देश की सबसे बड़ी दवा कंपनी रैनबैक्सी से सिंह परिवार के निकल जाने से उन्हें 10,000 करोड़ रुपये की कमाई हुई है।
सिंह ने इस कंपनी में अपने परिवार के 34.8 फीसदी शेयरों को जापानी कंपनी दाईची सांक्यो को सौंप कर जो रकम अर्जित की है, उसका इस्तेमाल किसी दूसरे कारोबार को खड़ा करने के लिये किया जा सकता है। पर सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल है कि क्या यह परिवार इस पैसे से रैनबैक्सी जैसी सफलता को दोहरा पाएगा?
हालांकि इस सवाल का मकसद दोनों भाइयों मालविंदर और शिविंदर की उद्यम क्षमता पर उंगली उठाना नहीं है। याद रहे कि मालविंदर इस डील के बाद भी रैनबैक्सी के सीईओ बने रहेंगे। समूह के अंदर ही दोनों भाइयों ने कई सफल कारोबारों को अपने कंधों पर उठाकर आगे बढ़ाया है। वित्तीय कंपनी रेलीगेयर सिक्योरिटीज और अस्पताल श्रृंखला फोर्टिस इन दोनों भाइयों की उद्यम कुशलता का ही उदाहरण है जिन्हें फलता फूलता बनाने में इनके पिता का नहीं बल्कि खुद इनका हाथ रहा है।
पर इस रकम के इस्तेमाल को लेकर एक कठिनाई जो सामने आ रही है वह यह है कि अब तक ऐसे मामलों में भारत के विभिन्न उद्यम परिवारों का देश के कारोबारी क्षेत्र में कोई खासा प्रभावशाली इतिहास नहीं रहा है। जरा इतिहास के पन्नों को पलटें तो आपको पता चलेगा कि अब तक जिन भारतीय उद्यमियों ने अपने स्थापित कारोबार को बेचा है, वे दूसरे कारोबारों में अच्छी वापसी कम ही कर पाए हैं।
चलिए हम पहले खिलाड़ी की बात करते हैं- जब 90 के दशक की शुरुआत में रमेश चौहान ने अपने शीतल पेय ब्रांड थम्स अप को कोक के हाथों बेचा था। उस समय चौहान के पास बोतल बंद पानी बिसलरी का कारोबार बचा रह गया था। थम्स अप को बेचने के बाद चौहान उस जैसा कोई सफल कारोबार शुरू नहीं कर पाए। कुछ ऐसा ही मोबाइल फोन सेवा के कारोबार से जुड़े राजीव चंद्रशेखर के साथ भी देखा गया।
अपने कारोबार को महाराष्ट्र सर्किल के एस्सार समूह के पास बेचने के बाद उन्होंने कंटेनर ट्रेन से लेकर इन्फोटेक कंपनियों तक अपने हाथ आजमाए, पर उन्हें पहली जैसी सफलता नहीं मिली। हालांकि इस श्रृंखला में मालविंदर और शिविंदर के चाचा अनलजीत सिंह का मामला अपवाद है। मोबाइल फोन कंपनी हचिसन मैक्स (अब वोडाफोन एस्सार) में अपनी हिस्सेदारी को 650 करोड़ रुपये में बेचने के बाद उन्होंने इन्फोटेक और फार्मा जैसे कई कारोबार में दखल दी।
इनमें से अधिकांश में उनका प्रदर्शन बढ़िया रहा। हच में अपनी हिस्सेदारी बेचने के बाद उनके पास दो विकल्प थे- हेल्थ केयर और बीमा। आज उनकी अस्पताल श्रृंखला मैक्स और अमेरिका की सबसे बड़ी बीमा कंपनी न्यू यॉर्क लाइफ के साथ उनका करार दोनों ही सफलता का स्वाद चख रही हैं। साफ है कि किसी कारोबार में सफलता की पहली शर्त कारोबारी रुझानों को पहले से भांप लेना है। और यह तभी संभव है जब किसी उद्यमी की कारोबारी दूरदृष्टि हो। इसी से पता चलता है कि दूसरी पारी (दूसरे कारोबार के संदंर्भ में) खेलना क्यों आसान नहीं होता।