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वैट का कहर टूट रहा है ताज बनाने वालों पर

Last Updated- December 07, 2022 | 1:03 AM IST

आगरा के ताजमहल की खूबसूरती की दास्तान तो पूरी दुनिया में सुनाई जाती है लेकिन इसी शहर में हस्तशिल्प से जुड़े लोगों की आवाज अनसुनी सी हो गई है।


आगरा में छोटे स्तर के हस्तशिल्प की इकाइयां  काफी मुश्किल के दौर से गुजर रही हैं। यहां हजारों की संख्या में संगमरमर के छोटे-छोटे ताजमहल बनाए जाते हैं और उन्हें बाजार में बेचा जाता है।

इन हस्तशिल्पकारों की मुश्किलें इस वजह से बढ़ गई हैं क्योंकि संगमरमर और दूसरे नरम पत्थरों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। हाल ही में मार्बल से बनी वस्तुओं पर 4 प्रतिशत वैट लगा दिया गया है। इस उद्योग को सबसे ज्यादा नुकसान निर्यात करने वाले ठेकेदारों से है जो बहुत कम मार्जिन दे रहे हैं।

शर्मा मार्बल इंडस्ट्री प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर रमेश सी. शर्मा का कहना है, ‘मार्बल और दूसरे पत्थर ज्यादातर राजस्थान की खदान से मंगाए जाते हैं और पिछले पांच साल में इन पत्थरों की कीमतों में 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है।’ इन निर्माण इकाइयों के  लाभ में कमी आई है। इसकी वजह यह है कि निर्यात करने वाले ठेकेदार कीमतों को बढ़ाना नहीं चाहते।

लघु उद्योग के मालिक रूपेंद्र गौर का कहना है कि छोटी कलाकृतियों की बाजार में मांग में बेहद कम हो गई है। उनका कहना है कि ज्यादातर काम हाथ से किया जाता है और बिजली पर निर्भरता कम है, इसलिए प्रति कारीगर प्रतिफल का अनुपात  बहुत कम है। यह इन इकाइयों के लाभ मार्जिन पर स्पष्ट दिखाई देता है। से इकाइयां असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं। ये इकाइयां ठेकेदारों को उधार पर उत्पाद देती हैं।

इसका नतीजा यह हुआ कि कुछ बड़े निर्माणकर्ता अपने सामान की सीधी बिक्री इंपोरियम के मालिकों को करने लगे जो अच्छे पैसे देने के लिए तैयार थे। हालांकि इंपोरियम मालिकों की मांग यह थी कि इनकी क्वालिटी बेहतर हो लेकिन वे ज्यादा मात्रा में संगमरमर या पत्थर की वस्तुएं नहीं खरीदते थे।

यूपी हैंडीक्राफ्ट डेवलपमेंट सेंटर के चेयरमैन प्रह्लाद अग्रवाल का कहना है,’मार्बल के ज्यादातर हस्तशिल्प आगरा में बनाए जाते हैं और पूरे देश में इस शहर के हैंडीक्राफ्ट इंपोरियम के जरिए घरेलू और विदेशी पर्यटकों को बेचे जाते हैं। आमतौर पर सितंबर से फरवरी महीने का कारोबार काफी अच्छा होता है। बाकी के छह महीनों में गर्मी की वजह से बिक्री में 25 प्रतिशत से भी ज्यादा की कमी आ जाती है।’

अग्रवाल का कहना है कि राज्य सरकार ने यह प्रयास भी किया कि ट्रेड फेयर आयोजित कराया जाए और ताज महल के नजदीक शिल्प ग्राम में स्थायी रूप से लंबे समय तक चलने वाला एक शिल्प हाट बना दिया जाए। जहां तक कोशिशों की बात है इसके  नतीजे तो अभी तक जमीनी हकीकत नहीं बन पाए हैं।अग्रवाल का कहना है कि राज्य सरकार ने मार्बल गुड्स पर 4 प्रतिशत का वैट लगाया है, हालांकि इस पर अभी काफी कई भ्रांतियां बनी हुई है।

मसलन मार्बल हैंडीक्राफ्ट भी कर के दायरे में आता है या नहीं। इसकी वजह यह है कि हैंडीक्राफ्ट में संगमरमर की मूर्तियां और दस्तकारी की और भी चीजें शामिल होती हैं।पहले हैंडीक्राफ्ट को कर के दायरे से बाहर रखा गया था। बकौल अग्रवाल 50 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित  राजस्थान में हस्तशिल्प को कर से छूट दी गई है जबकि यहां हस्तशिल्प पर लगने वाला कर अनुचित है।

उनका कहना है कि हस्तशिल्प उद्योग इस मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के व्यावसायिक कर आयुक्त से स्पष्टीकरण मांग रहा है। इस बीच मार्बल हैंडीक्राफ्ट का कारोबार बिना वैट के ही चल रहा है। अगर सरकार मार्बल हैंडीक्राफ्ट पर भी वैट लगाती है तब इस उद्योग से जुड़े लोग अदालत में भी अपनी गुहार लगाएंगे।

First Published - May 22, 2008 | 11:33 PM IST

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