत तब की है, जब पूरे मुल्क में केवल 40 लाख लोगों के पास सेलफोन था। आज की तारीख में तो एक महीने में मुल्क में 80 लाख लोग मोबाइल फोन की दुनिया से जुड़ते हैं। इस हकीकत के बावजूद राजा ने कीमत में इजाफा करने से साफ इनकार कर दिया था।

उन्होंने इसके लिए दूरसंचार के इस दिखावटी तर्क का सहारा लिया कि अगर 2008 में सरकार नए खिलाड़ियों से 2001 में कंपनियों द्वारा चुकाई गई रकम से ज्यादा पैसे लेती है तो उनके लिए हालात सामान्य नहीं रहेंगे। अब वही नए खिलाड़ियों के बराबरी के हक की कब्र खोद रहे हैं। पिछली बार राजा ने रिलायंस कम्युनिकेशन को दूसरों से कई महीने पहले ही 2जी स्पेक्ट्रम का लाइसेंस दे दिया था। वह भी तब, जब कंपनी ने इस बारे में कोई आवेदन ही नहीं दिया था। इस बारे में काफी हंगामा हुआ था। इसीलिए तो इस बार नियम में इसके लिए एक खास प्रावधान जोड़ दिया गया है।

पहले कहा गया कि सीडीएमए मोबाइल सेवा प्रदाताओं (जैसे टाटा और रिलायंस कम्युनिकेशन) के लिए स्पेक्ट्रम के लिए अलग से बैंड दी जाएगी, लेकिन बाद में नियमों में कई बदलाव किए गए। नए नियमों के मुताबिक ये कंपनियां सरकार से सीधे स्पेक्ट्रम देने के लिए कह सकती हैं। इसकी कीमत इस आधार पर तय की जाएगी कि जीएसएम कंपनियों ने 3जी स्पेक्ट्रम के लिए कितनी कीमत चुकाई है। वैसे तो यह अच्छी बात है, लेकिन इसमें वरिष्ठता ग्राहकों की तादाद के आधार पर तय की जाएगी। इसका मतलब यह है कि रिलायंस कम्युनिकेशंस के पास सबसे ज्यादा ग्राहक हैं, तो उसे ही स्पेक्ट्रम पहले मिलेगा।

इससे भी अनोखी बात यह है कि सरकार बोलियां ऐसे हालात में मंगवा रही है, जबकि उसके पास स्पेक्ट्रम भी नहीं हैं। पॉलिसी के मुताबिक पांच से 10 स्लॉट्स बिक्री के लिए रखे गए हैं, वो भी अलग-अलग सर्किल में उपलब्धता के आधार पर। केवल पांच से 10? जाहिर सी बात है, जब केवल पांच स्लॉट होंगे तो उनके लिए ज्यादा बड़ी बोलियां आएंगी। तो आखिर असल स्लॉट कितने होंगे? नीति के मुताबिक निश्चित तादाद का ऐलान बोली से काफी पहले ही हो जाएगा, लेकिन स्पेक्ट्रम के आंवटन में सरकार के रिकॉर्ड को देखकर इस बारे में किसी को भरोसा नहीं होने वाला है।

वोडाफोन, आइडिया और एयरटेल ने तो स्पेक्ट्रम के लिए दिसंबर, 2006 में ही पैसे चुका दिए थे, लेकिन उन्हें ये स्पेक्ट्रम इसी साल यानी 2008 में ही मिले। वह भी उस कीमत के एक तिहाई में, जो इस साल जनवरी में दूसरी कंपनियों ने इसी स्पेक्ट्रम की खातिर चुकाई थी। 2001 में जब रिलायंस के गैरकानूनी मोबाइल सेवा को कानूनी जामा पहना दिया गया था, तब दूरसंचार नियमाक ने कहा था कि सबके लिए मुल्क में भरपूर स्पेक्ट्रम है।

कुछ ही साल उसने सिफारिश की कि 3जी स्पेक्ट्रम को मुफ्त में टेलीकॉम कंपनियों को देना चाहिए क्योंकि मुल्क में 2जी स्पेक्ट्रम की भारी किल्लत है। जाहिर है कि 3जी स्पेक्ट्रम के मुद्दे पर कई सालों से खींचतान चल रही थी। ऐसी हालत में सरकार को काफी पहले ही स्पेक्ट्रम को खाली करवा लेना चाहिए था। इस बारे में अब भी तस्वीर साफ नहीं है कि 3जी स्पेक्ट्रम के कितने स्लॉट मौजूद रहेंगे। हालांकि, एक बात तो तय है कि एक स्लॉट एमटीएनएल बीएसएनएल के वास्ते रहेगा। हो सकता है कि उन्हें यह स्पेक्ट्रम मिल भी चुका हो।

एक तरफ तो यह नए खिलाड़ियों के साथ भेदभाव होगा। दूसरी तरफ, यह भी तय कर दिया गया है कि सरकारी टेलीकॉम कंपनियों को इस स्पेक्ट्रम के खातिर सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले के बराबर ही बोली चुकानी पड़ेगी। अधिग्रहण और विलय के बारे में भी सरकारी नीति काफी उलझनों से भरी है। पिछले हफ्ते जो 3जी गाइडलाइंस जारी हुई है, उसके मुताबिक इस बारे में नीति अप्रैल, 2008 के दिशानिर्देशों के हिसाब से ही रहेगी। तो अप्रैल के दिशानिर्देश क्या कहते हैं? उसके मुताबिक 2जी स्पेक्ट्रम में उतरने वाले नए खिलाड़ी तीन साल तक विलय नहीं कर सकते।

हालांकि, उन्हें ऐसी कंपनी खरीद सकती है, जिसका भारत में कारोबार न हो। इसका मतलब डयूश टेलीकॉम या एनटीटी मुल्क में आकर 3जी स्पेक्ट्रम तो हासिल कर सकती है, लेकिन इसके साथ उन्हें 1,651 करोड़ रुपये चुकाने पड़ेंगे। इससे उन्हें 3जी और 2जी का लाइसेंस तो मिल जाएगा, लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम नहीं मिल पाएगा। मुल्क में नेटवर्क को फैलाने के लिए डयूश और एनटीटी को 2जी नेटवर्क की जरूरत तो पड़ेगी ही। इसका मतलब उन्हें 2जी की दुनिया के किसी नए खिलाड़ी का अधिग्रहण या उसके साथ विलय करना पड़ेगा। लेकिन अप्रैल, 2008 के गाइडलाइंस के मुताबिक वह किसी कंपनी के साथ विलय नहीं कर सकते, जबकि 2जी लाइसेंस हासिल होने के नाते वे मुल्क पहले से ही सेवाएं दे रहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि इस पूरे मामले को सुलझाना है तो आपको राजा के द्वार को खटखटाना पड़ेगा।

First Published - August 4, 2008 | 12:54 AM IST

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