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सरकारी विभागों के बीच बेकार की कानूनी लड़ाई

Last Updated- December 07, 2022 | 6:03 PM IST

भारत का संविधान सबसे लंबे संविधानों में से एक है, जिसमें विस्तृत व्याख्याएं दी गई हैं। लेकिन इसके बावजूद संविधान निर्माता एक बड़ी खामी छोड़ गए हैं।


उन्हें यह उम्मीद तो नहीं रही होगी कि सरकार का एक विभाग, दूसरे के खिलाफ अदालत में जा सकता है। सरकार और उसकी एजेंसियों ने बड़ी संख्या में इस तरह की याचिकाएं न्यायालयों में दाखिल कर रखी हैं। आम आदमी के अलावा वे एक दूसरे को तमाम मामलों में न्यायालय में खींचकर ले जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ उपक्रम और बीमा कंपनियां कर जमा करने में लापरवाही बरतती हैं, वे कर से बचने के लिए तमाम तिकड़में भिड़ा देती हैं, जबकि यह पैसा सरकार की एक जेब से निकलकर दूसरी जेब में ही जाना होता है।

इस तरह के जारी अनुचित संघर्ष और पीड़ा से दुखी होकर 1995 में सर्वोच्च न्यायालय ने तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग बनाम केंद्रीय उत्पाद शुल्क संग्राहक मामले का फैसला देते वक्त सरकार से एक ‘कमेटी ऑफ डिस्प्यूट्स’ गठित करने को कहा। इसमें कहा गया कि समिति में उद्योग मंत्रालय, सार्वजनिक संस्थानों के प्रतिनिधि और कानून मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।

यह समिति ही मंत्रालयों, सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और पीएसयू के बीच होने वाले आपसी विवादों की निगरानी करे। समिति इस बात को सुनिश्चित कर सकती है कि कोई भी याचिका न्यायालय या ट्राइब्यूनल में तब तक न आए जब तक समिति उसकी जांच न कर ले और वह याचिका दाखिल करने की अनुमति न दे दे। इसके अलावा, अदालती कार्यवाही शुरू करने के पहले न्यायालय इस समिति से हरी झंडी ले।

इस फैसले को आए 13 साल बीत चुके, लेकिन अभी भी इस तरह के विवाद सर्वोच्च न्यायालय में बेतहाशा आ रहे हैं। हाल की एक घटना में आयकर विभाग के कमिश्नर की ओर से सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के खिलाफ 10 से अधिक मुकदमे दायर किए गए। कर संग्रहकर्ताओं के मुताबिक सभी बीमा कंपनियां आयकर अधिनियम की धारा 44 के अधीन आती हैं। इन सभी मामलों का आकलन किया गया था।

इन फर्मों ने कर अपील न्यायाधिकरण में अपील की थी, जहां उन्हें सफलता मिल गई। उसके बाद यह तर्क दिया गया कि इस मामले में कमेटी आफ डिस्प्यूट्स की संस्तुति जरूरी है, इसके लिए एक समयसीमा भी तय कर दी गई। दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य रूप से एक महीने के भीतर स्वीकृति ली जानी चाहिए।

इन मामलों में ऐसा नहीं किया गया था। इसलिए कर से जुड़े अधिकारियों ने यह तर्क देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की कि इसके लिए समय सीमा की कोई इस तरह की बाध्यता नहीं है। यद्यपि यह ऐसा विवाद है जिसे 1995 में ओएनजीसी मामले में दिए गए मूल फैसले और 2004 में एक अन्य ओएनजीसी मामले में दिए गए स्पष्टीकरण को देखने के बाद आसानी से हल किया जा सकता है।

इस मामले में अंतिम रूप से स्पष्टीकरण दिए जाने में कुछ साल लग गए थे। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि उसके किसी भी फैसले में स्पष्ट समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है। इसमें कहा गया है, ‘एक महीने के समय पर उस मामले में जोर डाला गया है, जिसमें तात्कालिकता की जरूरत हो। क्योंकि समिति से संपर्क करने में कुछ देरी हुई है, इससे यह अवैधानिक नहीं हो सकता।

मामले के जल्द से जल्द समाधान के लिए ही समिति बनाई गई है, इसलिए न्यायालय में अनावश्यक रूप से याचिकाओं का अंबार लगाने का कोई मतलब नहीं है। इस परिस्थिति में मामले से संबंधित पक्षों को तात्कालिक कार्रवाई करने की जरूरत है। अन्यथा इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यहां पर शिथिलता के लिए कोई जगह नहीं है।’

अगर देरी का कोई उचित तर्क नहीं है तो न्यायालय मामले की सुनवाई से इनकार कर सकता है। यह मामलों के तथ्यात्मक साक्ष्यों पर निर्भर करता है, इसके लिए कोई सपाट सूत्र नहीं बनाया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के हाल के दो फैसलों में दो सरकारी संस्थाओं के बीच की कानूनी लड़ाई में समय और मानव संसाधनों की बर्बादी पर खेद व्यक्त किया है।

एमटीएनएल बनाम चेयरमैन, सीबीडीटी (2004) मामले में न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि ”मामलों की बढ़ती संख्या के बोझ के नीचे कानूनी तंत्र दबा रहता है, जिसमें से ज्यादातर मामले सरकारी विभागों और सार्वजनिक निगमों से संबंधित होते हैं। इसमें से कुछ मामले तो बेहद मामूली होते हैं।

अगर समिति ऐसे मामलों को न्यायालय में भेजने से इनकार कर दे, तो उसी का फैसला अंतिम होगा और उसका पालन किया जाएगा। यह उम्मीद की जाती है कि समिति के सदस्य उच्च पदस्थ अधिकारी होंगे और वे बगैर किसी भेदभाव के निष्पक्षता और ईमानदारी से फैसले करेंगे।”

मुख्य संरक्षक बनाम कलेक्टर (2003) मामले में न्यायालय ने कहा, ”यह न तो उचित है और न ही इसकी अनुमति दी जा सकती है कि राज्य या केंद्र के दो विभाग न्यायालय में कानूनी लड़ाई लड़ें। लोक हित में इस तरह के मामले उचित नहीं कहे जा सकते, यह जनता के धन और समय की बर्बादी है।”

इस तरह की तमाम समझदारीपूर्ण बहस के बावजूद उत्तर प्रदेश फॉरेस्ट कार्पोरेशन 30 साल से कर पर विवाद की लड़ाई लड़ रहा है। पहले उसने तर्क दिया कि स्थानीय अधिकारियों ने कर में छूट दी थी और उसके बाद कहा कि वह एक धर्मार्थ संस्था है, जिसे इस तरह का छूट पाने का अधिकार है। बहरहाल अभी इस पर फैसला नहीं हुआ है। संबंधित अधिकारी अभी भी यह जांच करने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह धर्मार्थ संस्था है या नहीं।

First Published - August 21, 2008 | 10:43 PM IST

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