अभी एक साल पहले की ही बात है। भारतीय अर्थव्यवस्था नौ फीसदी की जबरदस्त विकास दर से तरक्की कर रही थी। महंगाई की दर काफी कम थी और चालू खाता घाटा भी काबू में था।
लेकिन आज तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। महंगाई ने नाक में दम कर रखा है और विदेशी निवेशक भी भारतीय परिसंपत्तियों के लिए ज्यादा उत्सुक नहीं रह गए हैं। निवेश की वजह से हुए विकास पर आज की तारीख में मुनाफे में आई कमी, ऊंची ब्याज दर और वैश्विक पूंजी बाजारों की पतली हालत ने ग्रहण लगा दिया है।
आज की तारीख में जहां नीति निर्धारक फिसलती अर्थव्यवस्था को काबू करने में जुटे हुए हैं, वहीं वे इसका ठीकरा सब प्राइम संकट और तेल व खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों के सिर फोड़ रहे हैं। अगर वे सही निकले तो मंदी की यह मार तभी रुकेगी, जब इन वैश्विक समस्याओं का हल निकेलगा।
इस असंतुलन की असल वजह है पूर्वी एशिया के मुल्कों में चालू खाते का मुनाफा और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में चालू खाते की पतली हालत। साथ ही, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों की वजह से खाड़ी और दूसरे तेल उत्पादक देश भी आज कल मोटा मुनाफा पीटने में लगे हुए हैं।
दूसरी तरफ, कच्चे तेल और खाद्यान्न की ऊंची कीमतों की वजह से विकासशील मुल्कों में कारोबार घाटा तेजी से बढ़ता जा रहा है। चालू खाते की हालत में यह बड़ा असंतुलन घरेलू बाजार में बड़े उतार-चढ़ावों को दर्शाता है। हालांकि, इसमें दिक्कत यह भी है कि तेल उत्पादक मुल्कों के उस मुनाफे का क्या किया जाए, जो नॉर्वे के उनके बैंक खातों में जमा पड़ा हुआ है।
जब तक विदेशी निवेशक सरकार द्वारा जारी की गई परिसंपत्तियों में अपने निवेश को बरकरार रखना चाहते हैं, चालू खाता घाटे का उतना ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन विदेशी निवेशकों की यह इच्छा हमेशा बरकरार नहीं रहती है। यह निर्भर करता है जोखिम की संभावनाओं और पूंजी प्रवाह की पर्याप्त मात्रा पर।
जब से वित्तीय बाजारों में संकट उभरा है, विदेशी निवेशकों की इसी इच्छा में बदलाव आ गया है। इस संकट की वजह से विदेशी निवेशक गुणवत्ता की तलाश में बाजार को छोड़ चुके हैं और इस वजह से वित्तीय संस्थानों के सामने पूंजी की समस्या खड़ी हो चुकी है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम की वजह से एक बात तो साफ है कि अब हमें एक नए संतुलन की जरूरत है। इस संतुलन में चालू खाते घाटे (या मुनाफे) को उस स्तर पर शामिल किया जाए, जो आज के स्तर से काफी अलग हो।
आने कल में यह संतुलन कैसे होगा, इस बारे में वॉशिंगटन के पीटरसन इंस्टीटयूट के दो रिसर्चर, विलियम क्लाइन और जॉन विलियमसन ने एक बेहद मजेदार भविष्यवाणी की है। इसमें सबसे अहम बात यह होगी कि चालू खाता घाटे (या मुनाफे) को एक ऐसे स्तर ले जाया जाएगा, जहां विदेशी निवेशक किसी खास मुल्क में खुशी-खुशी पैसा लगाने को तैयार हो जाएं।
इस मॉडल में विनिमय दर काफी अहम हथियार होगा, जिसे चालू खाता घाटे (या मुनाफे) को पाटने के लिए कम किया (या बढ़ाया) जाता है। जाहिर सी बात है कि चालू खाते घाटे में बदलाव का असर मुल्क में जमापूंजी और निवेश के बीच मौजूद खाई पर भी पड़ेगा। हालांकि, रिसर्चरों ने यह नहीं बताया कि यह कैसे हो पाएगा।
