हिंदी फिल्मों के एक मशहूर गीत के अंतरे का मजमून कुछ इस तरह है कि ‘वक्त चलता ही रहता है रुकता नहीं, आदमी ठीक से देख पाता नहीं और परदे पर मंजर बदल जाता है।’
कहने की जरुरत नहीं है कि वक्त की मार से कोई नहीं बच पाता है। लेकिन लगता है कि खुद (वक्त) को बताने वाली ‘घड़ी’ पर यह मेहरबान नजर आता है क्योंकि खबर तो यही है कि घड़ी का कारोबार भला चंगा चल रहा है।
घड़ी बाजार से आ रहे रुझानों ने उन लोगों को गलत साबित कर दिया है जिनका मानना है कि मोबाइल के आने से घड़ी का कारोबार प्रभावित हुआ है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि पहले लोग ‘जरूरत’ के हिसाब से घड़ी पहनते थे तो अब ‘फैशन’ के लिए घड़ी को हाथ में डालते हैं।
वैसे ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है कि मोबाइल के आने से घड़ी के कारोबार को बुरी नजर लगी है। दिल्ली के शकरपुर इलाके में ‘टाइम जोन’ नाम का आउटलेट चलाने वाले बॉबी का मानना है कि मोबाइल ने घड़ी के कारोबार पर कोई असर नहीं डाला है। उनके मुताबिक घड़ी का कारोबार तो अब बढ़ने पर ही है।
वह बताते हैं कि अब लोग मॉर्निंग वॉक के लिए ‘स्टॉप वॉच’ या ‘डिजिटल वॉच’ पहनते हैं तो स्विमिंग के लिए ‘एयरटाइट’ घड़ी पहनते हैं और जब उनको ऑफिस के लिए निकलना होता है तो उनकी कलाई पर दूसरी किस्म की घड़ी नजर आती है। बॉबी यह जरूर मानते हैं कि मोबाइल ने डिजिटल डायरी के कारोबार को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। बदलते दौर में घड़ी वक्त बताने की कम और फैशन की चीज अधिक हो गई है। दिल्ली के कमला नगर में ‘समय वॉचेज’ के जरिये तकरीबन 40 साल से घड़ी के कारोबार से जुड़े राजेश काठपाल की राय भी बॉबी से जुदा नहीं है।
राजेश कहते हैं कि मोबाइल के आने से घड़ी की बिक्री प्रभावित नहीं हुई है बल्कि आज आमतौर पर लोगों के पास दो या तीन मॉडल तो आराम से मिल ही जाते हैं। आजकल के लड़के टी शर्ट के साथ ‘स्पोर्ट्स वॉच’ या ‘क्रोमा वॉच’ पहनना पसंद करते हैं तो फॉर्मल ड्रेस के साथ परंपरागत घड़ी उनको भाती है। लड़कियां भी इसमें पीछे नहीं हैं, वे भी अपनी ड्रेस के मुताबिक घड़ी का चयन करती हैं। बल्कि वे तो एक कदम आगे निकलकर अपनी ड्रेस के रंग के अनुसार भी घड़ी पहनने को तरजीह देती हैं। राजेश बताते हैं कि उनके यहां आने वाले ज्यादातर युवा फैशनेबल ब्रांड की मांग करते हैं।
उनके मुताबिक आजकल के लड़के ‘कैसियो’ या फिर ‘फास्टट्रैक’ की घड़ियां ज्यादातर पसंद करते हैं तो लड़कियां ‘टॉमी हिलफिगर’ या ‘रैडो’ को अपनी कलाई पर सजाना पसंद करती हैं। दिल्ली के ही पालिका बाजार के एक कारोबारी का कहना है कि उनके यहां आने वाले लोग खासतौर से डिजाइन पसंद करते हैं। भले ही घड़ी चाहे थोड़े वक्त तक ही साथ निभाए। घड़ी बनाने वाली ज्यादातर कंपनियों ने वक्त के हिसाब से अपनी रफ्तार भी बदली है। उत्पादों में वैरायटी पर तो उनका जोर है ही, साथ ही वे किसी खास उत्पाद को अपने ब्रांड के तहत पहचान दिलाने में जुटी हैं।
मसलन ‘कैसियो’ क्रोमो वॉच के लिए जानी जाती है। ‘क्रोमो वॉच’ एक डिजिटल घड़ी होती है जिसमें समय के साथ घंटे और मिनट का पता भी चलता रहता है। दुनिया भर में जाने माने ब्रांड ‘रैडो’ की सेरेनिक घड़ियां बड़ी मशहूर हैं जिन पर स्क्रैच नहीं पड़ती। वैसे सेरेनिक को खरीदने के लिए जेब अच्छी-खासी ढीली करनी पड़ती है क्योंकि इसकी रेंज 50,000 रुपये से शुरू होती है। वहीं ‘स्वैट’ फैशनेबल ब्रांड के तौर पर जानी जाती है जिसकी प्लास्टिक की रंगीन घड़ियां लोगों को लुभाती हैं। ‘टिस्सोट’ की हैवी स्पोर्ट्स घड़ियों का युवाओं में खासा क्रेज है।
‘सीको’ की ‘कनेटिक’ नाम की घड़ी अपने आप में अनोखी है जिसको अगर आप एक बार पहनने के बाद तीन-चार सालों के लिए कहीं रख भी दें तो चार साल बाद हल्का सा हिलाने पर यह फिर से चलने लगेगी। इस दौरान इसमें महीना और साल अपने आप अपडेट होते रहेंगे। पर यह भी सस्ती नहीं है, इसकी रेंज 33,000 रुपये से शुरू होती है। खास घड़ियों की रेंज में ‘सिटिजन’ भी पीछे नहीं रहना चाहती और इसने ‘इकोड्राइव’ बाजार में उतार रखी है। ये तो बस कुछ नमूने हैं, मौजूद दौर में कंपनियों ने घड़ियों के अलग-अलग तरह के मॉडलों से बाजार को पाट रखा है। और ये मोबाइल के ‘खौफ’ से ‘बेखौफ’ बाजार में अपनी पैठ बनाने की कोशिशों में लगी हुई हैं।