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ये है रेडियो मिर्ची की दिलचस्प कहानी

Last Updated- December 07, 2022 | 3:02 AM IST

वह बड़ा ही अजीब पल था, यह कहते हुए एंटरटेनमेंट नेटवर्क इंडिया लिमिटेड (ईएनआईएल) के प्रबंध निदेशक ए. पी. पारिगी पुरानी यादों में खो जाते हैं।


बात 2001 की है जब टाइम्स ग्रुप की रेडियो कंपनी ईएनआईएल ने अपना पहला स्टेशन इंदौर में लॉन्च किया था। पारिगी बताते हैं, ‘लॉन्च के अवसर पर रेडियो मिर्ची ब्रांड नाम के लिए सीईओ के तौर पर लोग मुझे बधाई दे रहे थे।

मैं परेशानी भी महसूस कर रहा था क्योंकि यह ब्रांड नाम टाइम्स समूह के प्रबंध निदेशक विनीत जैन ने दिया था। मजे की बात यह कि हम लोगों ने इस पर कड़ा ऐतराज किया था।’ पारिगी को ईएनआईएल और बेनेट, कोलमैन ऐंड कंपनी के बोर्ड में बड़ी भूमिका दी गई है। वह समूह के लिए महत्त्वपूर्ण निवेश का भी प्रबंधन करते हैं।

पारिगी यह स्वीकार करते हैं कि रेडियो टीम में कोई भी ब्रांडिंग के बारे में आश्वस्त नहीं था। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इंदौर में यह नाम एकदम लोकप्रिय हो गया। रेडियो मिर्ची निजी एफएम रेडियो श्रेणी में शुरुआती लाभ उठाने में भी सफल रहा। ईएनआईएल ने पिछले पखवाड़े  2007-08 के अपने वित्तीय परिणामों की घोषणा की। ईएनआईएल की एक इकाई रेडियो मिर्ची ने 229 करोड़ रुपये के राजस्व पर 57 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया।

प्रतिस्पर्धी ब्रांड-रेडियो सिटी की मुख्य कार्यकारी अपूर्वा पुरोहित इससे ज्यादा प्रभावित नहीं हैं। वह कहती हैं, ‘यह निर्भर करता है कि आप लाभ को किस तरह से परिभाषित करते हैं।’ उन्होंने कहा कि एफएम नेटवर्क ने इस वर्ष नए बाजारों में प्रवेश किया है। इन बाजारों में लाभ की स्थिति हासिल करने में दो से तीन साल लग सकते हैं।

फरवरी 2006 में शेयर बाजार में सूचीबद्ध ईएनआईएल के वित्तीय प्रदर्शन की सराहना करने वाले लोगों की सूची काफी लंबी है। छह रेडियो स्टेशन संचालित करने वाली मिड-डे मल्टीमीडिया के मुख्य वित्तीय अधिकारी एम घोषाल कहते हैं, ‘तकरीबन सभी अन्य स्टेशन अभी भी पैसे गंवा रहे हैं।’ निजी रेडियो बाजार का मुनाफा बढ़ कर 48 फीसदी तक हो गया है जिसमें रेडियो मिर्ची के 32 स्टेशन मुख्य रूप से शामिल हैं।

रेडियो कंसल्टेंट सुनील कुमार कहते हैं, ‘कंपनी ने एक जन माध्यम तैयार किया है जिसकी दूसरों ने नकल की। इसने अपने स्टेशनों के कार्यक्रमों का स्थानीयकरण किया और उन्हें स्तर का बनाया। अंतत: कंपनी अपनी बेहतरीन प्रतिभाओं को बनाए रखने में सफल रही है।’

जब पारिगी सीईओ थे तो उन्होंने बगैर किसी मीडिया अनुभव के एग्जीक्यूटिव्स की एक टीम बनाने का फैसला किया। उन्होंने खुद 2000 में बीपीएल के मोबाइल फोन ब्रांड को विकसित कर रेडियो मिर्ची में आए। मौजूदा सीईओ प्रशांत पांडे सौन्दर्य प्रसाधन निर्माता रेवलॉन से जुड़े रहे हैं। पांडे कहते हैं, ‘हम घिसेपिटे ज्ञान वाले लोगों को पसंद नहीं करते क्योंकि हम नई अवधारणा चाहते हैं।’

