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आज के विज्ञापन …बताते कम, गुदगुदाते ज्यादा

Last Updated- December 07, 2022 | 4:45 AM IST

टेलीविजन पर विज्ञापन आमूल बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं। अब टेलीविजन पर आने वाले विज्ञापनों के जरिये उत्पादों और उनके फीचर्स नहीं बल्कि  हाव भाव, आकांक्षाओं और भावनाओं को बेचा जा रहा है।


मिसाल के तौर पर इंडिगो सीएस का विज्ञापन देखें। इसमें आप पहले ऑफिस की भव्यता और मनोरमता देखेंगे और सबसे बाद में कार दिखाई जाती है। वैसे अब इस तरह के विज्ञापन में माइलेज, पावर विंडो और अन्य फीचर दिखाकर आपको बोर नहीं किया जाता है।

इसमें सिर्फ आप कर्मचारियों की एक मुस्कान देखते हैं और अंत में केवल एक पंक्ति लिखी हुई दिखती है- आखिरकार स्टाइल का ही महत्व है। यह एक प्रकार की अलग शैली है जो लोगों को भी पसंद आ रही है। भरपूर मनोरंजन और दिलकश वाक्य- यानी युवाओं को आकर्षित करने के लिए पूरा संतुलित पैकेज अब विज्ञापनों के जरिये परोसा जा रहा है।

फास्ट ट्रैक के ही विज्ञापन को देखिए न। इसमें एक युगल बिना कोई एक वाक्य बोले पूरे विज्ञापन के दौरान अपने सौम्य चेहरे से एक दूसरे की ओर देखते हैं और फास्ट ट्रैक का गिफ्ट पैक एक दूसरे को लौटा देते हैं। इस विज्ञापन में ऐसा कभी लगता ही नहीं कि उत्पाद को बेचा जा रहा है। सिर्फ एक बेची जा रही है-चलते रहो। आजकल इस तरह की श्रेणी के विज्ञापनों की भरमार है।

अब आप ऐसे विज्ञापन कभी कभार ही देखते होंगे जिसमें सबसे सस्ता, सबसे अच्छा  जैसी पंचलाइन इस्तेमाल की जाती हो या एक नए पैक में जैसे सूचनाप्रद वाक्य लिखे जाते हैं। अब इस तरह के विज्ञापनों का जमाना बीत गया है। वैसे मूव ऑन और डर के आगे जीत है जैसी पंचलाइन आ गई है जिनमें जोश और जुनून को ज्यादा प्रोमोट किया जा रहा है। अब टीवी पर आ रहे विज्ञापनों में सूचनाएं कम बताई जाती हैं और मनोरंजन ज्यादा परोसा जाता है।

पब्लिसिस इंडिया के नेशनल क्रियेटिव डायरेक्टर इमैनुअल उप्पुतुरू कहते हैं कि यह बिल्कुल सच है कि अब इस तरह के विज्ञापन में बोलचाल के जरिये दी जा रही सूचनाओं को दौर खत्म हो गया है। दरअसल सारे उत्पादों के फीचर लगभग एक जैसे हैं। ऐसे में दर्शकों के जेहन में किसी उत्पाद को बिठा पाना काफी मुश्किल होता है। आज यह परंपरा बदल गई है।

यही वजह है कि फास्ट्रैक, वर्जिन मोबाइल और मोटो युवा के विज्ञापनों की ब्रांड वैल्यू काफी ज्यादा है जबकि इनमं  ब्रांड के बारे में कुछ नहीं बताया जाता। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये विज्ञापनों के लक्ष्य को पूरा करते हैं? क्रिएटिव डायरेक्टरों का मानना है कि उत्पादों के बारे में बताने के लिए हमेशा ही दूसरा मीडिया होता है जिसके जरिए उसकी जानकारी दी जा सकती है।

प्रिंट मीडिया इस संदर्भ में बौद्धिक पहल करता है और टीवी मीडिया रिकॉल जॉब के साथ ब्रांड कैंपेन की जरूरत की भरपाई करता है। रेडिफ्यूजन इंडिया के क्रिएटिव निदेशक सागर महाबलेश्वरकर कहते हैं कि टीवी के विज्ञापनों में समय कम रहता है। इसलिए इनके जरिये उत्पादों के फीचर के बारे में ज्यादा बात नहीं की जा सकती है।

First Published - June 10, 2008 | 11:25 PM IST

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