साथ ही, चूंकि विनिमय दर में बदलाव की वजह से पूरी दुनिया को अपने चालू खाता घाटे में बदलाव करना पड़ेगा, इसीलिए विनिमय दर में बदलाव वैश्विक स्तर पर होने चाहिए। उन दोनों शोधार्थियों यह मानकर चले थे कि चालू खाते में तीन फीसदी तक का घाटा या मुनाफा आम बात है। ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ मुल्कों के लिए व्यवहारिक रूप से पूंजी प्रवाह के जरिये इसे पाटना कोई मुश्किल काम नहीं है।
उन्होंने अपने शोध को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 2009 के पूर्वानुमान के साथ जोड़ा। फिर उन्होंने आज की नीतियों और उन नीतियों के आधार पर इस आंकड़े की तुलना की, जो होनी चाहिए। इस मामले में उन्होंने तेल निर्यातक मुल्कों को अपने शोध से बाहर रखा और उनके लिए किसी संतुलन की बात नहीं कही। इस शोध में की मोटी बातें तो अपेक्षा के अनुरूप ही रही है, लेकिन बदलाव बहुत बड़े स्तर पर हुआ है।
संतुलन बिठाने के लिए बदलाव की प्रक्रिया के लिए चीन, जापान और पूर्वी व दक्षिण पूर्वी एशियाई मुल्कों अपनी मुद्रा का पुर्नमूल्यांकन करना पड़ेगा। साथ ही, उन्हें अपने चालू खाते में भारी बदलाव करने पड़ेंगे। इसके अलावा जरूरत पड़ेगी भारत, यूरोप (स्वीडन और स्विटजरलैंड को छोड़कर), ब्राजील और रूस में वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) को थोड़ा कम करना पड़ेगा, जबकि डॉलर में भारी अवमूल्यन की जरूरत होगी।
असल में, डॉलर का अवमूल्यन इस स्तर पर होना चाहिए कि भारत जैसे ऊंचे आरईईआर वाले मुल्क में भी रुपये में और मजबूती आएगी। जाहिर सी बात है कि इसका नतीजा दिखने में फरवरी, 2008 के आंकड़ों के बराबर लेगा। अगर और कभी संतुलन हासिल हो गया, तो असल संतुलन दर अलग होगी। दूसरी बातों के अलावा, यह संतुलन दर महंगाई की अलग-अलग दर के मुताबिक अलग ही होगी।
असल सवाल यहीं छुपा हुआ है, ‘कब और कहां संतुलन हासिल होगा?’ क्या वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए संतुलन की तरफ बढ़ रही है, इसे पता लगाने का एक तरीका मध्य अगस्त तक के आंकड़ों को छह महीने पुराने यानी फरवरी 2008 के आंकड़ों के साथ तुलना करना है।
ऐसा करने पर साफ नजर आता है कि यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं तो इस दिशा में बढ़ रही हैं, लेकिन एशियाई मुल्कों को अब भी लंबा रास्ता तय करना है। हकीकत तो यह है कि आज की तारीख में डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत उल्टी स्थिति में है। यह अलग-अलग महंगाई की स्थिति इसे आंका नही जा सकता है।
अगर इसे पाटा जा सकता है तो क्या वैश्विक पूंजी बाजारों की बदली परिस्थिति के मुताबिक भारत का चालू खाता घाटा तीन फीसदी के नीचे होना चाहिए? क्या इससे डॉलर के मुकाबले रुपये की बढ़ती सेहत के कारणों का पता लग सकेगा? तो वैश्विक संतुलन कैसे बिठाया जाए, इसका जवाब भारत में नहीं है।
यह पूरा मामला इस पर निर्भर करता है कि अमेरिका और चीन अपने चालू खाते घाटे को कैसे पाटते हैं। जाहिर सी बात है कि हमें इस पूरी प्रक्रिया का हिस्सा बनना ही पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि रुपये और युआन के अवमूल्यन से भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं की सेहत हो सकती है। साथ ही, इससे हमारी अमेरिकी बाजार पर अतिनिर्भरता भी खत्म हो सकती है।