कार्यालयों को चटकीले लाल और हरे रंग के इस्तेमाल के साथ इस तरह सजाया गया है जहां कैम्पस की सी अनुभूति हो। पांडे कहते हैं, ‘हम मौज मस्ती के माहौल को बढ़ावा देते हैं। कार्यालय में शोरगुल और जोश अधिक होता है। हम इसे बरकरार रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं।’ रेडियो मिर्ची भले ही ‘हॉट’ लगता है लेकिन लोगों के प्रति इसका रुख ‘शांत’ है।

उसने इंटरव्यू के लिए बुलाए गए तकरीबन 100 लोगों के लिए पार्टी आयोजित की हालांकि रेडियो जॉकी के रूप में उनका चयन नहीं हुआ। चुने गए लोगों को सख्त ट्रेनिंग दी जाती  है। 2007 में जब 22 स्टेशन शुरू किए गए तो मिर्ची ने एमआईसीए में प्रशिक्षण अकादमी खोली जो कि मुद्रा का एडवरटाइजिंग इंस्टीटयूट है। जॉब रोटेशन, प्रमोशन और ट्रेनिंग के साथ कंपनी अपनी बेहतरीन प्रतिभाओं को अपने यहां रोकने में सफल रही है।

जब हाल में दो क्रिएटिव हेड आपस में भिड़ गए थे, तो उन्हें समस्या के समाधान के लिए एक दिन के लिए कमरे में बंद कर दिया गया था। शीर्ष 120 अधिकारियों में से महज चार या पांच ने ही कंपनी को अलविदा कहा है। पांडे बताते हैं, ‘कंपनी में नौकरी छोड़ने वाले कर्मचारियों की दर मात्र 10 प्रतिशत है जबकि उद्योग मानक के हिसाब से यह 40 फीसदी है।’

उच्च पदों पर बैठे अधिकारी यह सुनिश्चित करते हैं कि मानव संसाधन, प्रोग्रामिंग और मार्केटिंग संबंधी नीतियों में किसी तरह की विसंगति नहीं रहे। मिर्ची में मार्केटिंग ही यह निर्णय लेता है कि ब्रांड की जरूरत को कैसे विकसित किया जाए। उसके निष्कर्षों के आधार पर ही प्रोग्राम तय किए जाते हैं। मिर्ची का जिस शहर में प्रवेश होता है, सबसे पहले मार्केटिंग टीम वहां की आबादी के स्वरूप का विश्लेषण करती है।

मुख्य प्रोग्रामिंग ऑफिसर तपस सेन कहते हैं, ‘हमें क्षेत्र में संगीत की भाषा और संचार की भाषा को जानने की जरूरत है।’ बाजार शोध के मुताबिक लोग अपनी भाषा में रेडियो सुनना पसंद करते हैं। सेन ने कहा, ‘बाजार शोध के जरिये हम निष्कर्ष पर पहुंचे हैं और अध्ययन समूहों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हम मार्केट जेनेटिक कोडिंग में काफी मजबूत हैं।’ लेकिन मार्केटिंग से गलती भी हो सकती है।

दक्षिण में इसके 9 स्टेशनों के लिए संगीत और संचार के लिए कौन सी पसंदीदा भाषा होनी चाहिए, यह तो स्पष्ट ही है कि स्थानीय होनी चाहिए। लेकिन बेंगलुरु ने उन्हें भ्रम में डाल दिया है। कन्नड़ भाषी आरजे ने बॉलीवुड के हिट गाने बजाने शुरु किए लेकिन वे श्रोताओं को आकर्षित करने में नाकाम रहे। मिर्ची ने शहर में नंबर वन चैनल बनने के लिए जल्द ही कन्नड़ संगीत बजाना शुरु कर दिया। सेन इस बात पर जोर देते हैं कि शोध किसी बाजार का एक अच्छा संकेतक है।

