सरकार ने चीनी पर धीरे धीरे नियंत्रण खत्म करने का जो प्रस्ताव रखा है, उससे यही लगता है कि सरकार इस क्षेत्र को थोड़ा उदार तो बनाना चाहती है, मगर इस पर लगी रोक और नियामकों को पूरी तरह से हटाने की उसकी कोई इच्छा नहीं है।
खाद्य मंत्रालय ने कैबिनेट के पास विचार विमर्श और मंजूरी के लिए एक प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें दो मुख्य बातों का उल्लेख है। एक तो चीनी उत्पादन से अनिवार्य 10 फीसदी शुल्क को हटाना ताकि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) की जरूरतों को पूरा किया जा सके और दूसरा कि चीनी के मासिक वितरण के लिए बनी प्रणाली को खत्म करना।
इस प्रणाली के जरिए ही यह तय होता है कि कोई फैक्टरी खुले बाजार में कितनी चीनी बेच सकती है। हालांकि इस प्रस्ताव में उन प्रतिबंधों को हटाने की कोई चर्चा नहीं की गई है जो इस क्षेत्र पर पहले से लगे हैं। उदारीकरण के इस प्रस्ताव का स्वागत तो किया जा रहा है पर सांविधिक न्यूनतम कीमत (एसएमपी) तय करने के लिए किस प्रणाली का गठन किया जाएगा, इसे लेकर अब भी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है।
साथ ही राज्यों द्वारा सुझाए गए गन्ने के दामों (एसएपी) को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। अगर केंद्र सरकार गन्ने की कीमत तय करने पर रोक लगा भी देती है (हालांकि चुनाव नजदीक होने के कारण इसकी उम्मीद न के बराबर है) तो भी सैप प्रणाली को खत्म करने को लेकर स्थिति अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाई है। आमतौर पर राज्य सरकारें एसएमपी से भी ऊंची दर पर गन्ने की कीमतें तय कर देती हैं, ऐसे में लगता नहीं कि वे इतनी आसानी से अपनी इस आदत को छोड़ पाएंगी।
मौजूदा समय में केवल गन्ने की कीमत ही ऐसा विषय नहीं है जो विचार करने लायक न हो। जिस समय में यह प्रस्ताव रखा गया है वह भी काफी महत्वपूर्ण है। दो सालों तक गन्ने और चीनी की पैदावार बढ़िया होने के बाद इस साल आशंका है कि चीनी का उत्पादन कम रहेगा। अगले मौसम में चीनी का उत्पादन घटकर 2.1 से 2.2 करोड़ टन तक रह सकता है, जो कि अनुमानित खपत के काफी करीब है। और तो और उत्पादन के ऐसे समय में कम होने की आशंका है जब विश्व स्तर पर चीनी के निर्यात की संभावना बढ़ गई है।
पूरी दुनिया में चीनी की आपूर्ति कम है और ऐसे में भारत के पास निर्यात को बढ़ाने का अच्छा मौका था। इससे पहले भी कम से कम दो मौकों पर सरकार चीनी के वितरण पर से अपना नियंत्रण कम करने की कोशिश कर चुकी है, पर दोनों ही बार उसने कुछ ही समय में अपना कदम वापस ले लिया था। अगर सरकार सच में चाहती है कि इस बार उसकी नीतियां सफल हों तो उसे इस क्षेत्र को पूरी स्वतंत्रता देनी होगी और उन्हें यह छूट देनी होगी कि खुले बाजार में वे अपने फैसले खुद ले सकें। कुल मिलाकर कहें तो चीनी क्षेत्र में स्थिरता लाने के लिए सरकार को इस क्षेत्र पर से अपने नियंत्रण को पूरी तरह से खत्म करना पड़ेगा।