मार्केटिंग टीम ने मिर्ची से कहा कि पुणे में मराठी बोलने वाले आरजे चाहिए लेकिन नागपुर में हिंदी भाषी आरजे ही रखे जाने चाहिए। नागपुर है तो महाराष्ट्र में लेकिन वहां मीडिया हिन्दी में ही पसंद किया जाता है। साफ है कि मिर्ची इसका संतुलन रखता है कि कंटेंट लोकल भी हो और उसका स्तर भी बढ़िया हो। यह रेडियो स्टेशन नए या मौजूदा दौर के संगीत को अपने सभी स्टेशनों पर प्रसारित करता है। उत्तर में इसका संगीत हिंदी में होता है।

पांडे के मुताबिक, ‘हम इंदौर में गजल और भजन तथा मुंबई में बॉलीवुड के सुपरहिट गाने नहीं बजाते।’ स्थानीयकरण स्थानीय संगीत, भाषा और आरजे से जुड़ा है, आरजे के इस्तेमाल से जुड़ा है और स्थानीय संस्कृति को पूरा सम्मान और महत्त्व दिया जाता है। सेन ने कहा, ‘यदि स्टेशन इंदौर में है तो श्रोताओं को यह आभास मिलना चाहिए कि कंपनी के एमडी यानी प्रबंध निदेशक इंदौर में बैठे हैं, नई दिल्ली में नहीं।’

वैसे, प्रतिस्पर्धी चैनल मिर्ची के गैर-संगीत कार्यक्रम, खासकर इसके स्पार्कलर्स की प्रशंसा करते हैं। स्पार्कलर्स नाम उन चरित्रों के लिए मिर्ची के अंदर ही गढ़ा गया है जिनका इस्तेमाल श्रोताओं के साथ बातचीत के लिए किया जाता है। दिल्ली में एक रेडियो स्टेशन के प्रमोटर का कहना है कि मिर्ची एक अलग ब्रांड पहचान बनाने में सफल रहा है।

चैनल का जिंगल बॉलीवुड की हिट जोड़ी विशाल-शेखर द्वारा तैयार  किया गया है। इसका टेलीविजन कमर्शियल ‘मिर्ची सुनने वाले ऑलवेज खुश’ जाने-माने ऐड मैन प्रसून जोशी ने बनाया है। मिड-डे के घोषाल कहते हैं, उसने मिर्ची को प्रमोट करने के लिए अपने मीडिया ताम-झाम का पूरा फायदा उठाया है। शुरू के वर्षों में इसने टाइम्स ऑफ इंडिया में बड़े पैमाने पर विज्ञापन प्रकाशित करवाए थे।

एक रेडियो स्टेशन के प्रमुख बताते हैं कि इस अखबार के महानगर सप्लीमेंट में इस ब्रांड को अक्सर जगह मिलती रही। पर पांडे कहते हैं कि मिर्ची ने ऐसे विज्ञापनों का हमेशा भुगतान किया है। रेडियो उद्योग के एक जानकार के मुताबिक कंपनी 30-40 करोड़ रुपये बाजार में लगा कर आसानी से ब्रांड चला सकती है। हालांकि एक मीडिया विश्लेषक का कहना है कि यदि सिर्फ ब्रांड कनेक्ट करने के लिए पैसा ही सब कुछ है तो रिलायंस का बिग एफएम तो फिर मिर्ची को पछाड़ चुका होता।

मिर्ची पर हास्य को प्रधानता दी गई है। सेन कहते हैं ‘यह अग्नि परीक्षा है। रेडियो बेहद भावनात्मक माध्यम है।’ वे कहते हैं कि आरजे को अपने शहरों के बारे में भलीभांति परिचित होना चाहिए। यदि वे शहर के स्कूलों की ड्रेस के रंग आदि के बारे में जानते हैं तो इससे उन्हें अधिक मदद मिलेगी। मिर्ची कार्यक्रमों के अलावा कई अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रहा है।

दिल्ली में इसने जेसिका लाल मामले में इंसाफ के लिए कैंडललाइट प्रदर्शन  का नेतृत्व किया था। जेसिका लाल की एक राजनीतिक नेता के बेटे ने हत्या कर दी थी। सेन के मुताबिक इसके अलावा हमने तिहाड़ जेल में ‘राखी’ समारोह जैसे कई आयोजन  भी किए। अपने क्षेत्र में अगुआ बने रहने के लिए रेडियो मिर्ची भी लगातार बढ़ रही प्रतिस्पर्धा में सबको टक्कर दे रहा है।

टैम की  रेडियो ऑडिएंस मेजरमेंट के अनुसार रेडियो सिटी मुंबई पर कब्जा कर चुका है। पुरोहित दावा करती हैं कि उनका एफएम स्टेशन कुछ सर्वेक्षणों के मुताबिक लखनऊ और बेंगलुरु में भी अग्रणी बना हुआ है। केपीएमजी के मीडिया मामलों के प्रमुख राजेश जैन कहते हैं कि रेडियो के लिए प्रतिभा की खोज एक बड़ी चुनौती होगी। मिर्ची को जल्द ही 100 और लोगों की जरूरत है।

जैन कहते हैं, ‘कुल मिलाकर सभी स्टेशन एक ही तर्ज पर काम कर रहे हैं। इस क्षेत्र में कंटेट न केवल अलग होना चाहिए बल्कि इसके लिए कई कदम उठाने की भी जरूरत है।’ वैसे इस उद्योग के जानकारों ने रेडियो के 60 फीसदी की दर से बढ़ने का अनुमान लगाया है जो मौजूदा  आंकड़ों की तुलना में दोगुनी है।

हंसी के फुहारे, सुड के साथ

अगर आप उन 23 शहरों में रहते हैं जहां रेडियो मिर्ची का हिन्दी स्टेशन है, तो ये बात तय है कि आपने सुदर्शन को तो जरूर सुना होगा, जो इस बात पर जोर देता है कि लोग उसे सुड कहे। रेडियो के सर्वाधिक चर्चित चरित्रों में शुमार सुड अपने सीधे सपाट स्टाइल में बकवास जोक्स सुनाकर खुद ही टिप्पणी करता और हंसता है।

हो सकता है कभी इन पर आपको हंसी आए तो कभी आप बोर हो  जाएं। रेडियो मिर्ची के मुख्य प्रोग्रामिंग अधिकारी तपन सेन कहते हैं कि माताएं अपने बच्चों को सुड से मिलवाने लाती हैं। वे कहते हैं कि सुड एक चमकदार पात्र है जो जो श्रोताओं को रेडियो स्टेशन से जोडे रखता है। वे कहते हैं कि सुड लोगों के बीच भी जाते हैं और अपनी लच्छेदार हरकतों से उन्हें गुदगुदाते ङी हैं। मिसाल के तौर पर कोलकाता में उन्होंने गोगो गांगुली के जरिए एक शो में लोगों को हंसने के लिए विवश कर दिया।

सेन कहते हैं कि कोई अगर आप पर हंसते हैं तो आपको बुरा नहीं लगता क्योंकि वे भी आपके कार्यक्रम का एक हिस्सा हैं। मिर्ची ने इस तरह का ट्रेंड प्रोफेसर कावस के साथ शुरु किया था जो एक पारसी था और जो अभिनेताओं की आवाज में नर्सरी के राइम्स सुनाकर लोगों को लोटपोट कर देता था।

दूसरे एफएम स्टेशन वाले भी यह ट्र्रेंड अपना रहे हैं। वैसे भी स्पार्कल की पहचान को गुप्त रखा जाता है। तपन कहते हैं कि हम लोगों को यह बताना चाहते हैं कि हम एक ऐसा थियेटर हैं जो लोगों को पसंद आता है और जो उनके मानस में छाया रहता है।

First Published - June 2, 2008 | 11:43 PM IST

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